Deprecated (16384): The ArrayAccess methods will be removed in 4.0.0.Use getParam(), getData() and getQuery() instead. - /home/brlfuser/public_html/src/Controller/ArtileDetailController.php, line: 73
 You can disable deprecation warnings by setting `Error.errorLevel` to `E_ALL & ~E_USER_DEPRECATED` in your config/app.php. [CORE/src/Core/functions.php, line 311]
Deprecated (16384): The ArrayAccess methods will be removed in 4.0.0.Use getParam(), getData() and getQuery() instead. - /home/brlfuser/public_html/src/Controller/ArtileDetailController.php, line: 74
 You can disable deprecation warnings by setting `Error.errorLevel` to `E_ALL & ~E_USER_DEPRECATED` in your config/app.php. [CORE/src/Core/functions.php, line 311]
Warning (512): Unable to emit headers. Headers sent in file=/home/brlfuser/public_html/vendor/cakephp/cakephp/src/Error/Debugger.php line=853 [CORE/src/Http/ResponseEmitter.php, line 48]
Warning (2): Cannot modify header information - headers already sent by (output started at /home/brlfuser/public_html/vendor/cakephp/cakephp/src/Error/Debugger.php:853) [CORE/src/Http/ResponseEmitter.php, line 148]
Warning (2): Cannot modify header information - headers already sent by (output started at /home/brlfuser/public_html/vendor/cakephp/cakephp/src/Error/Debugger.php:853) [CORE/src/Http/ResponseEmitter.php, line 181]
Notice (8): Undefined variable: urlPrefix [APP/Template/Layout/printlayout.ctp, line 8]news-clippings/नदी-जोड़-योजना-पर-पुनर्विचार-जरूरी-पंकज-चतुर्वेदी-11568.html"/> न्यूज क्लिपिंग्स् | नदी जोड़ योजना पर पुनर्विचार जरूरी-- पंकज चतुर्वेदी | Im4change.org
Resource centre on India's rural distress
 
 

नदी जोड़ योजना पर पुनर्विचार जरूरी-- पंकज चतुर्वेदी

अभी केंद्र सरकार ने तय कर दिया है कि भारत पेरिस जलवायु समझौते पर अमल करेगा और अपने यहां कार्बन उत्सर्जन घटाने पर गंभीरता से काम करेगा। ठीक उसी समय हुक्मरान तय कर चुके हैं कि देश में नदियों को जोड़ने की परियोजना लागू करना ही है और उसकी शुरुआत बुंदेलखंड से होगी जहां केन व बेतवा को जोड़ा जाएगा। असल में आम आदमी नदियों को जोड़ने का अर्थ समझता है कि किन्हीं पास बह रही दो नदियों को किसी नहर जैसी संरचना के माध्यम से जोड़ दिया जाए, जिससे जब एक में पानी कम हो तो दूसरे का उसमें मिल जाए। पहले यह जानना जरूरी है कि असल में नदी जोड़ने का मतलब है, एक विशाल बांध और जलाशय बनाना और उसमें जमा दोनों नदियों के पानी को नहरों के माध्यम से उपभोक्ता तक पहुंचाना। केन-बेतवा जोड़ योजना कोई बारह साल पहले जब तैयार की गई थी तो उसकी लागत पांच सौ करोड़ के करीब थी।


अभी वह कागज पर ही है और 2015 में इसकी अनुमानित लागत अठारह सौ करोड़ तक पहुंच गई। सबसे बड़ी बात यह कि जब नदियों को जोड़ने की योजना बनाई गई थी, तब देश व दुनिया के सामने ग्लोबल वार्मिंग, ओजोन क्षरण, ग्रीनहाउस प्रभाव जैसी चुनौतियां नहीं थीं, जबकि गंभीरता से देखें तो नदी जोड़ जैसी परियोजनाएं इन वैश्विक संकटों को और बढ़ा देंगी।


जलवायु परिवर्तन के कारण चेन्नई में पिछले साल और उससे पहले कश्मीर में आई तबाही की बानगी शायद बुंदेलखंडवासी भूल गए हों, लेकिन वे इस बार उसी प्राकृतिक आपदा का स्वाद चख रहे हैं। तीन साल के भयंकर सूखे के बाद इस बार जो बरख बरस रहे हैं कि कई जगह पंद्रह दिनों से जनजीवन ठप है। सैकड़ों जगह ऐसी हैं जहां तालाबों की जल-निकासी के पारंपरिक ‘ओने' खोलना पड़ा है। बरसात की त्रासदी इतनी गहरी है कि भले ही जल-स्रोत लबालब हो गए हैं लेकिन खेतों में बुआई नहीं हो पाई और जहां हुई वहां बीज सड़ गए। ग्लोबल वार्मिंग से उपज रही जलवायु अनियमितता और इसके दुष्प्रभाव के प्रति सरकार व समाज में बैठे लोग कम ही वाकिफ या जागरूक हैं। यह भी जान लें कि आने वाले दिनों में यह संकट और गहराना है, खासकर भारत में इसके कारण मौसम के चरम रूप यानी असीम गरमी, भयंकर ठंड, बेहिसाब सूखा या बरसात। प्राय: जिम्मेदार लोग यह कह कर पल्ला झाड़ते दिखते हैं कि यह तो वैश्विक संकट है, हम इसमें क्या कर सकते हैं!


