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नमक के नए दारोगा- विकास नारायण राय

जनसत्ता 11 अप्रैल, 2014 : संसाधन घोटालों (कोयला, लोहा, गैस, तेल, रेत, जल, जंगल, जमीन) से बोझिल राजनीतिक वातावरण में, देश के शासन का ईमानदारी से संचालन, 2014 के चुनावी घोषणापत्रों की एक प्रमुख थीम है। तीस हजार करोड़ रुपए चुनाव में दांव पर लगाने वाले राजनीतिकों में होड़ है कि अगला ‘नमक का दारोगा’ कौन बनेगा! नमक जैसे सुलभ पदार्थ को औपनिवेशिक लूट का जरिया बनाए जाने की पृष्ठभूमि में, 1919-20 में, अमर कथाकार प्रेमचंद की ‘नमक का दारोगा’ कहानी प्रकाशित हुई, जो ब्रिटिश राज, व्यापारी वर्ग और नौकरशाही के भ्रष्ट गठजोड़ को नंगा करने वाला वृत्तांत है। कहानी में आज की ‘क्रोनी कैपिटल’ की स्वाभाविक झलक भी है।
प्रेमचंद स्वयं सरकारी विभाग में कार्यरत थे और स्वाभाविक रहा होगा कि वे सरकारी कोप के डर से बच-बचा कर लिखें। लिहाजा, पहली नजर में ‘नमक का दारोगा’ भ्रष्ट प्रशासनिक मशीनरी के एक अपवादस्वरूप ईमानदार कर्मचारी की मात्र प्रेरक कहानी नजर आती है। पर अपनी विचक्षणता से प्रेमचंद जनता के मतलब की यह अनकही सच्चाई भी कथानक में पिरोने में सफल हैं कि ऐसी ईमानदारी से शासन का जन-विरोधी चरित्र नहीं बदलता। अंतत: नमक के शातिर व्यापारी ने, जिसकी रिश्वत की पेशकश दारोगा ने ठुकराई थी, उसे अपना वेतनभोगी कारिंदा ही बना लिया। क्रोनी कैपिटल का यह सफल खेल- कॉरपोरेट, राजनीति और नौकरशाही का खुला गठजोड़- स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद उत्तरोत्तर आगे से आगे परवान चढ़ता रहा है। ऐसे में क्या चुनाव बाद का नया दारोगा, राष्ट्रीय संसाधनों पर क्रोनी कैपिटल की जकड़बंदी को तोड़ने जा रहा है?

कहानी को, लगभग एक शताब्दी गुजर जाने के बाद भी, क्रोनी कैपिटल की आज की दुनिया में झांकने की खिड़की मानना असंगत न होगा। प्रेमचंद ने पूंजी और प्रशासन के याराने की समाज-विरोधी गठजोड़ की यह दास्तान ‘ईमानदारी बनाम सच्चाई’ की अंतर्वस्तु पर गढ़ी थी। ध्वनि यह कि ‘ईमानदारी’ शासक की जमीन हुई और ‘सच्चाई’ जनता की। स्वतंत्र भारत को, शासन और पूंजी का भ्रष्ट याराना, अंगरेजी राज से विरासत में मिला। तो भी, पिछले तीन-चार वर्षों में लोकपाल आंदोलन के तूल पकड़ने और अब भ्रष्टाचार के मसले पर ‘आप’ के एक जोशीली राजनीतिक पार्टी के स्वरूप में उभरने से, क्रोनी कैपिटलिज्म यानी याराना या बिचौलिया पूंजीवाद राष्ट्रीय चुनावों में उल्लेखनीय मुद्दा बन सका है। हालांकि इस विमर्श को सत्ता के दावेदारों द्वारा ‘ईमानदारी’ के दायरे में सीमित रखने से, ‘सच्चाई’ का जन-आयाम फिर भी पीछे ही रहा। मीडिया और न्यायपालिका की हलचल में भी सुशासन के आयामों को ‘ईमानदारी’ के मापदंड पर कसने की ही पहल दिखती है- उसे ‘सच्चाई’ की जन-कसौटी तक ले जाने की नहीं।

