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पीएम की बातें और देश के सवाल-- योगेन्द्र यादव

क्या लाल किले और चांदनी चौक में फासला बढ़ रहा है? पंद्रह अगस्त को लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री का भाषण सुनते वक्त यह सवाल मेरे जहन में कौंध रहा था. टीवी पर विपक्षी नेता और कई एंकर शिकायत कर रहे थे कि प्रधानमंत्री का भाषण बहुत राजनीतिक है.

मुझे इसकी चिंता नहीं थी. स्वतंत्रता दिवस पर प्रधानमंत्री का भाषण राजनीतिक होता है, होना भी चाहिए. यह भाषण प्रधानमंत्री के लिए एक मौका है कि देश की जनता को वह अपने राज-काज का लेखा-जोखा दे. इसमें क्या एतराज?

मेरी चिंता कुछ और थी. क्या प्रधानमंत्री अपने भाषण में उन सवालों का जवाब दे रहे थे, जो जनता के मन में हैं? कुछ ही दिन बाद एक प्रमाण मिल गया, जिसने मेरे संदेह को पुख्ता कर दिया.

इंडिया टुडे और आजतक ने कारवी एजेंसी के साथ अपना छमाही राष्ट्रीय जनमत सर्वे जारी किया. देशभर में 12 हजार के एक प्रतिनिधि सैंपल से बात कर यह 'मूड ऑफ द नेशन सर्वे' हर छह महीने बाद हमारे सामने जनमत का आईना पेश करता है. इस बार का सर्वे प्रमाणित करता है कि देश के शासकों के मन की बात और जनता के मन की बात में कितना बड़ा फासला है.

सर्वे के मुताबिक, देश की जनता की सबसे बड़ी चिंता बेरोजगारी है. बीते सालभर में बेरोजगारी को देश की सबसे बड़ी समस्या बतानेवालों की संख्या 27 प्रतिशत से बढ़कर 34 प्रतिशत हो गयी है.

जब उनसे यह पूछा गया कि क्या सरकार के प्रयास से पिछले चार साल में रोजगार के अवसर बढ़े हैं, तो सिर्फ 14 प्रतिशत ने सकारात्मक उत्तर दिया, जबकि 60 प्रतिशत ने कहा कि रोजगार की हालत पहले से खराब हुई है. जब इस सर्वे में लोगों से मोदी सरकार की सबसे बड़ी असफलता बताने को कहा गया, तो भी नंबर एक पर बेरोजगारी का ही नाम आया.

सिर्फ नौजवान ही नहीं, पूरा देश बेरोजगारी के सवाल पर चिंतित है. लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी ने इस चिंता को पहचाना था और दो करोड़ नौकरियां प्रतिवर्ष देने का वादा किया था. अब उस दो करोड़ नौकरी का तो जिक्र भी प्रधानमंत्री नहीं करते.

कभी पकौड़े की नौकरी का दावा करते हैं, कभी मुद्रा योजना भविष्य निधि के आंकड़ों को मसलकर उससे रोजगार वृद्धि के निष्कर्ष निकालते हैं. वे सब करते हैं, लेकिन रोजगार के सीधे आंकड़े देश के सामने नहीं रखते. और तो और, जो लेबर ब्यूरो का सर्वे यह आंकड़ा इकट्ठा करता था, उसे भी बंद करवा दिया है. लाल किले से अपने कार्यकाल के अंतिम भाषण में प्रधानमंत्री ने देश की सबसे बड़ी चिंता पर एक शब्द भी नहीं बोला.

सर्वे के मुताबिक देश की दूसरी सबसे बड़ी चिंता है महंगाई. यह चिंता भी पिछले एक साल में 19 प्रतिशत से बढ़कर अब 24 प्रतिशत पर पहुंच गयी है. इस पर भी प्रधानमंत्री चुप्पी साध गये. उन्हें अर्थशास्त्रियों ने बता दिया होगा कि मनमोहन सिंह सरकार की तुलना में इस सरकार के कार्यकाल में मुद्रास्फीति की दर कहीं कम रही है.

बात सही भी है. लेकिन, जब लोगों से पूछा जाता है कि पिछले चार साल में महंगाई का क्या हाल है, तो 70 प्रतिशत कहते हैं कि महगांई बढ़ी है और सिर्फ 11 प्रतिशत कहते हैं कि महंगाई में कमी आयी है. जब आम आदमी महंगाई की शिकायत करता है, तो वह सिर्फ मुद्रास्फीति की बात नहीं कर रहा. वह यह शिकायत कर रहा है कि उसकी जरूरत की वस्तुएं उसकी पहुंच से बाहर हो गयी हैं. वह सिर्फ बाजार में भाव की शिकायत नहीं कर रहा, बल्कि अपनी आय की कमी को भी दर्ज कर रहा है.

