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पंचायतों में सुधार का आधार-- गौरव कुमार

गुजरात में स्थानीय निकाय चुनावों में मतदान को अनिवार्य करने संबंधी कानून के बाद अब राजस्थान सरकार ने पंचायत चुनावों के लिए एक नया कदम उठाया है। राजस्थान सरकार ने पिछले दिनों एक अध्यादेश जारी कर पंचायत चुनाव लड़ने वाले प्रत्याशियों के लिए न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता तय कर दी। इसके अनुसार सरपंच का चुनाव लड़ने के लिए आठवीं पास और अधिसूचित क्षेत्र के उम्मीदवार के लिए पांचवीं पास होना जरूरी है। इसी तरह जिला परिषद और पंचायत समिति का चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों के लिए दसवीं पास होना अनिवार्य बनाया गया है।

हरियाणा सरकार ने भी पंचायती राज संशोधन अधिनियम 2015 बनाया, जिसमें चुनाव लड़ने के नियमों में कुछ संशोधन किया गया है। इसके अनुसार पंचायत चुनाव लड़ने वाले प्रत्याशी को दसवीं पास और महिला और दलितों के मामले में आठवीं पास होना अनिवार्य कर दिया गया था। इन प्रावधानों के विरुद्ध अदालत में याचिका दायर की गई थी, जिस पर सुनवाई करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने इस कदम की वैधानिकता को स्वीकृति प्रदान कर दी। अब सवाल है कि क्या वास्तव में ऐसा करना जमीनी लोकतंत्र के लिए अच्छा कदम साबित होगा।

आरंभिक तौर पर देखने से प्रतीत होता है कि इन प्रावधानों से करीब अस्सी फीसद ग्रामीण आबादी चुनाव लड़ने से वंचित हो सकती है। हालांकि यह अदालत का फैसला है, इसलिए इसकी वैधानिकता पर बहस नहीं की जानी चाहिए, पर अगर राज्य सरकार के इस अधिनियम को देखा जाए तो यह अपरिपक्व और सतही निर्णय कहा जा सकता है। आज हमारे देश की अधिकतर आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में रहती है और अधिकतर ग्रामीण आबादी निरक्षर है।

पहले यह जरूरी है कि हम अपनी शिक्षा व्यवस्था को दुरुस्त करें और गुणवत्तापूर्ण बनाएं। ऐसा भी नहीं कि इस अधिनियम के उद्देश्यों की प्राप्ति आठवीं और दसवीं पास प्रत्याशी कर सकेंगे। दसवीं स्तर तक की शिक्षा का महत्त्व कितनी गुणवत्तापूर्ण है, इससे सभी वाकिफ हैं। अब अगर यह मान लिया जाए कि कोई व्यक्ति अपनी पारिवारिक, सामाजिक, आर्थिक पृष्ठभूमि के कारण विद्यालय नहीं जा सका, लेकिन उसमें बेहतर नेतृत्व क्षमता है, तो वह जनप्रतिनिधि नहीं बन सकता।

शिक्षा किसी कौशल का आधार कभी नहीं हो सकती, जबकि नेतृत्व और जनप्रतिनिधि के रूप में पंचायत स्तर पर काम करने की क्षमता एक कौशल ही है। गांवों में ऐसे अनेक लोग मिल जाएंगे, जिनकी स्कूली शिक्षा नहीं हो पाई, पर अपने कामकाज के जरिए उनकी लोकप्रियता खासी है। ऐसे लोगों के हाथों में स्थानीय प्रशासन का नेतृत्व हो तो कुछ बेहतर नतीजों की उम्मीद बनती है। पर इस तरह के अनिवार्य प्रावधानों के कारण हमें ऐसे कुशल लोगों की क्षमता से वंचित रहना पड़ रहा है।

आज विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में भारत विश्व मानचित्र पर अपनी सशक्त उपस्थिति दर्शाता है, तो इसके पीछे कहीं न कहीं जमीनी लोकतंत्र यानी ग्राम पंचायत स्तर के लोकतंत्र की अहम भूमिका है। यह अलग बात है कि अब भी इस स्तर पर लोकतांत्रिक परिपक्वता स्थापित नहीं हो सकी है, पर इस दिशा में जितने भी प्रयास किए गए हैं उससे काफी बदलाव रेखांकित हुए हैं। पर ऐसे बदलाव, जो लोगों को प्रतिभागिता से वंचित कर रहे हों, वे स्वीकार्य नहीं हैं। और ऐसा करना विकेंद्रीकरण के मूल उद्देश्यों के प्रतिकूल होगा।