समकालीन राजनीति में ईमानदारी और सच्चाई के बीच का अंतर जानना हो तो एक नजर प्रधानमंत्री के रूप में मनमोहन सिंह पर डालना काफी होगा- ईमानदारी में शत-प्रतिशत और सच्चाई में शून्य। शायद ही कोई मानना चाहेगा कि मनमोहन सिंह ने आर्थिक घोटालों से भरे अपने कार्यकाल में स्वयं रिश्वत-भरी हिस्सेदारी की होगी; पर सभी जानते हैं कि संविधान के अनुसार काम करने की शपथ लेने के बावजूद वे एक रबर स्टैंप बन कर ही रहे। यह व्यक्तित्व का विरोधाभास नहीं, शासन की तकनीक हुई।

लूट और शोषण की घोषित औपनिवेशिक व्यवस्था चलाने वाले अंग्रेजों ने भी अपने प्रशासन में ईमानदारी के महिमामंडन पर जोर बनाए रखा था, पर सच्चाई का दावा तो क्या, कभी दिखावा भी नहीं किया। उन्होंने ‘ऑनेस्टी इज द बेस्ट पॉलिसी’ के मॉडल पर अपना प्रशासन चलाया। ‘ईमानदारी’ भी उनके शासन की नीति भर थी; मूल्य नहीं! सरकारी अमले को औपनिवेशिक शासकों के शोषक लक्ष्यों के प्रति ईमानदार रहना होता था, न कि जनता के व्यापक हितों के प्रति।

बेमतलब नहीं है कि अंगरेजी भाषा में ऑनेस्टी (ईमानदारी) और इंटीग्रिटी (सच्चाई) दो अलग-अलग शब्द हैं। मेरे दिवंगत मित्र, साहित्यकार ओमप्रकाश वाल्मीकि विद्रूप से कहा करते थे कि हिंदी भाषा में ऑनेस्टी का कोई पर्यायवाची शब्द नहीं है- ‘ईमानदारी’, फारसी से आया शब्द है। देखा जाए तो इस अर्थ में ‘बेईमानी’ का भी कोई पर्यायवाची शब्द हिंदी में नहीं है। दरअसल, भारत की तमाम भाषाओं में इन दोनों शब्दों के पर्यायवाची नदारद हैं। ऐसा इसलिए कि भारतीय समाजों में महत्त्व ‘सच्चाई’ से ध्वनित मूल्य का रहा है। ‘सच्चाई’ में नैतिकता की संपूर्ण सामाजिक अवधारणा समाहित रही। जो सच्चा वह अच्छा! लिहाजा अलग से ‘ईमानदारी’ की जरूरत नहीं रह जाती। तभी गांधी ने ‘सत्याग्रह’ को भारतीय जनता की लामबंदी का हथियार बनाया और सार रूप में दर्शन दिया- सत्य ही ईश्वर है!

चुनाव के दौर में विभिन्न राजनीतिक दलों की ओर से तरह-तरह के मुद्दे और मसले, मतदाता के बीच, अनुकूल ध्रुवीकरण के लिए उछाले जाते हैं। इस घमासान में एक समांतर ध्रुवीकरण जनता और शासकों के बीच भी शाश्वत नजर आएगा। यह जनता की प्राथमिकताओं यानी ‘सच्चाई’ और शासकीय पहलों यानी ‘ईमानदारी’ के आयामों की टकराहट पर आधारित है। सत्ता की जंग में जुटे राजनीतिक दल एक-दूसरे की ईमानदारी को चुनौती देते हैं और इस लिहाज से एक-दूसरे से बेहतर दिखना चाहते हैं। दूसरी तरफ जनता उन्हें सच्चाई के पैमाने पर कसती है और सभी को एक जैसे पाले में खड़ा पाती है।