इस सर्वे के मुताबिक अपनी आर्थिक स्थिति को पहले से बदतर बतानेवालों का अनुपात पिछले एक साल में 13 प्रतिशत से बढ़कर अब 25 प्रतिशत हो गया है. जीएसटी से फायदा बतानेवालों से ज्यादा संख्या उनकी है, जो कहते हैं कि जीएसटी से उन्हें नुकसान हुआ. नोटबंदी को अच्छा बतानेवाले सिर्फ 15 प्रतिशत हैं और बुरा बतानेवाले 73 प्रतिशत.

जनता की तीसरी सबसे बड़ी चिंता भ्रष्टाचार की है. यहां भी पिछले चार साल में सरकार की कारगुजारी से जनता संतुष्ट नहीं है. सिर्फ 23 प्रतिशत लोग कहते हैं कि भ्रष्टाचार घटा है, 28 प्रतिशत मानते हैं कि वह जस-का-तस है और 48 प्रतिशत कहते हैं कि पिछले चार साल में भ्रष्टाचार बढ़ गया है.

प्रधानमंत्री और उनके समर्थक बार-बार कहते थे कि पिछले चार साल में कोई बड़ा घोटाला सामने नहीं आया. विरोधी कहते थे कि सरकार ने सीएजी, सतर्कता आयुक्त और न्यायपालिका तक पर पहरा डाल रखा है, तो कोई घोटाला बाहर कैसे आयेगा. इसलिए बिरला सहारा डायरी का मामला दफन हो गया.

अब जबकि फ्रांस से राफेल विमान की खरीद में बड़े घोटाले का आरोप सामने आया है, तो यह अपेक्षा थी कि प्रधानमंत्री इसका पूरा सच देश के सामने रखते. उन्होंने ऐसा नहीं किया. अविश्वास प्रस्ताव के समय यह सवाल संसद में उठा था. तब भी प्रधानमंत्री दो-चार वाक्य बोलकर टाल गये थे. रक्षा मंत्री जितना बोलीं, उससे आरोप और भी ज्यादा गंभीर नजर आये. भ्रष्टाचार का सवाल उठ रहा है, लेकिन जवाब नहीं मिल रहा.
इस सर्वे के मुताबिक देश की चौथी बड़ी चिंता किसानों की आत्महत्या और कृषि के संकट की है. इस पर प्रधानमंत्री खूब बोले, लेकिन अफसोस, जितना बोले अर्धसत्य बोले. उन्होंने यह झूठ दोहराया की किसानों को उनकी मांग के अनुरूप पूरी लागत का ड्योढ़ा न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) दे दिया गया है, जबकि सच यह है कि सरकार ने आंशिक लागत पर ड्योढ़ा दाम घोषित किया है.

प्रधानमंत्री ने गिनाया कि 99 बड़ी सिंचाई योजनाओं पर काम चल रहा है, लेकिन यह नहीं बताया कि उनमें से आधी से ज्यादा समय सीमा के बाद भी अधूरी पड़ी हैं. उन्होंने कृषि में निर्यात बढ़ाने का संकल्प जताया, मगर यह नहीं कबूला कि उनके शासनकाल में कृषि का निर्यात गिर गया है. उन्होंने किसानों की आय दोगुनी करने का जुमला दोहराया, लेकिन यह नहीं बताया कि पिछले चार साल में किसानों की आय वास्तव में कितनी बढ़ी है.

टीवी पर इस सर्वे की सारी चर्चा सिर्फ इस पर सिमट गयी कि बीजेपी को कितनी सीटें आ सकती हैं, किस गठबंधन की जरूरत होगी और महागठबंधन की क्या संभावनाएं हैं.

लेकिन, मुझे इसमें कम दिलचस्पी थी. मुझे इस जनमत सर्वेक्षण में दिख रहे जनमत के आईने में दिलचस्पी थी. मुझे चिंता है कि कहीं ऐसा तो नहीं कि लाल किले के सरकारी बोल और चांदनी चौक में खड़ी जनता के कान में फासला बढ़ता जा रहा है? कहीं ऐसा तो नहीं कि प्रधानमंत्री का भाषण सुनते वक्त जनता को उनकी बातों से ज्यादा उनकी चुप्पी याद रहेगी?