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पलायन का उर्वर प्रदेश--- हरेराम मिश्र

कुछ दिन पहले की बात है, जब मैं पलायन के परिदृश्य को समझने के लिए उत्तर प्रदेश के पूर्वी भाग यानी ‘पूर्वांचल' के जिलों में पलायन करने वाले कुछ श्रमिकों का ‘इंटरव्यू' कर रहा था। देवरिया जिले में, बातचीत के दौरान, एक श्रमिक ने कहा कि स्थानीय स्तर पर कोई काम-धंधा नहीं मिलता है इसलिए हमें देश के दूसरे हिस्सों में ‘नौकरी' खोजने के लिए जाना पड़ता है। उस श्रमिक के मुताबिक किसी भी राजनीतिक पार्टी या नेता के पास हमें स्थानीय स्तर रोजगार उपलब्ध कराने के लिए कोई खाका नहीं है। अगर हम बाहर के राज्यों से रुपया कमा कर न लाएं तो हमारा गुजारा करना मुश्किल हो जाए। यह पूछने पर कि क्या मनरेगा के तहत आप लोगों को स्थानीय स्तर पर काम नहीं दिया जाता, उसका जवाब था कि मनरेगा में कब काम होता है हमें पता ही नहीं चलता। गौरतलब है कि वह श्रमिक नोएडा में निर्माण-उद्योग में दिहाड़ी कामगार था और अपने गांव में चार एकड़ खेती-योग्य जमीन का मालिक था। इसके बावजूद नकद आय के लिए पलायन करना उसकी मजबूरी थी। उस श्रमिक की यह समझ एकदम तार्किक थी कि अगर प्रदेश का राजनैतिक नेतृत्व चाहे तो पूर्वांचल की पलायन की समस्या काफी हद तक कम हो सकती है। चूंकि उत्तर प्रदेश में इन दिनों चुनाव हो रहे है, लिहाजा पूर्वांचल की इस समस्या पर सार्थक बहस का यह माकूल मौका है।

गौरतलब है कि भाजपा ने उत्तर प्रदेश के लिए अपने चुनावी घोषणापत्र में पलायन रोकने के लिए ‘एंटी पलायन टास्क फोर्स' के गठन का वादा किया है। हालांकि यह बात अपने आप में काफी दिलचस्प है कि मोदी सरकार ने अपने हालिया आर्थिक सर्वेक्षण में ‘पलायन' को आर्थिक गतिविधि और विकास के लिए जरूरी माना है। यह बात भी समझ से परे है कि जो पार्टी उदारीकरण को देश के विकास के लिए जरूरी मानती हो, वह श्रमिकों के हित में पलायन के खिलाफ कैसे जा सकती है? क्योंकि पूंजी और श्रम के हित समान नहीं होते और पलायन उदारीकरण की आधारभूत सच्चाइयों में से एक है। उदारीकरण के दर्शन में गांवों की तबाही से ही शहर ‘आबाद' होते हैं। इसलिए हैरत की बात नहीं कि भाजपा के इस घोषणापत्र में पलायन रोकने का कोई रोडमैप नहीं है। इसके अतिरिक्त, ज्यादातर पार्टियां केवल ‘विकास' के नारे के साथ उत्तर प्रदेश का चुनाव लड़ रही हैं, मगर इस विकास में आम जनता की क्या भागीदारी होगी इस पर किसी के पास कोई ठोस विजन नहीं है। मायावती जहां उत्तर प्रदेश के बंटवारे में पूर्वांचल की समस्याओं का हल देखती हैं वहीं समाजवादी पार्टी इससे ठीक उलट सोचती है। लेकिन चाहे भाजपा हो या सपा या बसपा, श्रमिकों के पलायन जैसे आधारभूत सवाल को हल करने की दिशा में उनके पास चुप्पी के सिवा कुछ नहीं है।

 


बहरहाल, विदेशी पूंजी को विकास का सूचकांक मानने वाली भाजपा की ‘एंटी पलायन टास्क फोर्स' के गठन की बात केवल भरमाने वाली है, क्योंकि देश का आर्थिक सर्वे यह बता रहा है कि अभी इस मुल्क में कोई नया विदेशी पूंजी निवेश नहीं होने जा रहा है। मतलब नौकरी नहीं बढ़ेगी। यहां यह भी समझ लेना चाहिए कि उदारीकृत आर्थिक नीतियों के बाद भारत में विदेशी पूंजी निवेश भले ही बढ़ा हो, लेकिन उससे गांवों को कोई फायदा नहीं हुआ। उदारीकरण की नीतियां ही भारत की कृषि को चौपट करने के लिए मुख्यत: जिम्मेदार हैं। कृषि कभी ग्रामीण भारत में रोजगार का मुख्य स्रोत हुआ करती थी, जबकि आज देश के दो तिहाई किसान, अगर विकल्प मिले तो, खेती छोड़ना चाहते हैं।

 

 