जनता के नजरिए से, मनमोहन सिंह के दस साल के कार्यकाल में कांग्रेस सरकार के डीएनए से नदारद होती ‘सच्चाई’ इसी समांतर ध्रुवीकरण की बानगी कही जाएगी। इसीलिए मोदी के गुजरात में लोकायुक्त का न होना आम मतदाता के लिए बड़ी खबर नहीं बनती, और यहां तक कि ईमानदारी के मोर्चे पर ‘आप’ का जन-लोकपाल भी आदमखोर शेरों के सामने एक चूहेदानी जैसा ही लगता है।

इस समांतर ध्रुवीकरण का सहज असर है कि भारत की क्रोनी कैपिटल लॉबी, जिसने दस वर्षों तक उदार मनमोहन सिंह सरकार से घनिष्ठ संबंध रखा, नरेंद्र मोदी के संकीर्ण राजनीतिक नेतृत्व को लेकर भी समान रूप से आश्वस्त नजर आती है। मनमोहन की घोषित व्यक्तिगत ईमानदारी और मोदी के ईमानदार प्रशासन की दावेदारी, दोनों में कमोबेश प्रेमचंद का अंगरेजी शासनकाल का ‘नमक का दारोगा’ देखा जा सकता है।

कहानी में दारोगा वंशीधर की खांटी ईमानदारी, अंतत: प्रशासन-पूंजी के भ्रष्ट याराने का दूरगामी स्वार्थ ही सिद्ध करती है। रिश्वत के बड़े से बड़े प्रलोभन को ठुकराने वाला यह दारोगा, जमींदार-व्यवसायी पंडित अलोपीदीन की नमक की तस्करी से कमाई जायदाद की देखभाल में भी ईमानदारी के उसी मिशनरी जज्बे के साथ बखूबी तत्पर हो जाता है। 2014 के चुनाव परिणामों को लेकर देश की क्रोनी कैपिटल की बेफिक्री के आलम का भी ऐसा ही समीकरण है। नमक के एक दारोगा, मनमोहन सिंह की पारी बेशक पूरी हो गई हो; दूसरे दारोगा, नरेंद्र मोदी के शासन की बागडोर संभालने पर तो खुद अलोपीदीन ही वंशीधर की भूमिका में भी होगा।

कहानी ‘नमक का दारोगा’ में तत्कालीन पैमाने पर आज के क्रोनी याराने का समूचा माहौल दृष्टिगोचर है। जो स्थिति आज कोयला, लोहा, तेल, गैस, रेत जैसे खनिज पदार्थों को लेकर है, उस जमाने में नमक को लेकर रही होगी। समाज में ‘सच्चाई’ की आज जैसी वस्तुस्थिति- ‘जब नमक का नया विभाग बना और ईश्वर प्रदत्त वस्तु के व्यवहार करने का निषेध हो गया तो लोग चोरी-छिपे इसका व्यवहार करने लगे। अनेक प्रकार के छल-प्रपंचों का सूत्रपात हुआ, कोई घूस से काम निकालता था, कोई चालाकी से। अधिकारियों की पौ बारह थी।’ सरकारी कामकाज में ‘ईमानदारी’ की भूमिका भी आज जैसी- ‘मासिक वेतन तो पूर्णमासी का चांद है, जो एक दिन दिखाई देता है और घटते-बढ़ते लुप्त हो जाता है। ऊपरी आय बहता हुआ स्रोत है, जिससे सदैव प्यास बुझती है।’ और क्रोनी कैपिटल की पहुंच? नमक तस्करी का काफिला सरे-राह पकड़ा गया तो भी क्या- ‘पंडित अलोपीदीन का लक्ष्मीजी पर अखंड विश्वास था। वे कहा करते थे कि संसार का तो कहना ही क्या, स्वर्ग में भी लक्ष्मी का ही राज्य है। उनका यह कहना यथार्थ ही था। न्याय और नीति सब लक्ष्मी के ही खिलौने हैं, इन्हें वह जैसा चाहती हैं नचाती हैं।’

