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नोबेल, गरीबी और आंबेडकर -- श्योराज सिंह बेचैन

भारतीय मूल के अभिजीत बनर्जी, फ्रांस मूल की उनकी शोध छात्रा रही पत्नी एस्टर डफ्लो और अमेरिकी अर्थशास्त्री माइकल क्रेमर, तीनों को संयुक्त रूप से नोबेल सम्मान मिलने के बाद से खासकर भारत की गरीबी को लेकर बहस छिड़ गई है। वह इसलिए भी कि जिस देश का एक पांव तरक्की के चांद पर पहुंचने को आतुर हो, उसका दूसरा पांव गरीबी की दलदल में गहरे फंसा हो, तो उसके लिए गरीबी विषयक शोध पर दिया जाने वाला नोबेल पुरस्कार विशेष मायने रखता है। हालांकि गरीबी पर काम करने के लिए ही सन् 1974 में स्वीडिश अर्थशास्त्री गुन्नार मिर्डल को आर्थिक विचलन के सिद्धांत के क्षेत्र में अग्रणी भूमिका निभाने के वास्ते यह पुरस्कार दिया गया था, लेकिन उसके फोकस में भारत की गरीबी नहीं थी। जबकि कुपोषण की समस्या पर नोबेल पुरस्कार पाने वाले भारतीय अर्थशास्त्री अमत्र्य सेन के काम में भारत की गरीबी हटाने की चिंता शामिल थी। अमत्र्य सेन ने कहा था कि देश के पहले अर्थशास्त्री बाबा साहब आंबेडकर ने यदि गरीबी हटाने को लेकर आधारभूत काम नहीं किया होता और राष्ट्रीय विकास सापेक्ष दृष्टि नहीं दी होती, तो मेरे शोध के केंद्र में गरीबी-कुपोषण की समस्या नहीं होती। विषय की प्रासंगिकता और गंभीरता का अंदाजा इसी तथ्य से लगाया जा सकता है कि हाल में आए ग्लोबल हंगर इंडेक्स के अनुसार, भारत में 19 करोड़ बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। हंगर इंडेक्स बता रहा है कि भूख-कुपोषण में भारत की स्थिति नेपाल, बांग्लादेश और पाकिस्तान से भी खराब है!

 

हमारी आर्थिक नीतियों का पहिया आरंभ से ही पटरी से उतरा हुआ रहा है। हम मरीज से डॉक्टर का और डॉक्टर से मरीज का काम लेते रहे हैं, यानी अपने औजारों को मिसफिट करते रहे हैं। मसलन, देश के पहले कानून मंत्री भीमराव आंबेडकर की सबसे बड़ी डिग्री अर्थशास्त्र में ही थी। उन्हें योजना आयोग क्यों नहीं दिया गया? आजादी मिलने के साथ ही गरीबी का अंत करना प्राथमिकता में क्यों नहीं आया, जबकि गरीबी से मुक्ति पाना भी गुलामी से मुक्ति पाने जितना ही महत्वपूर्ण था? जिन्हें गरीबी से निजात नहीं मिली, उनके लिए गुलामी से भी निजात संभव नहीं है। हमारे राष्ट्र निर्माता देश की गरीबी के प्रति बेखबर नहीं थे। ऐसा बिल्कुल नहीं है कि गांधी, आंबेडकर और नेहरू को गरीबी की विद्रूपता दिखाई नहीं दे रही थी। देश में आर्थिक नियोजन करने की क्षमता और समझ-बूझ रखने वाले अर्थशास्त्री मौजूद थे। वे आजादी के वक्त से ही जान रहे थे कि अगर देश में गरीबी अपनी जड़ें जमाए बैठी रही, तो एक खुशहाल देश बनाने का सपना कभी पूरा नहीं होगा और इस तरह आजादी अपना वास्तविक अर्थ खो देगी। आजादी के बाद पहले प्रधानमंत्री बने जवाहरलाल नेहरू के मंत्रिमंडल के पास यह मौका था कि वह गरीबी हटाने के काम को प्राथमिकता दे, लेकिन ऐसा नहीं हो सका। आंबेडकर ने मंत्रिमंडल से त्यागपत्र दे दिया था। त्यागपत्र की एक वजह तो हिंदू कोड बिल को पूरी तरह लागू नहीं करना था। मगर इस्तीफे के पांच कारणों में एक उनके हाथों में योजना आयोग न सौंपना भी था। आखिर बाबा साहब आंबेडकर योजना आयोग क्यों लेना चाह रहे थे? वह योजनाबद्ध ढंग से गरीबी हटाने का कार्यक्रम बनाना चाहते थे।

