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न इस्तीफा, न किसी की अवमानना! - सुभाष कश्‍यप

सुप्रीम कोर्ट का संकट अभी तक समाप्त होता नहीं दिख रहा है। इस मामले में सभी तथ्यों को पूरी तौर पर जाने बिना किसी के लिए भी तटस्थता के साथ यह कहना कठिन है कि किसका पक्ष कितना सही है, क्योंकि चार वरिष्ठ न्यायाधीशों की ओर से प्रेस कांफ्रेंस करने और इस दौरान एक लंबी चिट्ठी जारी करने के बाद भी सारी बातें स्पष्ट नहीं हैं। ध्यान रहे कि यह बात खुद चारों न्यायाधीशों ने भी कही कि वे सब कुछ नहीं बता रहे हैं और अभी तक यह भी स्पष्ट नहीं है कि विवाद की शुरुआत कब और कैसे हुई अथवा वे कौन से मामले थे जो इस विवाद के उभार की वजह बने?

 

इसे लेकर तरह-तरह की बातें हैं और इन अपुष्ट एवं विरोधाभासी बातों के आधार पर किसी नतीजे पर नहीं पहुंचा जा सकता और न ही पहुंचा जाना चाहिए। जो बात शीशे की तरह बिलकुल साफ है, वह यह कि भारत में ऐसा इसके पहले कभी नहीं हुआ। यह जो कुछ हुआ, वह दुखद भी है और दुर्भाग्यपूर्ण भी। मीडिया ट्रायल की आलोचना करने वाले सुप्रीम कोर्ट के चार न्यायाधीशों का मीडिया के सामने आना एक गंभीर मामला है। किसी भी लोकतांत्रिक देश के लिए यह अच्छा संकेत नहीं। जो संकट जनता के सामने आया या फिर यह कहा जाए कि जिसे लाया गया, उसका एक समाधान तो यह हो सकता था कि या तो चारों न्यायाधीशों की प्रेस कांफ्रेंस के बाद प्रधान न्यायाधीश यह कहते कि चूंकि उनके चार वरिष्ठ सहयोगियों ने उन पर सार्वजनिक तौर पर अविश्वास जता दिया है, इसलिए वह नैतिकता के आधार पर अपना पद छोड़ रहे हैं या फिर वह इन चार

न्यायाधीशों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट की अवमानना का मामला चलाते, ठीक वैसे ही जैसे जस्टिस कर्नन के खिलाफ चलाया गया था। ध्यान रहे कि चार न्यायाधीशों ने जो कुछ कहा, वह यदि किसी अन्य ने कहा होता तो उसे अदालत की अवमानना का दोषी मानकर तलब कर लिया गया होता। इसी तरह यदि चारों न्यायाधीश अपना पक्ष सही बताने के लिए प्रेस कांफ्रेंस करने के पहले त्यागपत्र दे देते तो शायद आज उन पर सवाल नहीं उठ रहे होते। क्या यह अच्छा नहीं होता कि वे त्यागपत्र देने के बाद जनता के सामने आकर यह कहते कि सुप्रीम कोर्ट में ऐसी स्थिति आ गई है जो उन्हें स्वीकार नहीं, लेकिन न तो इन चारों न्यायाधीशों ने प्रेस कांफ्रेंस करने के पहले त्यागपत्र देना जरूरी समझा और न ही इस प्रेस कांफ्रेंस के बाद प्रधान न्यायाधीश ने पद छाेडने की जरूरत समझी।

 

सबसे अच्छा तो यह होता कि सुप्रीम कोर्ट प्रशासन का मामला सार्वजनिक करने के पहले चार न्यायाधीश सभी 25-26 न्यायाधीशों की बैठक बुलाने की मांग करते। मीडिया अथवा अन्य बाहरी लोगों की गैरमौजूदगी में इन-कैमरा बैठक की जाती। सभी अपनी-अपनी बात कहते और मामले को हल करने की कोशिश की जाती। समस्या के समाधान का यही सबसे अच्छा तरीका होता, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। अब यह कहा जा रहा है कि ऐसा किया जाना चाहिए, लेकिन यह तो वह काम था, जो पहले किया जाना चाहिए था।

 

यह भी दुर्भाग्यपूर्ण है कि कुछ राजनीतिक दल और राजनेता इस विवाद में कूद पड़े हैं और अपनी-अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने का काम कर रहे हैं। यह ठीक नहीं कि इतने गंभीर मसले का राजनीतिकरण किया जाए। मेरा यह स्पष्ट मानना है कि इस विवाद में न सरकार को दखल देना चाहिए, न संसद को और न ही राजनीतिक दलों को।

 

