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पत्रकारिता और नैतिकता- मृणाल पांडे

कई दूसरे शब्दों की तरह पिछले सालों में नैतिकता शब्द का भी घोर अवमूल्यन हुआ है. आज किसी भी काम के साथ इस शब्द के जुड़ते ही उससे एक पाखंडी बड़बोले उपदेशक के नक्की प्रवचन की ध्वनि कानों में रेत की तरह किरकिराने लगती है. शायद इसी वजह से जो नेकनीयत पत्रकार पेशे को समर्पित हैं, वे भी सच्चे तथा फेक, संदर्भयुक्त या संदर्भ से काटे गये समाचारों के संकलन और प्रस्तुतीकरण के संदर्भ में नैतिक प्रतिमानों का जिक्र करने से कतराते हैं.

नेता तो यह मानकर चलते रहे हैं कि चुनाव सर पर हों, तो नैतिकता जीत सापेक्ष हो जाती है और चुनावी चंदे की हेराफेरी से लेकर, विपक्षी नेताओं के खिलाफ मनगढ़ंत खबरें प्लांट कराना, नैतिकता के पक्षधर सिविल सोसाइटी के नागरिकों को राष्ट्रविरोधी दुश्चक्र रचयिता बताकर अचानक गिरफ्तार कराना और विपक्ष को वोट देनेवाले हर समुदाय पर लगातार कहर ढाना आदि परिस्थितियों की उपज और फौरी दृष्टि से जायज हैं.

हमारी तुलना में अमेरिकी अखबार तमाम भवबाधाओं के बीच भी जनता को सही सटीक सूचनाएं देने की अपनी पक्षधरता को कस कर थामे हुए हैं.

पहले वरिष्ठ पत्रकार बॉब वुडवर्ड की तीखी आलोचनात्मक किताब ने व्हाॅइट हाउस के भीतरी सूत्रों के हवाले से ट्रंप की झक्की तानाशाह कार्यप्रणाली और अमेरिकी शासन में रूस की गुपचुप दखलंदाजी की साफ तस्वीर जनता के सामने रखकर बावेला मचा दिया. और अब न्यूयार्क टाइम्स ने अपने संपादकीय पेज के सामनेवाले (ऑप एड) पेज पर भी संपादक मंडल ने जनहित में एक गुमनाम लेखक का बहुत स्तब्धकारी लेख छापा है, जो खुद व्हाॅइट हाउस के बड़े मुलाजिम हैं. वे भी ट्रंप तथा उनके काॅर्पोरेट मित्रों की बढ़ती अलोकतांत्रिक हरकतों से देश की जनता को समय रहते आगाह करना चाहते हैं.

दोनों पत्रकारीय खुलासों पर अमेरिकी सरकार की प्रतिक्रिया बहुत तीखी और प्रतिशोधात्मक हुई है. लेकिन पाठक आश्वस्त हैं कि जानकारी सही है, संपादक अटल हैं कि यह खुलासे जनहित में किये गये हैं और वायदे के मुताबिक वे लेखक का नाम उजागर नहीं करेंगे, भले ही उन पर कानूनी कार्रवाई क्यों न की जाये. बड़े अखबार ऐसे बनते हैं.

इधर लगता है कि भारत के अधिकतर बड़े संस्थानों के प्रिंट या टीवी अवतार सरकारी गलतियों या ज्यादतियों को लेकर अपने को एक नैतिकता निरपेक्ष जमीन पर जा खड़े किये हैं.

उनके स्टूडियो बहसों में नैतिकता के पहरुओं को न्योता जाना जारी है, पर बहसों के दौरान एंकर महोदय का रुख सत्तारूढ़ दल से इतर के लोगों की तरफ हावभाव मजाकिया तौर से अचरज के साथ देखते हैं. सत्यापन करवाने की बातें उनके लिए बेमानी हैं, क्योंकि उन्होंने अपने मालिकान के साथ पत्रकारिता की मौजूदा अनैतिकताओं से सुविधावादी समझौता कर लिया है.

अंग्रेजी अखबार 'दि गार्जियन' के 1995 से 2015 तक संपादक रहे एलन रुसब्रिगर ने भी यह रेखांकित किया है कि सत्य यूं तो अपने आकार में बहुत छोटा सा लफ्ज है, और उसको दार्शनिकों और प्रवचनदाताओं ने काफी लथेड़ा भी है, फिर भी अपने मूल रूप में पत्रकारिता के लिए आज जनहितकारी सूचना का इकलौता पर्यायवाची शब्द सच ही है. और सच्ची खबर कैसी हो, यह बुनियादी बात है, जो किसी अच्छे पत्रकार या पाठक को समझाने की जरूरत नहीं.