केन और बेतवा दोनों का ही उद्गम स्थल मध्यप्रदेश में है। दोनों नदियां लगभग समांतर एक ही इलाके से गुजरती हुई उत्तर प्रदेश में जाकर यमुना में मिल जाती हैं। जाहिर है, जब केन के जलग्रहण क्षेत्र में अल्पवर्षा या सूखे का प्रकोप होगा तो बेतवा की हालत भी ऐसी ही होगी। तिस पर अठारह सौ करोड़ (भरोसा है कि जब इस पर काम शुरू होगा तो यह राशि बाईस सौ करोड़ तक पहुंच जाएगी) की योजना न केवल संरक्षित वन का नाश, हजारों लोगों के पलायन का कारक बन रही है, बल्कि इससे उपजी संरचना दुनिया का तापमान बढ़ाने में ही मददगार होगी।


नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर स्पेस रिसर्च (आइएनपीसी), ब्राजील का एक गहन शोध है कि दुनिया के बड़े बांध हर साल 104 मिलियन मीट्रिक टन मीथेन गैस का उत्सर्जन करते हैं और यह वैश्विक तापमान में वृद्धि के कुल मानवीय योगदान का चार फीसद है। सनद रहे कि बड़े जलाशय, दलदल बड़ी मात्रा में मीथेन का उत्सर्जन करते हैं। ग्लोबल वार्मिंग के लिए जिम्मेवार मानी जाने वाली गैसों को ग्रीनहाउस गैस कहते हैं। इनमें मुख्य रूप से चार गैसें- कार्बन डाइआॅक्साइड, मीथेन, नाइट्रस आॅक्साइड और सल्फर हेक्साफ्लोराइड- तथा दो गैस-समूह- हाइड्रोफ्लोरोकार्बन और परफ्लोरोकार्बन शामिल हैं। ग्रीनहाउस गैसों के अत्यधिक उत्सर्जन से वायुमंडल में उनकी मात्रा निरंतर बढ़ती ही जा रही है। ये गैसें सूर्य की गर्मी के बड़े हिस्से को परावर्तित नहीं होने देतींं, जिससे गर्मी की जो मात्रा वायुमंडल में फंसी रहती है, उससे तापमान में वृद्धि हो जाती है।


पिछले बीस से पचास वर्षों में वैश्विक तापमान में करीब एक डिग्री सेंटीग्रेड की वृद्धि हो चुकी है। केन-बेतवा को जोड़ने के लिए छतरपुर जिले के ढोढन में 77 मीटर ऊंचा और 2031 मीटर लंबा बांध बनाया जाएगा। इसके अलावा 221 किलोमीटर लंबी नहरें भी बनेंगी। इससे होने वाले वनों के नाश और पलायन को अलग भी रख दें तो भी निर्माण, पुनर्वास आदि के लिए जमीन तैयार करने व इतने बड़े बांध व नहरों से इतना दलदल बनेगा और यह मीथेन गैस उत्सर्जन का बड़ा कारक साबित होगा। भारत आज कोई 3 करोड़ 35 लाख टन मीथेन उत्सर्जन करता है और हमारी सरकार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसे कम करने के लिए प्रतिबद्ध है।


इस परियोजना का सबसे बड़ा असर दुनिया भर में मशहूर तेजी से विकसित बाघ क्षेत्र के नुकसान के रूप में भी होगा। पन्ना नेशनल पार्क का 41.41 वर्ग किलोमीटर वह क्षेत्र पूरी तरह जलमग्न हो जएगा, जहां आज तीस बाघ हैं। सनद रहे कि 2006 में यहां बाघ बिल्कुल नहीं थे। सिर्फ बाघों की संरक्षित रिहाइश नष्ट नहीं होगी, जंगल के तैंतीस हजार पेड़ भी काटे जाएंगे। यह भी जान लें कि इतने पेड़ तैयार होने में कम से कम आधी सदी का समय लगेगा। जाहिर है, जंगल कटाई व वन का नष्ट होना, जलवायु परिवर्तन को प्रभावित करने वाले कारक हैं। यही नहीं, जब यह परियोजना बनाई गई थी, तब बाघ व जंगली जानवर कोई विचारणीय मसले थे ही नहीं, जबकि आज दुनिया के सामने जैव विविधता संरक्षण एक बड़ी चुनौती है।