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न्यूयॉर्क में सताती थी गांव की याद-- इल्मा अफरोज

मुरादाबाद के कुदंरकी गांव की रहने वाली इल्मा का बचपन खेत-खलिहान में अठखेलियां करते बीता। पापा किसान थे,मगर तालीम को लेकर बड़े संजीदा रहे। बेटी-बेटे में कोई फर्क नहीं किया। नन्ही इल्मा को किताबों से बड़ा प्यार था। स्कूल से लौटने के बाद खुद ही पढ़ने बैठ जाती। पापा को बेटी से स्कूल के किस्से सुनना बड़ा पंसद था। हर साल फसल बेचने के बाद वह सबसे पहले बेटी की किताबों के लिए रुपये निकालते, बाद में कोई और काम। इल्मा कहती हैं, पापा ने हमेशा मेरी तालीम को तवज्जो दी। गेहूं बेचने के बाद वह जो भी पैसे लाते, तो सबसे पहले यही हिसाब लगाते कि मेरी किताबों पर कितना खर्च होगा? नई किताबें देखकर मुझे जो खुशी होती थी, उसे बयां करना मुश्किल है।

उन दिनों इल्मा कक्षा पांच में थीं। अचानक पापा की तबियत खराब हो गई। गांव में इलाज की सुविधा नहीं थी। शहर में दिखाया, तो पता चला कैंसर है। घर का सारा पैसा, अम्मी के जेवर इलाज में खर्च हो गए, पर पापा नहीं बच सके। घर पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा। खेत संभालने वाला कोई न था। बच्चे छोटे थे। इल्मा कहती हैं, पापा चले गए, तो जैसे घर की छत टूट गई। मगर अम्मी में गजब का हौसला था। उन्होंने खेत भी संभाला और घर भी। हालात जो भी रहे हों, उन्होंने मुझे और मेरे छोटे भाई की पढ़ाई बंद नहीं होने दी।

इल्मा बड़ी होकर इंजीनियर बनना चाहती थीं। पर पापा के जाने के बाद तो दो जून का खाना मिलना भी मुश्किल था। घर में बिजली नहीं थी, इसलिए मोमबत्ती की रोशनी में पढ़ाई की। चूंकि र्कोंचग के लिए पैसे नहीं थे, इसलिए साइंस की जगह आट्र्स पढ़ने का फैसला किया। आठवीं के बाद जब पढ़ाई के लिए शहर जाने लगीं, तो तमाम मुश्किलें आईं। इल्मा बताती हैं, बाकी बच्चे टिफिन में बढ़िया-बढ़िया चीजें लेकर आते, मेरे पास सूखी रोटी होती। समर कैंप में बच्चे तरह-तरह के कपड़े पहनकर आते थे, पर मुझे स्कूल-यूनीफॉर्म से काम चलाना पड़ता। अम्मी ने हमेशा सिखाया, किसी को मत देखो, बस पढ़ाई पर ध्यान दो। वक्त बदलेगा।

इल्मा पढ़ाई में अच्छी थीं, इसलिए हर क्लास में स्कॉलरशिप मिलती रही। स्कूल की किताबों के अलावा तमाम महापुरुषों के बारे में पढ़ा। मिसाइल मैन अब्दुल कलाम उनके आदर्श थे। इल्मा कहती हैं, डॉक्टर कलाम कहते थे, सपने वे हैं, जो हमें सोने न दें। सपनों की ताकत के बूते ही मैं यह मुकाम हासिल कर पाई। 12वीं पास आने के बाद दिल्ली यूनिवर्सिटी में दाखिला मिल गया। दर्शनशास्त्र में स्नातक किया। इस दौरान जरूरी खर्च के लिए पार्टटाइम काम किया। पढ़ाई के अलावा डिबेट और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में सक्रिय रहीं। इल्मा कहती हैं, डिबेट से बड़ा फायदा होता था। डिबेट जीतने पर 500 रुपये मिलते थे। उनसे किताबें खरीद लेती थी।

दिल्ली में पढ़ाई साथ ही नए रास्ते खुलते गए। इस बीच वजीफे के जरिये ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में भी पढ़ने का मौका मिला। इल्मा कहती हैं, लंदन जाने की बात सुनकर छोटा भाई और अम्मी बहुत खुश थे। पर हमारे पास किराए के पैसे नहीं थे। अम्मी ने अपने बचे-खुचे जेवर भी बेच दिए। लंदन में पढ़ाई के दौरान दुनिया के तमाम मुल्कों के बारे में जानने-समझने का मौका मिला। जाहिर है, लंदन की जिदंगी उनके गांव से बिल्कुल अलग थी। सब कुछ अच्छा था, पर वहां की ठंड भयानक थी। इल्मा बताती हैं, मैं अपने साथ जो स्वेटर और शॉल लेकर गई थी, वे लंदन की ठंड मिटाने के लिए काफी न थे। नया कोट खरीदने के लिए मेरे पास पैसे न थे, इसलिए मैंने पार्टटाइम नौकरी की। चाहे जो भी मुश्किलें आई हों, अम्मी का हौसला हमेशा अपने काम आया।

बेटी के विदेश जाने के बाद अम्मी को गांव में तमाम तरह की बातें सुननी पड़ीं। लोग कहते थे, उसे इतना पढ़ाकर क्या करोगी? उसका निकाह करके ससुराल भेजो। कुछ तो यह भी ताना देते कि तुमने अपनी बेटी को सिर चढ़ा रखा है। लेकिन अम्मी ने कभी इन बातों पर ध्यान नहीं दिया। इल्मा को स्टूडेंट एक्सचेंज प्रोग्राम के तहत फ्रांस जाने का मौका मिला। इसके बाद क्लिंटन फाउंडेशन में काम करने के लिए वह अमेरिका चली गईं। न्यूयॉर्क में शानदार जिंदगी थी। बड़ा ऑफिस, सुंदर सा फ्लैट। तमाम सुख-सुविधाएं, पर मन में सुकून नहीं था। कुछ था, जो अंदर से परेशान कर रहा था उन्हें। चूल्हा फूंकती मां का चेहरा याद आता। गांव के बच्चों की तकलीफें बेचैन करती थीं। इसलिए तय किया कि अपने देश में काम करूंगी। इल्मा कहती हैं, मैंने सोचा कि दिल्ली जाकर सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी करूंगी। मन में आईपीएस बन देश-सेवा की तमन्ना थी। अम्मी को बताया, तो उन्होंने कहा कि जो तुझे ठीक लगता है कर, मैं तेरे साथ हूं।

दिल्ली लौटकर इल्मा सिविल तैयारी में जुट गईं। बीच-बीच में अम्मी से मिलती रहीं। पिछले साल सिविल सर्विस परीक्षा में उनकी 217वीं रैंक आई। इल्मा कहती हैं, यकीन न था कि पहली बार में परीक्षा पास कर लूंगी। सुकून है, मुल्क में रह अब अपनों की सेवा कर सकूंगी। शुक्रिया अम्मी, मुझे हौसला देने के लिए।

प्रस्तुति: मीना त्रिवेदी