वैसे भी ‘विकास' अपने आप में एक संदिग्ध शब्द है। इस संदर्भ में हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि इसी कथित विकास की कीमत देश के तीस लाख अवाम को विस्थापन के बतौर चुकानी पड़ी है। आज तक उनका पुर्नवास नहीं किया गया। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में विकास के नाम पर किसानों की जमीन हड़पने और उसे मामूली दामों में अपने चहेते बिल्डरों को सौंपने के किस्से बेहद आम हैं। टप्पल के किसानों ने अपनी अधिग्रहीत भूमि का मुआवजा मांगा तो उन पर ‘रासुका' लगाया गया। कानपुर के घाटमपुर में बिजलीघर निर्माण के लिए अधिग्रहीत की गई जमीन के बदले मुआवजे की किसानों को अपने खिलाफ मुकदमे मिले।

 

 


पूर्वांचल श्रम-शक्ति की विशाल मंडी है। स्थानीय स्तर पर रोजगार का कोई साधन न होने की वजह से यहां का श्रमिक दो तरह से पलायन करता है। पहला है देश से बाहर का रुख करना। बहुत सारे लोग खाड़ी देशों में काम की तलाश में जाते हैं। दूसरा है, देश के भीतर ही रोजगार के लिए अन्य स्थानों पर जाना। इस पलायन में पूर्वांचल के श्रमिक नोएडा, दिल्ली, हैदराबाद, मुंबई, चंडीगढ़ और पंजाब आदि का रुख करते हैं। पूर्वांचल के देवरिया, गोरखपुर, कुशीनगर जैसे जिलों में खेती ही रोजगार का मुख्य जरिया है। लेकिन पिछले कई साल से खेती घाटे का धंधा बनी हुई है। तिस पर नेपाल की तराई से आने वाला बरसात का पानी अपने साथ बाढ़ के रूप में भीषण तबाही लाता है। मतलब यह कि किसानों को दोहरी मार झेलनी होती है। हालांकि पलायन करने वालों की संख्या की बाबत कोई ठोस अध्ययन उपलब्ध नहीं है, लेकिन मैंने देवरिया में कई ऐसे गांव देखे थे जहां पुरुषों की मौजूदगी न के बराबर है। इन गांवों में केवल बच्चे और बूढ़े ही बचे थे।

 

 


अगर हम दक्षिण-पूर्व पूर्वांचल की बात करें तो अवैध खनन के शिकार सोनभद्र में तो हालात और भी खराब हैं। चूंकि यहां पर खेती के लिए जमीन ठीक नहीं है इसलिए यहां से मौसमी पलायन पश्चिमी उत्तर प्रदेश के लिए बहुत बड़ी संख्या में होता है। गांव के गांव रोजगार की तलाश में खाली हो जाते हैं। जिस तरह से झारखंड के गढ़वा और लातेहार जिले से मौसमी पलायन (सीजनल माइग्रेशन) होता है, उसी तरह सोनभद्र की पिछड़ी जातियां और जनजातियां काम की तलाश में सपरिवार पश्चिमी उत्तर प्रदेश के लिए कूच कर जाती हैं। मैं खुद ऐसे समूहों से कई बार मिला हूं। सच्चाई यह है कि इन समूहों को लेकर किसी राजनीतिक दल के पास कोई ‘जिम्मेदारी' नहीं है। इस प्रकरण में हमें मनरेगा की विफलता, कमियों और उसके अथाह भ्रष्टाचार के तथ्य को भी स्वीकार करना चाहिए।
कुल मिलाकर, यह आधारभूत सवाल है कि लोकतंत्र के इस उत्सव में पलायन जैसे संवेदनशील विषय पर कोई बात क्यों नहीं हो रही है? आखिर क्यों राजनीतिक दल इस विषय पर बात करने से कन्नी काट रहे हैं? आखिर क्यों वे सब विकास के नाम पर पूर्वांचल की इस समस्या को नजरअंदाज कर रहे हैं? यह हमारे लोकतंत्र की एक क्रूर सच्चाई है कि हमारे राजनीतिक दलों को श्रमिकों का वोट तो चाहिए, पर उन्हें श्रमिकों की कोई फिक्र नहीं है। विकास के नाम पर श्रमिकों की सामाजिक सुरक्षा की गारंटी करने वाले कानूनों का खात्मा किया जा रहा है। आज हम जिस राजनीति को देख रहे हैं उसमें आम आदमी के लिए, उसके सवालों को तवज्जो नहीं मिल रही है। रोजगार के लिए गांवों से शहरों की तरफ पलायन का सिलसिला यह दर्शाता है कि कृषि लगातार गहरे संकट में है। दूसरी तरफ, इस पलायन के चलते शहरों पर अनावश्यक बोझ भी बढ़ता जा रहा है। गांव उजड़ते जा रहे हैं और शहर लगातार बढ़ती भीड़ से आक्रांत। लिहाजा, इस पलायन की समस्या का जड़मूल से समाधान करना है तो खेती को पुसाने लायक बनाना होगा।