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नौकरशाही ने तबाह कर दी उत्तराखंड में उच्च शिक्षा

अनिल बंसल, नई दिल्ली। उत्तराखंड की स्कूली शिक्षा के मामले में भले अंग्रेजी राज से ही देश भर में धाक रही हो। लेकिन उच्च शिक्षा के मामले में सूबे के हाल बेहाल हैं। सरकारी विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता छीनने से लेकर शिक्षकों के पदों को मंजूरी नहीं देने पर आमादा नौकरशाह निजी विश्वविद्यालयों को बढ़ावा दे रहे हैं। एक निजी विश्वविद्यालय की मंजूरी में पांच-छह करोड़ की घूसखोरी आम बात है। लेकिन शिक्षा के स्तर को बरकरार रखने वाले सरकारी विश्वविद्यालयों की हालत लगातार बदतर हो रही है।
राज्य के पंतनगर विश्वविद्यालय की कृषि शिक्षा के मामले में देश में विशेष पहचान रही है। हालांकि यहां दूसरे पाठ्यक्रमों की भी शुरू से ही पढ़ाई होती है। उत्तर प्रदेश का बंटवारा होने से पहले तक भी इस विश्वविद्यालय की अपनी प्रतिष्ठा थी। लेकिन अलग उत्तराखंड बन जाने के बाद सब कुछ बंटाधार हो गया। नौकरशाही ने शिक्षा के इस अहम केंद्र पर कब्जा जमा लिया है। पिछले कई साल से कोई बड़ा कृषि वैज्ञानिक यहां कुलपति के पद पर आने को तैयार नहीं। नतीजतन कुलपति जैसा शैक्षिक कामकाज भी आइएएस अफसर संभाल रहे हैं। पहले यह विश्वविद्यालय सुभाष कुमार के हवाले था। वे सूबे के मुख्य सचिव बने तो दूसरे आइएएस आलोक जैन को सरकार ने कुलपति बनवा दिया।
उत्तराखंड बनने से पहले इस इलाके में दो सरकारी विश्वविद्यालय गढ़वाल और कुमाऊं में थे। गढ़वाल का मुख्यालय श्रीनगर में और कुमाऊं का नैनीताल में था। पर्वतीय क्षेत्र होने के कारण यहां ज्यादातर डिग्री कालेज सरकारी ही बनाए गए। एक तकनीकी विश्वविद्यालय रूड़की में था जो अब आइआइटी बन चुका है। जबकि गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय शुरू से ही विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की मंजूरी वाला डीम्ड विश्वविद्यालय है। इसका प्रबंधन आर्य प्रतिनिधि सभा करती रही है। वाजपेयी सरकार ने हर राज्य में एक केंद्रीय विश्वविद्यालय खोलने की योजना बनाई तो उत्तराखंड में श्रीनगर स्थित गढ़वाल विश्वविद्यालय को केंद्रीय विश्वविद्यालय में तब्दील कर दिया गया। गढ़वाल में चल रहे डिग्री कालेजों के सामने इससे संबद्धता का संकट पैदा हो गया तो सरकार को श्रीदेव सुमन विश्वविद्यालय की स्थापना करनी पड़ी।
फिलहाल पंत नगर के अलावा नैनीताल स्थित कुमाऊं विश्वविद्यालय और देहरादून स्थित उत्तराखंड तकनीकी विश्वविद्यालय में खलबली है। नैनीताल के कुलपति वीपीएस अरोड़ा से तब की राज्यपाल मार्गरेट अल्वा खफा हो गई थीं। लिहाजा कार्यकाल पूरा हो जाने के बाद अरोड़ा ने नए कुलपति की नियुक्ति का इंतजार किए बिना पद छोड़ दिया था। चार महीने की मशक्कत के बाद नए राज्यपाल अजीज कुरैशी ने यहां जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय दिल्ली के प्रोफेसर राकेश भटनागर को कुलपति नियुक्त कर दिया। भटनागर ने शिक्षा के ढर्रे को पटरी पर लाने के लिए खाली पड़े पदों पर नियुक्तियां शुरू कीं तो उन पर राजनीतिक दबाव पड़ा। सो तीन साल के कार्यकाल के बावजूद वे चार महीने में ही इस्तीफा देकर दिल्ली चले गए।
