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पाठ्यपुस्तक में इमरजेंसी अध्याय-- प्रो. योगेन्द्र यादव

इमरजेंसी पर केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर के बयान ने मुझे एक भूले-बिसरे किस्से की याद दिला दी. जब भी इस किस्से को याद करता हूं तो विस्मय होता है, गर्व भी होता है.


जयपुर में भाजपा द्वारा आपातकाल को काले दिवस की तरह मनानेवाले कार्यक्रम में केंद्रीय शिक्षा मंत्री ने कहा, 'हमने तय किया है कि हम पाठ्यक्रम में बदलाव कर आपातकाल की सत्यता के बारे में विद्यार्थियों को भी बतायेंगे, ताकि इतिहास की सही व्याख्या हो सके.' शायद जावड़ेकर सोचते होंगे कि चूंकि ये पाठ्यपुस्तकें कांग्रेस सरकार के जमाने में लिखी गयी थीं, इसलिए ऐसी सूचनाओं को दबा दिया गया होगा.


लगता है शिक्षा मंत्री का ध्यान किसी ने उनके ही मंत्रालय के तहत स्वायत्त संस्था एनसीईआरटी द्वारा प्रकाशित कक्षा 12 की राजनीतिशास्त्र की पाठ्यपुस्तक 'स्वतंत्रोत्तर भारत में राजनीति' पर नहीं दिलाया. इसमें न सिर्फ इमरजेंसी का जिक्र है, बल्कि इसका छटा अध्याय इमरजेंसी पर ही केंद्रित है.


सवाल है कि कांग्रेस के जमाने में लिखी गयी इस पाठ्यपुस्तक में इमरजेंसी का पूरा सच कैसे बताया गया? यही वह किस्सा है, जो अब सार्वजनिक होना चाहिए.


सन् 2005 में प्रख्यात शिक्षाविद् और तात्कालिक एनसीईआरटी के निदेशक प्रो कृष्ण कुमार ने एनसीईआरटी की ओर से प्रो सुहास पलशिकर और मेरे सामने प्रस्ताव रखा कि हम कक्षा 9 से 12 तक की सभी राजनीति शास्त्र की पाठ्यपुस्तकों को नये सिरे से लिखने के काम में मुख्य जिम्मेदारी संभालें.


हमारा आग्रह था कि हमें पाठ्यपुस्तक ही नहीं, सिलेबस भी सुझाने की आजादी हो. और हम जो कुछ लिखें, उससे छेड़छाड़ न की जाये. प्रो मृणाल मिरी की अध्यक्षता में देश के अग्रणी विद्वानों की समिति ने हमें मुख्य सलाहकार नियुक्त किया और प्रो हारी वासुदेवन की समिति ने नये सिलेबस को मान्यता दे दी.


इस समझ के साथ उन एनसीईआरटी की पाठ्यपुस्तकों का लेखन शुरू हुआ, जो आज भी स्कूलों में पढ़ायी जा रही हैं. देश के प्राय: सभी अग्रणी राजनीतिशास्त्री इस प्रयास से जुड़े. मैं उस जमाने में सीएसडीएस में था और भारतीय राजनीति के जाने-माने विद्वान प्रो पलशिकर तब पुणे विवि में थे.


इस पुस्तक में हमारे साथ दिल्ली विवि के प्रो उज्ज्वल कुमार भी थे. इन पुस्तकों से क्या हासिल हुआ, इसका फैसला तो इतिहास करेगा. लेकिन ये पुस्तकें अब भी (कुछ काटछांट और छेड़छाड़ के बावजूद) स्कूलों में पढ़ायी जा रही हैं. पाठक इन्हें पढ़कर इन पर अपनी राय बना सकते हैं.

हमारी पहल पर बारहवीं में राजनीतिशास्त्र विषय लेनेवाले विद्यार्थियों को स्वतंत्रता के बाद राजनीति का इतिहास पढ़ाने का फैसला हुआ. अब भला 1947 के बाद का इतिहास इमरजेंसी के बिना कैसे लिखा जा सकता है?


इसलिए हमने फैसला किया कि उस पाठ्यपुस्तक में इमरजेंसी पर पूरा एक अध्याय होगा: इमरजेंसी का उद्गम, उसके दौरान हुई तमाम घटनाएं, उससे जुड़े सभी विवाद और इतिहास के उस दौर के सबक. हमारे सभी साथी हैरान थे कि यह हम क्या करने जा रहे हैं! कुछ समझदार लोगों ने इशारा भी किया कि इस अध्याय के चलते सारी पाठ्यपुस्तकें रुक सकती हैं. लेकिन प्रो कृष्ण कुमार ने कभी हमें नहीं रोका. वे अपने वादे पर कायम थे.