 

हम भारतीयों का नोबेल पुरस्कार से रिश्ता सिर्फ इसलिए नहीं जुड़ता कि अभिजीत बनर्जी भारतीय मूल के अर्थशास्त्री हैं, बल्कि इसलिए भी कि यह पुरस्कार वैश्विक गरीबी के संदर्भ में भारत को गरीबी मुक्त बनाने की फिक्र को लेकर किए गए काम का सम्मान है। अभिजीत बनर्जी सरकारों के गरीबी हटाने संबंधी कामों से आश्वस्त नहीं, उन्होंने सरकार की इस बात के लिए आलोचना की है कि वह गरीबी हटाने में नाकाम रही है। कांग्रेस सरकार ने तो घोषित रूप से गरीबी हटाने का बीड़ा उठाया था। गरीबी हटी होती, तो आज नोबेल विजेताओं के निष्कर्ष कुछ और होते।

 

भारत में बढ़ती गरीबी और विषमता ने अपराधीकरण में अभूतपूर्व वृद्धि की है। राष्ट्रीय अपराध सूचकांक की रिपोर्ट में जारी आंकड़ों के अनुसार, 2007-से 2017 के बीच 66 फीसदी अपराध बढ़े हैं। इसकी जड़ें केवल अर्थशास्त्र में नहीं हैं। गरीबी का संबंध सामाजिक संरचना से भी है, जिसे आंबेडकर अपने अनुभव और ज्ञान, दोनों स्तरों पर समझते थे। आंबेडकर के लिए अस्पृश्यता, गरीबी केवल अध्ययन का विषय नहीं थे। वह उनके बीच से आए थे। भुक्तभोगी थे। सांविधानिक प्रावधानों से गरीबी हटाने के जो उपाय उन्होंने किए थे, वे इसलिए कम प्रभावी हुए, क्योंकि संविधान लागू करने वालों की नीति में गरीबी हटाना अहम काम नहीं रहा। भारतीय सामाज सदियों से शास्त्रगत धार्मिक ढांचे में रहा है। संविधान पूर्व का कायदा धार्मिक स्वरूप का है, जिसके अनुसार शूद्र को सबकी सेवा करनी है, व्यापार करने, शिक्षा ग्रहण करने का उसे कोई अधिकार नहीं है। हमारा सामाजिक व्यवहार कानून से कम, परंपराओं और रीति-रिवाजों से अधिक संचालित हुआ है। जाति भेद और अस्पृश्यता की भावना जो शास्त्र संगत थी, उसने संविधान संगत समाज बनाने में बाधा उत्पन्न की है। योजना आयोग के अलावा कानून के सहारे गरीबी हटाना आंबेडकर का दूसरा विकल्प था। पिछले तीन दशकों में आर्थिक सुधार के नाम पर जो विकास हुआ है, उसमें असंतुलन अधिक है, जिससे गरीबी कम नहीं हो पा रही है।

 

भारत नोबेल पुरस्कार के हवाले से गरीबी पर ऐसे समय में बहस कर रहा है, जब ‘सवर्णों' को गरीबी के आधार पर आरक्षण दिया जा रहा है। दिलचस्प यह है कि जोर गरीबी पर कम, ‘सवर्ण' पर अधिक है। अगर व्यक्ति सवर्ण नहीं और उसके पास आठ लाख रुपये की वार्षिक आय, दो सौ मीटर का प्लॉट आदि की तुलना में आधा भी हो और वह गरीब होने के साथ-साथ सवर्ण न हो, तो उसे गरीब की श्रेणी का आरक्षण नहीं मिलेगा। आंबेडकर से लेकर बनर्जी तक अर्थशास्त्र की विकासवादी धारा ने गरीबी को ईश्वरीय प्रकोप नहीं माना है। यह मनुष्यों की व्यवस्था है। इसलिए मानवीय प्रयासों द्वारा पोलियो और टीवी की बीमारी की तरह गरीबी भी खत्म की जा सकती है। आंबेडकर मानते थे कि सरकारी योजनाओं और कार्यक्रमों द्वारा गरीबी का अंत संभव है। गुन्नार मिर्डल, अमत्र्य सेन और अभिजीत बनर्जी तक सभी अर्थशास्त्री राजकीय प्रयासों से गरीबी हटाना संभव मानते हैं।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)