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पंचायतों में महिलाओं की मौज़ूदगी से ऐसे बदल रही है गाँवों की तस्वीर

गाँव कनेक्शन, 5 जुलाई

महोबा के मामना गाँव की पँच रह चुकी पनकुंवर अपने गाँव की महिलाओं के लिए मिसाल हैं। दरअसल पँचायत सदस्य के रूप में चुने जाने के बाद भी उनको रबर स्टैंप से ज़्यादा अहमियत नहीं दी जाती थी। अक्सर प्रधान रजिस्टर पर दस्तख़त लेने के लिए किसी न किसी को उनके पास भेज देते थे। लेकिन एक दिन उनके इसपर एतराज़ और सवाल पूछने से ये परम्परा ही ख़त्म हो गई। अब उनके गाँव में कोई महिला पँच घर बैठे किसी कागज़ पर साइन नहीं करतीं बल्कि गाँव के विकास की योजनाओं को पूरा करने की तारीख़ तय करवाती हैं। पनकुंवर 2011 से 2021 तक लगातार दो बार उत्तर प्रदेश के महोबा ज़िले के कबरई ब्लॉक में ममना ग्राम पँचायत की पँच रही हैं। पनकुंवर कहती हैं, "जब मैंने पूछा क्या साइन कराया जा रहा है तो मुझे बताया गया कि यह इस बात को साबित करने के लिए है कि मैं पँचायत की बैठकों में मौज़ूद थी और अपने ग्राम पँचायत की तरफ से किए गए काम से सहमत हूँ।" पनकुंवर ने हँसते कहा कि उसके बाद से मैं उनसे सवाल करती रही हूँ। तीस साल पहले, 1992 में जब भारत ने अपने सँविधान में 73वां और 74वां संशोधन करते हुए ग्रामीण और शहरी स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए एक तिहाई सीटें आरक्षित कीं थीं, तो उसका मक़सद महिलाओं और विशेष रूप से दूसरे पिछड़ें या उपेक्षित रहने वाले समूहों, जैसे अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए अधिक प्रतिनिधित्व तय करना था। कई राज्यों में तो 50 फीसदी तक सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हैं।
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