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पीएमओ ने किसान को वापस भेजा मनी ऑर्डर,जानें क्या था पूरा मामला

नई दिल्‍ली। देश में जैसे ही प्‍याज के दाम ऊपर या नीचे होते हैं, तो राजनीतिक पार्टियों की दिल की धड़कने तेज हो जाती हैं। प्‍याज कई राजनीति पार्टियों को रुला चुकी है। दिल्‍ली में तो प्‍याज की बढ़ती कीमत की वजह से भारतीय जनता पार्टी की सरकार के हाथ से सत्‍ता ही चली गई थी। ऐसे में प्‍याज के मुद्दे पर राज्‍यों से लेकर केंद्र की सरकार भी हमेशा सचेत रहती है। हाल ही में प्‍याज की कीमत से जुड़ा एक मुद्दा प्रधानमंत्री कार्यालय तक पहुंच गया। हालांकि ये मुद्दा प्‍याज की बढ़ी कीमत को लेकर नहीं, बल्कि इसकी बेहद कम कीमत को लेकर नासिक के एक किसान ने उठाया।

 

प्‍याज की कम कीमत को लेकर नासिक में कई किसानों ने विरोध स्‍वरूप प्‍याज को सड़कों पर फेंक दिया। इनका कहना है कि प्‍याज की इतनी कम कीमत लेने से अच्‍छा है कि वो इसे ऐसे ही फेंक दें।

 

महाराष्ट्र के नासिक जिले में एक किसान द्वारा भेजे गए मनी-ऑर्डर को प्रधानमंत्री कार्यालय की ओर से लौटा दिया गया है। कुछ दिन पहले एक स्थानीय डाकघर ने उन्हें सूचित किया कि उनके मनी-ऑर्डर को स्वीकार नहीं किया गया।

 

किसान ने बुधवार को बताया, 'मैं सोमवार को निपहद के डाक कार्यालय गया और 1,064 रुपये मुझे वापस कर दिए गए। मेरा उद्देश्‍य सरकार को किसानों के वित्तीय परेशानी को कम करने को लेकर कुछ कदम उठाने के लिए प्रेरित करने का था। मैं बताना चाहता था कि कम कीमतों को लेकर किसानों को कितनी परेशानी का सामना करना पड़ता है।

 

ये है मामला


महाराष्ट्र के प्याज उत्पादक एक किसान ने फसल की कम कीमत मिलने पर अनूठे तरीके से विरोध जताया। प्याज का दाम करीब एक रुपये किलो मिलने पर किसान ने सारी रकम प्रधानमंत्री को भेज दी। यह किसान हैं नासिक जिले के निफाड तहसील निवासी संजय सेठ।

 

सेठ उन प्रगतिशील किसानों में शामिल थे, जिन्हें 2010 में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के भारत दौरे पर उनसे मिलने का मौका मिला था। सेठ ने रविवार को बताया, ‘मैंने इस सीजन में 750 किलोग्राम प्याज का उत्पादन किया। निफाड के थोक बाजार में जब प्याज बेचने के लिए पहुंचा तो एक रुपये प्रति किलोग्राम का प्रस्ताव मिला। मोलभाव के बाद मैंने 1.40 रुपये प्रति किलो के हिसाब से प्याज बेच दिया, जिससे मुझे 1,064 रुपये मिले।' उन्होंने कहा, ‘चार महीने की कड़ी मेहनत की इस कीमत ने मुझे बहुत दुखी किया। इसलिए, मैंने प्याज बेचकर मिली राशि विरोध स्वरूप प्रधानमंत्री कार्यालय के आपदा राहत कोष में दान दे दी।'

 

1998 में जब केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार थी, तब प्याज की कीमतों ने रुलाना शुरू कर दिया था। तब प्याज के असर से बचने के लिए सरकार ने कई तरह की कोशिशें की, लेकिन दिल्ली में जगह-जगह प्याज को सरकारी प्रयासों से सस्ते दर पर बिकवाने की कोशिशें ऊंट के मुंह में जीरा ही साबित हुईं। इसके बाद जब चुनाव हुआ तो मुख्यमंत्री सुषमा स्वराज के नेतृत्व वाली भाजपा बुरी तरह हार गई। शीला दीक्षित दिल्ली की मुख्यमंत्री बनीं, लेकिन 15 साल बाद प्याज ने उन्हें भी रुला दिया। अक्‍टूबर 2013 को प्याज की बढ़ी कीमतों पर सुषमा स्वराज की टिप्पणी थी कि यहीं से शीला सरकार का पतन शुरू होगा।