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निजीकरण नहीं वनों का हो कायाकल्प-- रामचंद्र गुहा

पैंतालीस साल पहले अलकनंदा घाटी के ग्रामीणों ने जब जंगल से पेड़ काटकर ले जाने वालों को रोका, तो किसी ने सोचा न होगा कि यहीं से चिपको आंदोलन की नींव पड़ने जा रही है। एक ऐसा किसान आंदोलन, जिसने भारत में वनों के व्यावसायिक दोहन पर सबका ध्यान खींचा। चिपको आंदोलन का ही यह असर था कि वनाधिकारों के प्रति जागरूकता बढ़ी। गढ़चिरौली, बस्तर, सिंहभूम और पश्चिमी घाट सहित देश भर से वनाधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष की खबरें आने लगीं। इन सामाजिक आंदोलनों ने अध्येताओं को वन-नीति का इतिहास खंगालने पर मजबूर कर दिया। तमाम लेख और किताबें आईं, जिनमें ब्रिटिश हुकूमत के दौरान वन क्षेत्र के दोहन की ही नहीं, अंग्रेजों द्वारा ग्राम सभाओं के हाथों से छीनकर वनों को संरक्षित घोषित करने की कहानी भी थी। बताया गया था कि किस तरह किसानों, आदिवासियों, शिल्पियों की वनों तक पहुंच रोकी गई, जो अब गहन व्यावसायिक शोषण का रूप ले चुकी है।

आजादी के वक्त देश के कुल भूभाग का 20 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा भारत सरकार के वन विभाग के अधीन था। दुर्भाग्यवश लोकतांत्रिक गणतंत्र ने भी औपनिवेशिक शासन की दमनकारी नीतियों को जारी रखना ही बेहतर समझा। बढ़ती वाणिज्यिक मांग, खासतौर से प्लाइवुड और कागज उद्योग की बढ़ती जरूरतों ने जंगलों की कटाई और तेज कर दी। नतीजतन आजादी के बाद की वन नीतियां सामाजिक ध्रुवीकरण और पर्यावरणीय गिरावट बढ़ाने वाली साबित हुईं।
हालांकि चिपको आंदोलन और इसके मद्देनजर सामने आए अध्ययनों से सरकारी प्राथमिकताएं बदलीं। 1988 में औपचारिक रूप से नई वन-नीति सामने आई, जिसमें व्यावसायिक दोहन की बजाय पारिस्थितिकीय स्थिरता और आजीविका सुरक्षा पर जोर था। इसने बिना सोचे-समझे वनों में विदेशी प्रजातियों की वानिकी पर अंकुश लगाया। निजी उद्योगों को दी जाने वाली भारी-भरकम सब्सिडी बंद हुई। मसलन, कर्नाटक का वन विभाग एक पेपर मिल से एक बांस की कीमत महज एक रुपया लेता था, जबकि टोकरी बनाने वाले शिल्पियों को वही बांस लेने के लिए पांच हजार रुपये प्रति टन की बाजार दर चुकानी पड़ती थी। यह भेद खत्म हुआ।

1988 की वन-नीति में भी कई खामियां थीं, लेकिन यह अतीत की गलतियां सुधारने की दिशा में एक बड़ा कदम तो था ही। साल 2007 में पारित वन अधिकार अधिनियम इस दिशा में दूसरा बड़ा कदम है, जिसने प्राकृतिक वनों पर आदिवासियों की निर्भरता के सच को स्वीकार किया। पिछली सरकारें तो आदिवासियों की कीमत पर निजी कंपनियों के हितों को ही तरजीह देती आई थीं। नए कानून ने सरकारी वन क्षेत्र के छोटे-छोटे टुकड़ों में आदिवासी परिवारों को इस्तेमाल और ग्राम सभाओं के माध्यम से बांस व अन्य कई गैर-लकड़ी वन सामानों के उत्पादन की छूट दी।
हमारे लोकतंत्र के लिए सामाजिक एकता और पर्यावरणीय स्थिरता, दोनों ही बहुत महत्वपूर्ण हैं। इनके प्रति प्रतिबद्ध सरकार ही वन नीतियों को और अधिक समावेशी व पारिस्थितिकीय तौर पर ज्यादा सकारात्मक बनाकर सही दिशा में ले जा सकती है। हालांकि वर्तमान सरकार पिछले तीन दशकों से चली आ रही परिपाटी के विपरीत एक बार फिर निजी क्षेत्र के हितों के प्रति नरम दिखाई दे रही है। पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा 14 मार्च को जारी ‘2018 की मसौदा वन-नीति' पढ़ने के बाद तो यही निष्कर्ष निकलता है।

