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न्यायिक स्वतंत्रता का सवाल- राजीव धवन

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जस्टिस मार्कंडेय काटजू कुछ कहते हैं, तो उस पर सबका ध्यान जाता है। लेकिन इस बार मामला अलग है। स्वाभाविक है, जब वह न्यायपालिका पर राजनीतिक दबाव में आने का आक्षेप लगा रहे हों, और उसकी स्वतंत्रता पर सवाल खड़े कर रहे हों, तो यह महज संवाद बनकर नहीं रह सकता। आखिर यह मामला तीन पूर्व प्रधान न्यायाधीश और सीधे तौर पर पिछली यूपीए सरकार के समय प्रधानमंत्री कार्यालय से जुड़ा है।

जस्टिस काटजू ने आरोप लगाया है कि मद्रास हाई कोर्ट के भ्रष्टाचार के आरोपी एक एडिशनल जज का कार्यकाल राजनीतिक दबाव में आकर बढ़ाया गया। न्यायपालिका पर इस तरह के आक्षेप नए नहीं हैं, लेकिन यह भी मानना होगा कि न्यायपालिका में विश्वसनीयता अभी बची हुई है। न्यायपालिका से संबंधित अस्सी फीसदी से ज्यादा नियुक्तियां साफ-सुथरी रही हैं।

जस्टिस काटजू ने चाहे न्यायिक व्यवस्था के सुधार के दृष्टिकोण से यह मुद्दा उठाया हो, पर यह मामला संसद में गूंज गया। यह घटनाक्रम करीब दस वर्ष पुराना है। जस्टिस काटजू ने मद्रास हाई कोर्ट के उस जज का नाम नहीं बताया है, लेकिन अब यह बात सामने आ चुकी है कि वह दिवंगत जज अशोक कुमार थे, जिन्हें पहले सेवावृद्धि और बाद में स्थायी नियुक्ति दी गई। इसमें मनमोहन सरकार के सहयोगी रहे द्रमुक का नाम सामने आया है। जाहिर है, जस्टिस काटजू के इस दावे ने केंद्र और तमिलनाडु, दोनों जगहों की राजनीति को प्रभावित किया है। संसद में द्रमुक की प्रतिद्वंद्वी अन्नाद्रमुक के सदस्यों ने इसे लेकर काफी हंगामा भी किया है।


दरअसल कार्यपालिका न्यायपालिका में हस्तक्षेप करने से गुरेज नहीं करती। इससे कोई भी सरकार बची नहीं है, चाहे वह केंद्र की सरकार हो या फिर राज्य की। एनडीए सरकार के सत्ता में आने के बाद वरिष्ठ वकील गोपाल सुब्रमण्यम की सर्वोच्च अदालत के जज के रूप में नियुक्ति रुकने का मामला अभी पुराना नहीं पड़ा है। इसमें संदेह नहीं है कि वह प्रकरण भी पूरी तरह से राजनीतिक ही था। सर्वोच्च अदालत के कॉलेजियम ने उनका नाम आगे किया था, मगर मोदी सरकार ने राष्ट्रपति के पास जो नाम भेजे, उनमें गोपाल सुब्रमण्यम का नाम शामिल नहीं था। यह गलत परंपरा की शुरुआत है। यदि भविष्य में इसी तरह से नियुक्तियां की गईं, तो न्यायपालिका में नियुक्ति की पूरी प्रक्रिया ही दूषित हो जाएगी।