पंचायती राज व्यवस्था में ऐसे अनेक क्षेत्र हैं, जहां बदलाव की जरूरत है। आज यह संस्था कई चुनौतियों से जूझ रही है। प्राय: देखने में आता है कि पंचायती राज व्यवस्था की महत्त्वपूर्ण इकाई ग्रामसभा की नियमित बैठकें नहीं हो पाती हैं। इसमें होने वाले विचार-विमर्श, नीति निर्माण, कार्य योजनाएं आदि बनाने के लाभों से इसी कारण हम वंचित रह जाते हैं। तिहत्तरवें संविधान संशोधन द्वारा ग्रामसभा को संवैधानिक मान्यता प्रदान की गई है। अनुच्छेद 243 (क) द्वारा ग्रामसभा को शक्ति और कार्य की जिम्मेदारी सौंपने के लिए राज्य सरकारों को उत्तरदायित्व सौंपा गया है।

साथ ही संविधान की ग्यारहवीं अनुसूची में उनतीस विषयों की सूची पंचायतों को दी गई, जिन पर योजना बनाने, क्रियान्यवयन करने और मूल्यांकन करने की शक्ति ग्रामसभा के हाथ में आ गई। पर समस्या यह है कि ग्रामसभा की नियमित बैठकें ही नहीं हो पाती हैं। इस वजह से न कोई सर्वस्वीकृत योजना बन पाती है और न ही उस पर सामूहिक रूप से विचार-विमर्श हो पाता है। ग्रामसभा की बैठक न होने के पीछे कई कारण हैं, सबसे पहले तो सभी लोगों तक इसकी सूचना ही नहीं पहुंच पाती है। दूसरे, अधिकतर लोग इसके प्रति उदासीन होते हैं। तीसरे, ग्रामसभा की बैठकों में शामिल होने के लिए अधिकतर पंचायतों में ग्रामीणों को दूर तक जाना होता है और इसमें पूरा एक दिन लग जाता है। लोग अपनी मजदूरी छोड़ कर इसमें जाना पसंद नहीं करते।

इस समस्या के समाधान के लिए हमें ग्रामीणों में इसके प्रति जागरूकता लानी होगी। ग्रामसभा के पदाधिकारियों पर इसकी बाध्यता सौंपी जानी चाहिए, साथ ही उनके लिए प्रशिक्षण भी जरूरी है। इससे वे समुचित तरीके से ग्रामसभा की बैठकें सुनिश्चित करने के साथ ही उचित और जरूरी मुद्दों को चिह्नित कर उस पर चर्चा करा सकेंगे। ग्रामसभा की प्रत्येक बैठक से ऐसे निष्कर्ष निकालने के प्रयास किए जाने चाहिए, जिससे कि मजदूरी छोड़ कर आए लोगों को इससे संतुष्टि मिले।

साथ ही अगर संभव हो तो मनरेगा के किसी एक कार्य दिवस को ग्रामसभा की बैठक के लिए निर्धारित किया जा सकता है, जिससे काफी मजदूरों को अपनी मजदूरी छोड़ने की जरूरत नहीं होगी। ग्राम पंचायतों में भ्रष्टाचार आज विभिन्न रूपों में इस संस्था को कमजोर कर रहा है। पंचायत चुनाव के दौरान ही हमें इसके प्रथम दर्शन होते हैं, जहां पैसों और अनुचित साधनों से चुनाव जीतने की कोशिश होती है। जातिगत समीकरण साधने के साथ-साथ पैसे और प्रभाव का प्रयोग सर्वत्र दिखाई देता है। मतदाताओं को नगद पैसे बांटने के अलावा शराब, साड़ी, कंबल वगैरह देने का चलन आम है। इस प्रकार की प्रवृत्ति लागातार बढ़ती जा रही है।

