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नोटबंदी से परेशान निम्न-मध्यम वर्ग व छोटे उद्यमियों को वित्त मंत्री ने की साधने की कोशिश-- राजेन्द्र तिवारी

धूम-धड़ाके वाली नोटबंदी से परेशान देश के लिए केंद्र सरकार ने वर्ष 2017-18 के लिए निम्न व मध्यवर्ग को राहत देने वाला, सामाजिक व ग्रामीण क्षेत्र में आवंटन बढ़ाने और कृषि व किसानों के लिए सरकारी खर्च बढ़ाने वाला बजट पेश किया. यह पहला ऐसा बजट है जिसमें योजना और गैर योजना की श्रेणी खत्म कर दी गयी और रेलवे अन्य विभागों की तरह ही इसमें शािमल किया गया. वित्त मंत्री अरुण जेटली ने अपने चौथे बजट में लोकलुभावन घोषणाओं से बचकर उन क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित करने की कोशिश की जो भारतीय अर्थव्यवस्था की संभावनाओं के फलीभूत होने में सबसे बड़ी बाधा हैं. वह इसमें कामयाब होते दिखायी दिये. इसके अलावा, मूलभूत जरूरतों को पूरा करने की टाइम लाइन इस बजट की सबसे खास बात है. बजट में कहा गया है कि 1 अप्रैल 2018 तक देश के सभी गांवों के बिजलीकरण का लक्ष्य है. इसी तरह लैंड रिकॉर्ड व सॉयल कार्ड के लिए भी समय सीमा तय की गयी है. एक महत्वपूर्ण कदम राजनीतिक दलों की फंडिंग को लेकर उठाया गया है. इसके मुताबिक, अब राजनीतिक दल 2000 रुपये तक का ही कैश चंदा ले सकेंगे. इसके अलावा, रिजर्व बैंक इलेक्टोरल बांड भी जारी करेगा जिसके जरिये राजनीतिक दलों की फंडिंग हो सकेगी.
 

पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव को भी बजट के जरिये साधने की महीन कोशिश भी जेटली ने की है. उन्होंने कहा कि नोटबंदी का असर जल्द ही समाप्त हो जायेगा.

 

 

गौरतलब है कि विधानसभा चुनाव वाले दो बड़े राज्यों में खेती पर आधारित आबादी बहुत ज्यादा है. उत्तर प्रदेश में तो 78 फीसदी ग्रामीण आबादी है. बजट में इनके लिए पर्याप्त प्रावधान किये गये हैं. यही नहीं, भाजपा समर्थक छोटे-मझोले कारोबारियों को भी टैक्स रियायत देकर खुश करने की कवायद की गयी है. ध्यान रहे कि पंजाब व गोवा में 4 फरवरी को मतदान है और उत्तर प्रदेश में पहला चरण 11 फरवरी से शुरू हो रहा है. चुनावों में जाने वाला तीसरा बड़ा राज्य उत्तराखंड है, जहां 15 फरवरी को मतदान है. फौजी जवानों के लिए रेल बुकिंग अॉनलाइन करके व पेंशन को सुविधाजनक बनाने के जरिये इस राज्य को भी संदेश दिया गया है. कर प्रशासन पर नजर डालें तो उम्मीदें बहुत ज्यादा थीं, लेकिन िवत्तमंत्री ने कर योग्य आय की िसर्फ पहली स्लैब की ही दर 10 फीसदी से घटाकर पांच फीसदी की.
 

बाकी स्लैब्स में कोई परिवर्तन नहीं किया गया यानी 42 हजार रुपये प्रति माह से ज्यादा कमाने वालों को कोई राहत नहीं दी गई. अमीरों यानी 50 लाख से 1 करोड़ रुपये सालाना की आय पर 10 फीसदी सरचार्ज और १ करोड़ से ज्यादा की आय पर 15 फीसदी सरचार्ज लगा दिया गया है.
 

वित्तमंत्री ने भारत को वैश्विक ग्रोथ का इंजन करार देते हुए अपने बजट भाषण में अमेरिकी ब्याज दरों के बढ़ने की आशंका, तेल कीमतों में उछाल और विश्व स्तर पर बढ़ रहे संरक्षणवादी रवैये को चुनौती के रूप में प्रस्तुत किया. नोटबंदी का जिक्र करते हुए उन्होंने उम्मीद जतायी कि अगले वित्त वर्ष पर इसका कोई असर नहीं पड़ेगा. हालांकि आर्थिक सर्वेक्षण में मौजूदा वित्त वर्ष में विकास दर 6.5 फीसदी और अगले वित्त वर्ष में 6.75 से 7.50 फीसदी के बीच रहने का अनुमान किया गया है. यदि यह अनुमान सही भी होता है तो भी देश की आबादी में हर माह जुड़ रहे रोजगारयोग्य 10 लाख युवाओं के लिए रोजगार सृजन संभव नहीं हो सकता. इसके लिए कम से कम आठ फीसदी की विकास दर की जरूरत होगी. अलबत्ता, वित्तमंत्री ने पूंजीगत निवेश 25.4 फीसदी बढ़ाने के साथ-साथ ग्रामीण और कृषि क्षेत्र के आवंटन में 24 फीसदी वृद्धि की है. यही नहीं, स्वास्थ्य क्षेत्र में भी खर्च 28 फीसदी बढ़ाया गया है.
 

 

 

छोटे उद्यमियों-कारोबारियों (50 करोड़ से कम के सालाना टर्नओवर) के लिए कर दरें 30 फीसदी से घटाकर 25 फीसदी कर दी गयी हैं. वित्तमंत्री ने बताया कि इससे 300 करोड़ रुपये का बोझ पड़ेगा.
 

बजट में भारत में बिजनेस करना सरल (ईज अॉफ डूइंग बिजनेस) बनाने के लिए एफआईपीबी को खत्म कर दिया गया. बजट में कहा गया है कि इससे भारत में ईज ऑफ डूइंग बिजनेस बढ़ जायेगा. अभी भारत विश्व बैंक की ईज ऑफ डूइंग बिजनेस इंडेक्स की सूची में 130वें स्थान पर है.
 

बैंकिंग सेक्टर को निराशा हाथ लगी है. मुश्किलात से गुजर रहे पब्लिक सेक्टर के बैंकों के लिए पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के मुताबिक 10000 करोड़ रुपये का फंड ही मुहैया कराने की घोषणा वित्तमंत्री ने की.
 

कुल मिलाकर बजट स्वर और भंगिमा से चुनिंदा क्षेत्रों में ही जरूरी हस्तक्षेप करता नजर आ रहा है. इसे अच्छा संकेत ही माना जाना चाहिए. उम्मीद तो की जा रही थी कि नोटबंधी के धूम-धड़ाके के बाद लोकलुभावन बजट से भरपाई करने की कोशिश केंद्र सरकार करेगी लेकिन इसकी जगह छोटे-छोटे किसानों-कारोबारियों व छोटे करदाताओं और छोटे घरों पर बजट का फोकस दिखायी दिया. इसके अलावा, इंफ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र के लिए बजट में जरूर ध्यान दिया गया. हाउसिंग सेक्टर को भी संजीवनी का इंतजाम इसमें है.अब लोग इस बजट को किस तरह से ले रहे हैं, इसके कुछ संकेत 11 मार्च को आ रहे चुनावी नतीजों से ही पता चलेंगे.