पुस्तकें लिखी गयीं. इमरजेंसी वाले अध्याय में पाठ्यपुस्तक के अनुरूप एक संतुलित और तथ्यपरक भाषा में वह सब बातें लिखी गयीं, जो इमरजेंसी के बारे में बतायी जानी चाहिए: इंदिरा गांधी द्वारा अपने व्यक्तिगत संकट को राष्ट्रीय संकट का रूप देने की कोशिश, मंत्रिमंडल से चर्चा किये बिना इमरजेंसी की घोषणा, प्रेस सेंसरशिप, राजनीतिक विरोधियों का दमन, मानवाधिकारों का हनन, न्यायपालिका का समर्पण, तुर्कमान गेट और राजन कांड जैसी बर्बर घटनाएं. जो लिखा नहीं गया उसे कार्टून, तस्वीरों, अखबार की कतरनों के सहारे बता दिया गया. किताब की समीक्षा के लिए प्रो गोविंद देशपांडे की अध्यक्षता में बनी विद्वत गणों की समिति ने जांच की, इमरजेंसी वाले अध्याय का सस्वर पाठ हुआ और बिना काटछांट के स्वीकार कर लिया गया.


मामला संवेदनशील था, इसलिए प्रो मृणाल मिरी की अध्यक्षता वाली समिति ने दोबारा इसकी समीक्षा की और पास कर दिया. सब जानते थे कि इस अध्याय के चलते कुछ भी अनर्थ हो सकता था. लेकिन, प्रो कृष्ण कुमार या किसी वरिष्ठ समिति ने हमें रोकने की कोशिश भी नहीं की.

उसके बाद प्रो कृष्ण कुमार ने एक अनुरोध किया कि इस पाठ्यपुस्तक को प्रेस में भेजने से पहले शिक्षा मंत्री को दिखा लिया जाये. अगर संसद में बात चलती है, तो जवाब तो मंत्री को देना होगा. हम तो वहां होंगे नहीं. प्रो सुहास पलशिकर और मैंने यह मान लिया.


उस जमाने में अर्जुन सिंह शिक्षा मंत्री थे. सच कहूं तो मेरी उनके बारे में बहुत अच्छी राय नहीं थी. इसलिए जब 15 दिन बाद उनके दफ्तर से फोन आया कि मंत्री जी आपसे मिलना चाहते हैं, तो मेरा मन सशंकित हुआ.


प्रो कृष्ण कुमार को भी बुलाया गया था और उन्होंने प्रो यशपाल को अनुरोध कर साथ ले लिया था. देश के मूर्धन्य वैज्ञानिक प्रो यशपाल एनसीईआरटी द्वारा पुस्तक लेखन कि इस पूरी प्रक्रिया का निर्देशन कर रहे थे.


बात वही पहुंची जिसका संदेह था. मंत्रीजी ने एक-एक शब्द पढ़ा हुआ था, लेकिन प्रश्न उनके बाबू पूछ रहे थे. 'आप लिखते हैं कि इमरजेंसी भारतीय लोकतंत्र का सबसे विवादास्पद दौर था?' मैंने पलटकर पूछा 'नहीं था क्या?'.


बात तुर्कमान गेट और राजन कांड की हुई, मैंने बताया कि सारी सूचनाएं शाह आयोग की रिपोर्ट से ली गयी हैं. उन्होंने कहा, 'लेकिन कांग्रेस ने उसका बहिष्कार किया था!' मैंने कहा उससे क्या फर्क पड़ता है, संसद पटल पर आज भी इमरजेंसी के बारे में रखा गया वह एकमात्र प्रामाणिक दस्तावेज है.


अर्जुन सिंह सारी बातचीत को बहुत ध्यान से सुन रहे थे, मंद-मंद मुस्कुरा रहे थे. मेरी ओर मुड़े और पूछा 'प्रोफेसर साहब, आपको लगता है हमारे बच्चे इस कड़वे सच के लिए तैयार हैं? हमारा लोकतंत्र इतना मेच्योर हो गया है?' मैंने जवाब देना शुरू किया था कि यशपाल जी ने मुझे रोका और कहा 'सर, अब बच्चों को पंख लगाकर उड़ने दीजिये'. अर्जुन सिंह ने कुछ क्षण के लिए आंखें बंद की और फिर कहा 'ठीक है, जैसी आपकी इच्छा'. वह अध्याय बिना कॉमा, फुल स्टॉप बदले ज्यों का त्यों छपा. इस किस्से और इस अध्याय को पढ़कर प्रकाश जावड़ेकर और वर्तमान सरकार क्या सीख सकते हैं, यह मैं उन पर छोड़ता हूं.