आरोप है कि उत्तराखंड सरकार के एक आइएएस अफसर राकेश शर्मा से तमाम कुलपति और शिक्षाविद त्रस्त हैं। 1981 बैच के शर्मा को मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा का खास माना जाता है। पहले उच्च शिक्षा और तकनीकी शिक्षा दोनों उन्हीं के पास थे। ये वही शर्मा हैं जिनके दिल्ली में हत्या वाले रोज पोंटी चड्ढा के साथ उनके फार्म हाउस पर मौजूदगी की खबर आई थी। हालांकि राज्य सरकार ने इस मामले को दबा दिया। शर्मा की खूबी है कि वे मुख्यमंत्री के खास बन जाते हैं। रमेश पोखरियाल निशंक के वक्त भी प्रशासन में उन्हीं की तूती बोलती थी। विजय बहुगुणा ने भी तमाम शिकवे-शिकायतों के बावजूद उनकी अहमियत नहीं घटाई।

नैनीताल के विश्वविद्यालय में राकेश भटनागर के इस्तीफा देने के बाद वहां के कमिश्नर को कुलपति बनाया गया। लेकिन उन्होंने भी थोड़े दिन में ही हाथ खड़े कर दिए। फिलहाल प्रति कुलपति इस विश्वविद्यालय के कार्यवाहक कुलपति बाकी पेज 8 पर उङ्मल्ल३्र४ी ३ङ्म स्रँी ८
हैं। जबकि उत्तराखंड तकनीकी विश्वविद्यालय के कुलपति डीएस चौहान ने भी राज्यपाल को पत्र लिखकर खुद को मुक्त करने की इजाजत मांगी है। उनकी प्रमुख सचिव राकेश शर्मा से पटरी नहीं बैठ रही। वे राज्यपाल को अवगत करा चुके हैं कि शर्मा के नाजायज हस्तक्षेप के कारण न केवल विश्वविद्यालय की स्वायत्तता खत्म हो चुकी है बल्कि सूबे में तकनीकी शिक्षा का विकास भी अवरुद्ध हुआ है। राज्यपाल ने उनका इस्तीफा मंजूर करने से इनकार कर दिया है। चौहान को तकनीकी शिक्षा के विकास में महारथ हासिल है। उत्तर प्रदेश में 2000 में जब तकनीकी विश्वविद्यालय की स्थापना हुई थी तो पहले कुलपति चौहान ही बनाए गए थे। वे लगातार दो बार वहां कुलपति थे। उत्तराखंड में भी यह उनका दूसरा कार्यकाल है।
हैरत की बात है कि राज्य के किसी भी सरकारी विश्वविद्यालय में इस समय कोई महिला कुलपति नहीं है। नैनीताल में जब राकेश भटनागर को कुलपति बनाया गया तो बीना शाह भी यहां दावेदार थीं। वे नैनीताल की हैं और बरेली विश्वविद्यालय में कुलपति व इग्नू में निदेशक रह चुकी हैं। नए बनाए गए मुक्त विश्वविद्यालय की गत भी अच्छी नहीं है। हल्द्वानी स्थित इस विश्वविद्यालय में विनय पाठक पहले कुलपति थे। अब सुभाष धूलिया कुलपति बने हैं। वे लेखक और पत्रकार रहे हैं पर प्रशासनिक दक्षता के मामले में फिसड्डी माने जाते हैं।
रमेश पोखरियाल निशंक ने उत्तराखंड में जड़ी-बूटियों का खजाना होने का दावा कर देहरादून में देश का पहला सरकारी आयुर्वेद विश्वविद्यालय भी खोल दिया था। लेकिन इस विश्वविद्यालय के मौजूदा कुलपति सत्येंद्र मिश्र नौकरशाही के चक्कर लगाकर थक चुके हैं। न शिक्षकों के पद स्वीकृत किए जा रहे हैं और न विश्वविद्यालय को जरूरी आर्थिक मदद ही राज्य सरकार देने को तैयार है। इसी तरह टिहरी के चंबा में स्थापित किए गए श्रीदेव सुमन विश्वविद्यालय में तो सरकार ने एक रजिस्ट्रार को ही कुलपति बना दिया। यह विश्वविद्यालय भी कागजों तक ही सीमित होकर रह गया है।