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Resource centre on India's rural distress
 
 

पर्यावरण की साथी स्त्रियां

पर्यावरण आंदोलन के उदय का मुख्य कारण पर्यावरणीय विनाश ही रहा है। आलोचकों का कहना है कि स्वाधीनता पाने के बाद से पश्चिमी अनुभव पर आधारित आर्थिक विकास के प्रतिमानों की नकल उतारने की वजह से भारत में प्राकृतिक संसाधनों पर संघर्ष तीव्र हुए। दूसरा, विकास योजनाओं का संसाधनों के सामाजिक पहलुओं से अनजान होना भी संसाधनों के शोषण और उस पर निर्भर लाखों ग्रामवासियों की बदहाली का कारण है। लेकिन वास्तविकता यह नहीं है। सच्चाई यह है कि विकास का सीधा आशय पुरुष प्रधान समाज का विकास है, क्योंकि विकास की रूपरेखा महिलाओं की मूलभूत आवश्यकताओं से अपरिचित रहती है। जबकि महिलाओं की ये आवश्यकताएं उनकी अपनी नहीं, पूरे परिवार की होती हैं। इसी कारण महिलाएं सबसे ज्यादा विकास की नीतियों में प्रभावित भी रही हैं। इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने लिखा भी है कि पर्यावरण का विनाश साफ तौर पर हाशिये पर रह रही संस्कृतियों और पेशों, जैसे आदिवासी, बंजारे, मछुआरे और कारीगरों पर सबसे बड़ा खतरा है, जो हमेशा से ही अपने अस्तित्व के लिए अपने आस-पास की प्रकृति पर निर्भर रहे हैं। लेकिन जैव ईंधन के स्रोतों के विनाश का सबसे बड़ा असर महिलाओं पर पड़ा है।

पर्यावरण आंदोलन की शुरुआत उत्तराखंड से हुई थी, और वह भी महिलाओं के माध्यम से। पर्यावरण आंदोलन का भी अपना लंबा इतिहास रहा है। इस इतिहास पर गौर करें तो उत्तराखंड में पहला आंदोलन औपनिवेशिक काल के दौरान 1921 में हुआ। पर्यावरण को लेकर दूसरा आंदोलन 26 मार्च 1974 को हुआ था, जो आजादी के बाद का पहला बड़ा पर्यावरण आंदोलन था, जिसे चिपको आंदोलन के नाम से भी जाना जाता है। यह आंदोलन दसौली ग्राम सेवा संघ (डीजीएसएस) में शुरुआती दौर में चंडी प्रसाद भट्ट के नेतृत्व में मंडल गांव से शुरू होकर अलकनंदा घाटी के कई गांवों में फैला था।

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