इसके अलावा पंचायतों के अंतर्गत चलने वाली योजनाओं में अनियमितताओं की शिकायतें चरम पर हैं। भ्रष्टाचार के कई मामले- मनरेगा, इंदिरा आवास योजना और अन्य कल्याणकारी योजनाओं में भी पंचायतों के माध्यम से आने लगे हैं। भ्रष्टाचार बढ़ने के चलते इस संस्था पर से लोगों का विश्वास खत्म होने लगे इसके पूर्व हमें सचेत हो जाना होगा, अन्यथा स्वशासन और लोकतांत्रिक व्यवस्था की इस महत्त्वपूर्ण संस्था को हम खो देंगे। इन सबके आलावा अन्य कई तरह की समस्याए भी हैं जो महत्त्वपूर्ण न होते हुए भी व्यापक प्रभावकारी हैं। पंचायतों के सशक्तीकरण, जन जागरूकता और बेहतर शिक्षा के माध्यम से इन समस्याओं को खत्म किया जा सकता है।

ग्रामसभा को ऐसी नोडल एजेंसी के रूप में चिह्नित किया जा सकता है, जो ग्रामीण विकास के एजेंट के रूप में काम कर सकती है। यह संस्था ग्रामीण विकास के तामाम लक्ष्यों/ उद्देश्यों को पूरा करने की क्षमता रखती है। इसके लिए हमें पंचायतों में रोजगार केंद्र, सूचना केंद्र, ज्ञान केंद्र की स्थापना करनी होगी। साथ ही कौशल विकास के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रमों के साथ पंचायतों में ग्रामीणों के बीच आजीविका के नए साधन बना सकते हैं। इस दिशा में ईमानदार और बेहतर पहल की जाए तो इसके दूरगामी परिणाम ग्रामीण औद्योगीकरण के रूप में भी सामने आ सकेगा। आज देश आंतरिक उग्रवाद से भी प्रभावित है।

इस समस्या से पार पाने में ग्रामसभा की बहुत महत्त्वपूर्ण भूमिका हो सकती है। अशांत क्षेत्रों में रोजगार, कैरिअर काउंसिलिंग, ज्ञान केंद्र, सूचना केंद्र के माध्यम से पंचायतें विचलित युवाओं को सामाजिक सहभागिता में शामिल कर सकती हैं। ग्रामीण क्षेत्रों के विकास की मजबूत प्रतिबद्धता के साथ ग्राम पंचायत नक्सलवाद जैसी समस्या से भी कारगर ढंग से निपटने में बेहतर हथियार साबित हो सकती है। इसके लिए हमें ग्रामीण विकास के लिए पंचायतों को नोडल एजेंसी बनाने के प्रति सचेत प्रयास करने होंगे।

आज यह सिद्ध करना कठिन नहीं है कि पंचायतों के सशक्तीकरण के साथ समग्र ग्रामीण विकास को सुनिश्चित किया जा सकता है। पर इन सबके साथ सबसे जरूरी यह है कि विकेंद्रीकरण के मूल उद्देश्यों के अनुरूप सबकी भागीदारी सुनिश्चित की जाए। यह प्रशासन का ऐसा विकेंद्रित स्तर है, जहां ग्रामीण आबादी अपना शासन खुद चलाती है। अब अगर ग्रामीण आबादी अपना जनप्रतिनिधि निरक्षर को रखना चाहती है, तो इसमें बुराई क्या है? क्योंकि अगर संसदीय लोकतांत्रिक प्रणाली यही है तो इसे खत्म नहीं किया जा सकता। हां, इसमें सुधार तभी हो सकता है जब देश की अधिकतर आबादी जागरूक और शिक्षित हो।

हम विधानसभा और लोकसभा के स्तर पर ऐसा क्यों नहीं कर रहे, जबकि वहां ऐसे प्रावधानों की सर्वाधिक आवश्यकता है। अगर लोकतंत्र की खूबसूरती जनता की वास्तविक अपेक्षाओं को पूरा करना है, तो जनता को इससे किसी भी कीमत पर वंचित नहीं किया जा सकता।

बहरहाल सर्वोच्च न्यायालय ने सिर्फ इस अधिनियम की वैधानिकता को स्वीकृति दी है। पर इस मामले में राज्य सरकारों को सोचने की जरूरत है कि ऐसे प्रावधान लाने के पहले अपनी जनता के बीच शिक्षा को प्रसारित करें। अगर पंचायत स्तर पर ऐसे प्रावधान लाए जा रहे हैं, तो पहले विधानसभा के लिए लाए जाने चाहिए। वैसे दूसरी तरफ देखा जाए तो ऐसे प्रावधान कुछ मामलों में प्रगतिशील कदम लगते हैं, पर यह प्रगतिशीलता तब तक किसी काम की नहीं, जब तक हमारी आधारभूत संरचनाएं यानी लोगों का सामाजिक-आर्थिक स्तर उसके लायक न हो जाए।