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नीति आयोग ने जिस पैमाने से बिहार को आंका, वह तो उसमें निकला आगे

पटना : नीति आयोग के सीईओ अमिताभकांत ने अपने जिस पैमाने से बिहार को आंकने के बाद बयान दिया है उस क्षेत्र में राज्य रणबाकुरा बना हुआ है. अमिताभकांत का बयान एक तरफ है, सच्चाई दूसरी तरफ. महान अर्थशास्त्री माइकल टोडारो (अमेरिकन) मानव विकास इंडेक्स में पिछड़ेपन के लिए जनसंख्या में तीव्र वृद्धि, निम्न प्रतिव्यक्ति आय और प्राथमिक क्षेत्रों पर निर्भरता को मुख्य कारण मानते हैं.

बिहार ने पिछड़ेपन के इन तीनों कारणों की खाई को पाटने के लिए खूब काम किया है. हर साल की बाढ़ पांच से सात हजार करोड़ का नुकसान कर रही है. राज्य पर दोषारोपण करने वाला नीति आयोग कुछ माह पहले बिहार की पीठ थपथपा चुका है. 'सोशल सेक्टर इंस्पेंडीचर आॅफ स्टेट प्री एंड पोस्ट 14 फाइनेंस कमीशन (2014-15 एवं 2015-16)' की कुछ दिन पहले ही रिपोर्ट जारी हुई है.

इसमें कहा गया है कि बिहार में सकल घरेलू उत्पाद के अनुपात में शिक्षा पर होने वाले व्यय देश के अन्य राज्यों की तुलना में सर्वाधिक है. यह कुल बजट का 20% है. सामाजिक क्षेत्र में राज्य का कुल व्यय का लगभग 40% रहा है. यह राज्य सरकार के मानव विकास के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाता है.

नीति आयोग की ही 'हेल्दी स्टेट प्रोगेसिव इंडिका रिपोर्ट आॅन द रैंक्स आॅफ स्टेट एंड यूनियन टेरेटिरीज' की रिपोर्ट भी तारीफ कर रही है. इसमें खुलासा किया गया है कि बिहार स्वास्थ्य सेवाओं की योजनाओं के फंड ट्रांसफर के दिनों में रिकाॅर्ड गिरावट दर्ज की है. पूर्व में औसतन 135 दिनों में पैसा जिला तक पहुंचता था, जो अब 40 दिनों में ही पहुंच जा रहा है.

मानव विकास इंडेक्स में अच्छा प्रदर्शन

पिछड़ेपन का सबसे बड़ा कारक जनसंख्या तीव्र वृद्धि दर रोकने में बिहार ने पूरे देश में मॉडल पेश किया है. बाल विवाह, दहेज प्रथा, शराबबंदी, साइकिल योजना, त्रिस्तरीय पंचायतीराज व नगर निकाय में महिलाओं को 50% आरक्षण ने महिलाओं का तेजी से विकास किया है. इससे राज्य का जनसंख्या घनत्व कम हो रहा है. 2005-06 में 18 साल से पहले ही शादी का औसत 60.3% था, वह 2015 - 16 में घटकर 39% हो गया.

शहरी क्षेत्र में यह 26.9 ही है. इससे प्रजनन दर कम हुई है. 2005-06 में प्रजनन दर 4.3 बच्चे प्रति दंपति थी. वर्तमान में यह घटकर 3.2 हो गयी है.

धड़ाम हो रही गरीबी

राज्य की गरीबी दर में तेजी से गिरावट आ रही है. यह देश के अन्य राज्यों की तुलना में सर्वाधिक है. 2004-05 में बिहार की गरीबी दर 54.4% थी. 2011-12 में घटकर 33.7% हो गयी है. इसमें हाल के दिनों में और भी गिरावट आयी है.

आर्थिक-सामाजिक परिस्थिति

वर्ष 2000-01 में प्राथमिक क्षेत्र का अर्थव्यवस्था में करीब 20 फीसदी योगदान था जो 2016-17 में घटकर 20 फीसदी हो गया है. वहीं, सेवा प्रक्षेत्र का योगदान इस अवधि में 50 से बढ़कर 61 फीसदी हो गया है. इस तरह से बिहार में आर्थिक एवं सामाजिक सुधार हुआ है, जो समावेशी भी है.