संविधान में न्यायपालिका, विधायिका और कार्यपालिका के अधिकार और कर्तव्य अच्छी तरह परिभाषित हैं। विधायिका यानी संसद का काम कानून बनाना है तो न्यायपालिका यानी सुप्रीम कोर्ट का काम कानूनों की व्याख्या करना। किसी को एक-दूसरे काम में हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं। भारत की स्थिति न तो ब्रिटेन जैसी है और न ही अमेरिका सरीखी। ब्रिटेन में जहां संसद सर्वोच्च है, वहीं अमेरिका में सुप्रीम कोर्ट। भारत में ऐसा नहीं है। भारत में तीनों अपने-अपने दायरे में ही सर्वोच्च हैं। हमारे लोकतंत्र की मूल भावना यही है कि जनता स्वंय अपने चुने हुए प्रतिनिधियों अर्थात एक राजनीतिक व्यवस्था के तहत अपने पर शासन करती है। संविधान में तीनों संस्थाओं- कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र और आपसी संबंध सही तरह से परिभाषित किए गए हैं, लेकिन कई बार तीनों संस्थाएं अपना काम सही तरह करती नहीं दिखतीं। जब वे अपने दायरे से बाहर जाकर काम करती हैं, तो समस्या पैदा होती है।

 

न्यायपालिका और खास तौर पर सुप्रीम कोर्ट की ओर से तरह-तरह के मामलों की सुनवाई करते हुए अक्सर यह कह दिया जाता है कि जब कार्यपालिका या विधायिका अपना काम नहीं कर रही तो फिर किसी को तो यानी खुद उसे यह काम करना होगा, लेकिन क्या इसी तर्क के आधार पर कार्यपालिका या विधायिका सुप्रीम कोर्ट के हिस्से का काम कर सकती है? क्या सरकार या फिर संसद यह कहते हुए सुप्रीम कोर्ट के काम में दखल दे सकती है कि साढ़े तीन करोड़ मुकदमे लंबित हैं और वर्षों की देरी के बाद भी उनका निस्तारण नहीं हो पा रहा है?

 

यह समझने की जरूरत है कि न तो न्यायपालिका सुप्रीम है, न कार्यपालिका और न ही विधायिका। ये तीनों ही सुप्रीम नहीं। अगर कोई सुप्रीम है तो वह है संविधान। संविधान के ऊपर कोई है तो वह है देश की जनता। यह भी स्पष्ट है कि चाहे न्यायपालिका हो या कार्यपालिका अथवा विधायिका, ये तीनों ही जनता के प्रति जवाबदेह हैं। इन तीनों को इस जवाबदेही के आलोक में अपना काम करना चाहिए।

 

इस पर आश्चर्य नहीं कि सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा विवाद को लेकर कोलेजियम का मामला भी उठ रहा है। यह मसला रह-रहकर इसीलिए उठता है, क्योंकि कोलेजियम के जरिए हमारे न्यायाधीशों ने स्वयं को नियुक्त करने का अधिकार ले रखा है। दुनिया के किसी लोकतांत्रिक देश में ऐसा नहीं है। सच तो यह है कि यह संविधान की भावना के उलट है।

सुप्रीम कोर्ट ने न्यायाधीशों की नियुक्ति संबंधी एनजेएसी कानून को असंवैधानिक ठहरा दिया था तो इसका यह मतलब नहीं कि उसने सही किया। उसने तो यह स्पष्ट ही नहीं किया कि एनजेएसी किस तरह से संविधान विरुद्ध है? संसद के बनाए कानून को खारिज करने वाला ऐसा कोई फैसला असंवैधानिक ही कहा जाएगा, जिसमें यह न स्पष्ट किया गया हो कि वह कानून संविधान के किस प्रावधान का उल्लंघन करता है?

 

मेरी समझ से एनजेएसी को खारिज करने का सुप्रीम कोर्ट का फैसला न केवल असंवैधानिक था, बल्कि एकपक्षीय और अलोकतांत्रिक भी। सुप्रीम कोर्ट को संसद के बनाए कानून की विवेचना करने का तो अधिकार है, लेकिन उसे कानून बनाने का अधिकार नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने एनजेएसी को खारिज करने के साथ ही जिस कोलेजियम सिस्टम को फिर से अपना लिया, उसका तो संविधान में जिक्र ही नहीं है। हमारे न्यायाधीश जिस ब्रिटेन के न्यायाधीशों की टिप्पणियों का अक्सर जिक्र करते रहते हैं वहां भी जजों की नियुक्ति के लिए एक आयोग बना हुआ है। न्यायाधीशों की ओर से ही न्यायाधीशों की नियुक्ति करने वाली व्यवस्था से भारतीय लोकतंत्र की गरिमा बढ़ती नहीं।