अब आया असल प्रसंग। तस्कर अलोपीदीन की अदालत में पेशी। मोइली-अंबानी का क्रोनी नाच! ‘अदालत में पहुंचने की देर थी। पंडित अलोपीदीन इस अगाध वन के सिंह थे। अधिकारी वर्ग उनके भक्त, अमले उनके सेवक, वकील-मुख्तार उनके आज्ञापालक और अरदली, चपरासी और चौकीदार तो उनके बिना मोल के गुलाम थे। उन्हें देखते ही लोग चारों ओर से दौड़े। सभी विस्मित हो रहे थे। इसलिए नहीं कि अलोपीदीन ने क्यों यह कर्म किया, बल्कि इसलिए कि वह कानून के पंजे में कैसे आए!’ अलोपीदीन बाइज्जत बरी हुए और वंशीधर बाकायदा मुअत्तल। तस्कर ने मौका देख कर दारोगा को अपना मैनेजर बनाने का पांसा फेंका- ‘संसार में ऐसे कितने धर्मपरायण मनुष्य हैं, जो धर्म पर अपना सब कुछ अर्पण कर सकें?’ आज के अलोपीदीनों को भी वंशीधरों की यारी सहज उपलब्ध है; राजनीतिकों और नौकरशाहों का कॉरपोरेट जेबों में होने में नया कुछ भी नहीं।

फिर भी, 2014 के चुनावी संदर्भ में कहानी का पुनर्पाठ तभी संगत कहा जाएगा जब यह शासक और जनता के बीच ध्रुवीकरण के दोनों सिरों, ‘ईमानदारी’ और ‘सच्चाई’, को रेखांकित करे। कांग्रेसी मनमोहन और भाजपाई मोदी जैसे क्रोनी-कैपिटल के विश्वासपात्रों से इतर, दारोगा की एक तीसरी छवि भी कहानी में है- ‘आप’ के अरविंद केजरीवाल की! दारोगा ने तस्कर की गिरफ्तारी का हुक्म दे दिया और मोलभाव की नौबत आ गई- ‘धर्म की इस बुद्धिहीन दृढ़ता और देव-दुर्लभ त्याग पर धन बहुत झुंझलाया। अब दोनों शक्तियों में संग्राम होने लगा। धन ने उछल-उछल कर आक्रमण करने शुरू किए। एक से पांच, पांच से दस, दस से पंद्रह और पंद्रह से बीस हजार तक नौबत पहुंची, लेकिन धर्म अलौकिक वीरता के साथ इस बहुसंख्यक सेना के सम्मुख अकेला पर्वत की भांति अटल, अविचलित खड़ा था।’

पर यह अब भी ‘सच्चाई’ का नहीं, ‘ईमानदारी’ का ही सिरा हुआ। प्रेमचंद को इस पर भी, अलोपीदीन की गिरफ्तारी के प्रसंग में, ‘यथा राजा तथा प्रजा’ का आवरण चढ़ाना पड़ा- ‘जिसे देखिए वही पंडितजी के इस व्यवहार पर टीका-टिप्पणी कर रहा था, निंदा की बौछारें हो रही थीं, मानो संसार से अब पापी का पाप कट गया।’ अंगरेजी राज का कारिंदा प्रेमचंद ‘सच्चाई’ का सिरा एक सीमा तक ही पकड़ सकता था। कहानीकार प्रेमचंद ने यह कसर अपनी विचक्षणता से पूरी की। लीक से अलग उनके दारोगा के समांतर किरदार ने शासन के जन-विरोधी चरित्र को ही बेतरह उजागर किया- दिखाया कि सरकारी अमले का व्यापक भ्रष्टाचार औपनिवेशिक लूट का एक सहज हथकंडा ही तो था! क्रोनी कैपिटल को नंगा करने की भूमिका में ‘आप’ का ‘नमक का दारोगा’ बनने का चुनावी दावा इन्हीं सीमाओं और संभावनाओं के परिदृश्य का हिस्सा है।