इसमें इंसानी अस्तित्व के लिए वनों को जरूरी बताने के साथ ही वन-नीति को वर्तमान और भावी पीढ़ियों की पारिस्थितिक और आजीविका की सुरक्षा सुनिश्चित करने वाला होने की जरूरत बताई गई है। यह जलवायु परिवर्तन कम करने के लिए वनों की भूमिका को भी रेखांकित करता है। यह तमाम राज्यों में वन वृक्षारोपण की उत्पादकता की खराब स्थिति पर चिंता तो जताता है, लेकिन खत्म हो चुके या वन विकास निगमों से अलग के वन क्षेत्रों में वनीकरण और पुनर्निर्माण के लिए पीपीपी मॉडल अपनाने की बात करता है। मसौदे में देशव्यापी स्तर पर जंगल व वृक्षों का बढ़ा हुआ लक्ष्य हासिल करने के लिए वन निगमों, वन विकास निगमों, समुदायों, पब्लिक लिमिटेड कंपनियों को शामिल कर एक उपयुक्त पीपीपी मॉडल विकसित करने की जरूरत बताई गई है। यह वन-नीति अमल में आ गई, तो संरक्षित वन का बड़ा हिस्सा निजी कंपनियों के हाथ जाने का रास्ता साफ हो जाएगा। इसके कई खतरे हैं। 1980 में कर्नाटक सरकार ने भी कुछ ऐसा ही किया था, जब उसने एक निजी कंपनी के साथ सौदा किया और एक नई कंपनी बनाकर ऐसी कई हजार एकड़ जमीन उसे सौंप दी थी, जिसका इस्तेमाल स्थानीय किसान मवेशियों को चराने और ईंधन की लकड़ी जुटाने के लिए करते थे।

अगर कागज और प्लाइवुड कारखानों को कच्चे माल के तौर पर लकड़ी की जरूरत है ही, तो बेहतर होगा कि वे किसानों के बीच जाएं, उन्हें बीज और ऋण उपलब्ध कराने के साथ तकनीकी जानकारी दें और बदले में उन्हें अपने उत्पादों के लिए उपयोगी पेड़ तैयार करने को प्रेरित करें। यह साझेदारी किसान या किसानों के कोऑपरेटिव और कंपनी के बीच हो सकती है। ईमानदारी से ऐसी नीति को लागू किया जाए, तो ग्रामीण भारत का आर्थिक चेहरा बदलने में यह कारगर साबित हो सकता है। निजी कंपनियों के संरक्षण में होने वाला यह वृक्षारोपण उन समूहों को कहीं आगे ले जाएगा, जो फिलहाल सामान्य भूमि और वनों पर निर्भर हैं।

नई मसौदा नीति कृषि वानिकी के साथ ‘वनों से बाहर पेड़' के महत्व पर बात करती है। बेहतर होता कि यह सार्वजनिक संसाधन निजी हाथों में देने की बजाय इच्छित लकड़ी उत्पादन की ऐसी पद्धति की वकालत करती। हालांकि भारत का लगभग 23 प्रतिशत क्षेत्र आधिकारिक तौर पर वन क्षेत्र के रूप में वर्गीकृत है, लेकिन इसके आधे में वृक्ष ही नहीं हैं। ऐसे में, एक समझदारीपूर्ण वन-नीति अपनाने की जरूरत है, जो सबसे पहले बंजर या खत्म हो चुके वन क्षेत्र में स्वदेशी प्रजातियों की खेती को बढ़ावा देकर जैव विविधता के संरक्षण के साथ ही जल स्रोतों की सुरक्षा और जलवायु परिवर्तन कम करने में मददगार साबित हो। वन-नीति का दूसरा फोकस संरक्षित वनों और इनके आसपास रहने वाले किसानों और आदिवासियों की आजीविका सुरक्षित रखने पर होना चाहिए। नई वन-नीति का मसौदा फिलहाल ये शर्तें पूरी नहीं करता।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)