दूसरी ओर भारतीय न्यायिक व्यवस्था को देखें, तो न्यायिक फैसलों के मामले में न्यायपालिका पर कम ही उंगली उठी है। अमूमन हमारी न्याय व्यवस्था निष्पक्ष ही रही है। समय-समय पर ऐसे प्रसंग जरूर आते रहे हैं, जब न्यायपालिका के कामकाज में राजनीतिक हस्तक्षेप की कोशिशें की गईं। इतनी बड़ी व्यवस्था में अगर कुछ ऐसे मामले सामने आते हैं, तो उस आधार पर पूरी न्याय व्यवस्था को लांछित नहीं किया जा सकता। जस्टिस काटजू ने पता नहीं किस वजह से यह मामला अभी उठाया है। जस्टिस काटजू के लेख से पता चलता है कि कालीन के नीचे ढेर-सी गर्द जमा है। वह खुद मद्रास हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और सर्वोच्च न्यायालय के जज रहे हैं। यह मुद्दा वह पहले भी उठा सकते थे। लेकिन आखिर उन्होंने ऐसा क्यों नहीं किया, यह सवाल स्वाभाविक ही सभी के जेहन में है।

जस्टिस आर सी लाहोटी से उन्होंने जो सवाल पूछे हैं, उसके आलोक में देखें, तो वह शायद यह कहना चाहते हैं कि आईबी की प्रतिकूल टिप्पणी के बावजूद जज का कार्यकाल बढ़ाने का क्या औचित्य था। जस्टिस काटजू का यही मानना है कि राजनीतिक दबाव में आकर यह फैसला लिया गया है। मगर उन्होंने जो लिखा है, उस पर गौर करें, तो कुछ बातें गले नहीं उतरतीं।

अगर यह कहा जाए कि न्यायपालिका के चलते किसी सरकार को गिराने की स्थिति आ सकती है, तो यह विश्वास करने योग्य नहीं लगता। क्या एक जज की नियुक्ति या सेवा विस्तार का मामला इस मोड़ पर भी आ सकता है कि केंद्र की एक सरकार दांव पर लग जाए! शायद ऐसा संभव नहीं। संभव है कि क्षेत्रीय दल अपनी महत्वाकांक्षा में जिस पराकाष्ठा पर पहुंचे हैं, उसमें इस तरह की धमकियों का सहारा लिया जाता हो। लेकिन इस पर एकाएक यकीन नहीं होता कि एक भरी-पूरी सत्ता, जिसमें कि उस क्षेत्रीय दल के भी हित जुड़े हों, एक जज के मामले में भरभराकर गिर जाए। इसलिए इसे केवल उन संवादों के आधार पर नहीं देखा जा सकता, जो अब मीडिया के जरिये सुनने को मिल रहे हैं। इसके निहितार्थों को समझने की जरूरत है।

बहरहाल, इतना जरूर कहा जा सकता है कि अब समय आ गया है, जब न्यायिक नियुक्ति का विधान बदला जाए। जजों की नियुक्ति के लिए कॉलेजियम सिस्टम को खत्म करके न्यायिक आयोग के गठन की जरूरत पर पहले भी काफी कुछ कहा गया है। इस संबंध में विधेयक भी लंबित है। अच्छा यही हुआ है कि न्यायिक सुधार की बात को बल मिल रहा है। देखना होगा कि यह बहस हमारे लिए किस तरह का परिणाम लाती है। यहां किसी की प्रतिष्ठा को गिराने या उठाने की बात नहीं है। यहां न्यायिक व्यवस्था को उसकी कुछ जटिलताओं से बाहर निकालने की कोशिश है।

यह बात साफ हो जानी चाहिए कि जस्टिस काटजू ने जिस मामले को उठाया है, उसमें अब उलझने से कुछ हासिल नहीं होगा। इतनी अवधि के बाद अब कोई यह कहने नहीं आएगा कि मामले में उसकी क्या भूमिका थी। लेकिन इसमें आगे की थाह लेने के लिए बहुत कुछ मिलता है। न्यायपालिका की निष्पक्षता के लिए जरूरी है कि जजों की नियुक्तियों को राजनीतिक हस्तक्षेप से बचाया जाए। जस्टिस काटजू द्वारा उठाए गए मुद्दे और गोपाल सुब्रमण्यम के मामले से साफ है कि न्यायिक सुधार में और देर नहीं होनी चाहिए।

(लेखक सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील हैं)