नयी तकनीक के गलत इस्तेमाल से सच को झुठलाकर उसका बार-बार उपहास करनेवाला ट्रंप सरीखा कोई भी विश्वनेता एक तरह से पत्रकारिता का भला ही कर रहा है, क्योंकि इससे दुनियाभर में विश्वस्त, ईमानदारी से जमा और पेश की गयी खबरों के लिए रुझान बढ़ रहा है. उसके उलट तकनीकों से लैस और संचालित सोशल मीडिया और टीवी की खबरों की विश्वसनीयता गिर रही है.

सत्तर के दशक में जब कुछ पेशेवर पत्रकारों ने वाशिंगटन पोस्ट की मार्फत महाबली अमेरिका के राष्ट्रपति निक्सन के ऐतिहासिक वाटरगेट टेप उजागर कर उनको सत्ताच्युत करवा दिया था. तब न तो कंप्यूटर थे, न नेट न ही, न ही सर्च इंजन और स्मार्ट फोन. पर पेशेवर हिम्मत हिमाकत और सत्य के अनुसंधान के लिए किसी भी हद तक जाने की क्षमता पत्रकारों और मीडिया समूह के मालिकों में एक सरीखी थी. भारत में भी सत्तर के दशक तक यह चमक देखने को मिलने लगी थी.

पर हिंदी के अखबार उसके बाद बहुत तेजी से बढ़ने के बावजूद अंग्रेजी खबरों की उतरन पर ही जीते रहे. हमारे पास साप्ताहिक थे, दैनिक थे, उनके हर जगह भरपूर पाठक थे, पर कुछ संपादकीय दब्बूपना और कुछ मालिकान की वृत्ति की वजह से भाषाई पत्रों के पास न पर्याप्त संख्या में कुशल रिपोर्टर रखे गये, न कार्यालयीन विद्युत, यांत्रिक और वायुसंचालित संदेशों को ग्रहण कर संपादकीय देनेवाली भाषाई मशीनें.
माखनलाल जी ने हिंदी साहित्य सम्मेलन 1943 में कहा था- 'हम शासन और प्रभाववाले व्यक्तियों से बराबरी के दावे से नहीं मिलते. मानो एक कृपा के मोहताज हों.

मराठी में केसरी, गुजरात में जन्मभूमि, मद्रास में आंध्रपत्रिका, बंगाल में आनंद बाजार पत्रिका, ये अपने इलाके की जनता के स्वामी बने बैठे हैं.... इस समय हिंदी का कलाकार, क्या किसी शत्रु के यहां कैदी है?'

हिंदी के भाग्य पलटने का क्षण जब इस सदी में आया भी, हिंदी की पत्रकारिता ने उसे गंभीरता से नहीं पकड़ा. शेष विश्व ने और भारत में अंग्रेजी अखबारों ने शुरुआती दौर में नेट और सोशल मीडिया की मार्फत देखा कि सत्तासीन सरकारें किस तरह रूपर्ट मर्डोक सरीखे मीडिया मुगलों के हाथों गिरवी हैं, किस तरह पत्रकारों के विपक्षी नेताओं की खुफिया निगरानी की जा रही है, और किस तरह पेशेवर तरीके से भरपूर पैसा देकर कई लोकतांत्रिक देशों में फेसबुक या ह्वॉट्सएप सरीखे माध्यमों से गलतबयानी फैला कर तानाशाह लोकतांत्रिक चुनावों में मतदान को प्रभावित कर रहे हैं.

पर हिंदी का रुख सर्वत्र सरलीकरण का बना रहा. आज जो विश्वसनीय खबरिया पोर्टल नजर आयेंगे, सब अंग्रेजी के हैं. उनके हिंदी स्वरूप जो हैं भी, सब अंग्रेजी की प्रतिछाया हैं. अंग्रेजी में लिखने पर हिंदी की उसी आकार की खबर से दोगुना मेहनताना मिलता है. इसलिए आज हमारे छोटे शहरों के पत्रकारिता विद्यार्थी भी अंग्रेजी की ही तरफ रुख कर रहे हैं, तो अचरज क्या है?

हिंदी पत्रकारिता के लिए हिंदी पखवाड़ा गंभीर अंतरावलोकन का समय होना चाहिए, विधवा विलाप का नहीं. मौलिकता, जिज्ञासा सहित खुद खट कर कमाये गये अपने समृद्ध अनुभव के नायाब हथियार से जब तक हिंदी जमकर पत्रकारिता जगत की वंशानुगत ठेकेदारी को चुनौती नहीं देती, तकनीकी तौर से वह समृद्ध क्यों न बन जाये, बतौर जनोपयोगी मंच, वह इंच भर आगे नहीं सरकेगी.