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नीति आयोग का दृष्टिपत्र-- प्रसेनजित बोस

आधिकारिक आकलनों के अनुसार, 2014-15, 2015-16 और 2016-17 में सकल घरेलू उत्पादन (जीडीपी) में भारतीय अर्थव्यवस्था की वार्षिक वृद्धि दर क्रमशः 7.2, 7.9 और 7.1 फीसदी रही है. हाल के दिनों में चीनी अर्थव्यवस्था में मंदी के मद्देनजर भारत की मौजूदा सरकार के अंतर्गत देश को 'दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती हुई बड़ी अर्थव्यवस्था' माना गया है. अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की एक बैठक में वित्त मंत्री अरुण जेटली ने सदस्यों को याद दिलाया कि भारत की जीडीपी में तेज बढ़त के साथ थोड़ी खुदरा मुद्रास्फीति (फिलहाल चार फीसदी से नीचे), वित्तीय और चालू खाता के संतुलनों में बेहतरी, प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में बढ़त और विदेशी मुद्रा भंडार में वृद्धि जैसे तत्व भी जुड़े हुए हैं.


इन संकेतकों ने भी बहुत आशावादी दीर्घकालीन अनुमानों को आधार उपलब्ध कराया है. नीति आयोग ने आगामी 15 वर्षों में भारतीय अर्थव्यवस्था में बदलाव के लिए एक दृष्टि पत्र जारी किया है. यह दावा किया गया है कि 2031-32 तक देश पूर्ण साक्षरता हासिल कर लेगा तथा सभी नागरिकों की पहुंच स्वास्थ्य सेवाओं, शौचालय-युक्त आवास, रसोई गैस, बिजली और डिजिटल जुड़ाव तक हो जायेगी. यहां तक कि 'लगभग सभी' को वाहन और एसी उपलब्ध होंगे. यह दृष्टि आगामी 15 सालों तक आठ फीसदी के वास्तविक सालाना वृद्धि के अनुमान तथा सामान्य जीडीपी के 27 फीसदी के करीब वार्षिक सरकारी खर्च के प्रस्ताव पर आधारित है.


हमारे देश के आर्थिक प्रदर्शन की मजबूती और उसके बरकरार रहने की क्षमता का आकलन करने में कुछ कारकों को संज्ञान में लेना होगा. हाल के समय में निजी निवेश में अच्छी-खासी कमी के बावजूद तेज वृद्धि हो रही है, जो कि बड़े पैमाने पर लटके हुए कॉरपोरेट कर्जे का नतीजा है.


वर्ष 2016-17 का आर्थिक सर्वे रेखांकित करता है कि निजी निवेश (वास्तविक सकल फिक्स्ड पूंजी निर्माण) 2015-16 से घटना शुरू हुआ है और 2016-17 की पहली छमाही में भी इसमें बढ़ोतरी नकारात्मक रही है जिससे कुल निवेश की वृद्धि नीचे होकर नकारात्मक हिसाब में चली गयी. यह प्रवृत्ति 2003-04 से 2007-08 के वृद्धि के पहले चरण के विपरीत है, जब निजी कॉरपोरेट निवेश में तेज बढ़त हुई थी जिसमें सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों द्वारा बड़े पैमाने पर दिये गये कर्ज की महत्वपूर्ण भूमिका थी. पिछले दशक के विकास के चरण का नतीजा यह हुआ कि बैंकिंग तंत्र में फंसे हुए कर्ज का बोझ बढ़ता गया. इस बोझ में मुख्य रूप से इंफ्रास्ट्रक्चर (ऊर्जा, सड़क, दूरसंचार) तथा लोहा एवं इस्पात जैसे क्षेत्रों के कर्जे हैं.
निरंतर गिरते निवेश और घटते क्रेडिट वृद्धि के होते हुए विकास की गति को कैसे बरकरार रखा जा सकता है?


साल 2016-17 में वित्तीय और राजस्व घाटे को कम कर जीडीपी के 3.5 और 2.1 फीसदी तक लाया गया है, जिससे पूंजी निर्माण हुआ है. ऐसा अतिरिक्त राजस्व संग्रहण के जरिये किया गया है, खासकर अप्रत्यक्ष करों में भारी वृद्धि कर. बीते तीन सालों में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की भारी स्तर पर घटी कीमतों का फायदा घरेलू उपभोक्ताओं को पहुंचाने के बजाय सरकार ने पेट्रोलियम सेक्टर में शुल्क को बढ़ाना (2013-14 में जीडीपी के 0.7 फीसदी से बढ़ाकर 2016-17 में 1.4 फीसदी तक लाना) पसंद किया.
अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें बढ़ने की स्थिति में सरकार के लिए राजस्व जुटाने की इस रणनीति को कायम रखना संभव नहीं होगा. नोटबंदी, आय घोषणा योजनाएं, भुगतान के डिजिटलीकरण पर नीतिगत जोर और वस्तु एवं सेवा कर प्रणाली को लागू करने जैसे हालिया कदमों का लक्ष्य अधिक राजस्व जुटाने का ही है. यह देखा जाना अभी बाकी है कि क्या ये पहलें राजस्व संग्रहण को बढ़ाती हैं, ताकि सार्वजनिक निवेश और खर्च के उच्च स्तर को संभव बनाया जा सके.


तेल की बढ़ती कीमतों के साथ अमेरिका और अन्य विकसित अर्थव्यवस्थाओं में वृद्धि के चलते ब्याज दरों में बढ़ोतरी भी भारत के चालू खाता संतुलन, मुद्रा विनिमय दर तथा मुद्रास्फीति पर विपरीत असर डाल सकती है. पोर्टफोलियो निवेशकों के अपना पैसा निकालने की वजह से रुपया दबाव में है.


अमेरिका और अन्य विकसित अर्थव्यवस्थाओं में बढ़ते संरक्षणवादी रुझान इस पहल के लिए अनुकूल वातावरण मुहैया कराते हुए नहीं दिखते हैं. पूरी दुनिया में हो रही राजनीतिक और आर्थिक उथल-पुथल भारत के विदेशी व्यापार के लिए अनिश्चितता का संकेत दे रहे हैं. भारत तीव्र विकास के एक और चरण, जैसा कि पिछले दशक में देखा गया था, में प्रवेश करेगा या नहीं, यह अभी स्पष्ट नहीं है. यह बहुत कुछ ऊपर उल्लिखित कारकों की दशा और दिशा पर निर्भर करेगा.
(अनुवादः अरविंद कुमार यादव)