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पुरानी परेशानियों का खुलेगा पिटारा - जयराम रमेश

विगत सोमवार को मोदी सरकार ने भूमि अधिग्रहण कानून-2013 में संशोधन के लिए प्रस्तावित अध्यादेश को मंजूरी दे दी। इस संशोधन के संदर्भ में जो कुछ सामने आया है, उसके तहत कुछ परियोजनाओं की अलग श्रेणी बनाई गई है, जिन्हें कथित तौर पर त्वरित ढंग से पूरा किया जाना है। इस श्रेणी के तहत जो विषय शामिल किए गए हैं, उनमें औद्योगिक कॉरिडोर, रक्षा एवं रक्षा उत्पादन तथा ग्रामीण बुनियादी ढांचा (विद्युतीकरण, निर्धन वर्ग के लिए आवासों का निर्माण तथा सार्वजनिक-निजी सहभागिता के तहत इंफ्रास्ट्रक्चर योजनाएं) हैं। इस संशोधन का तात्कालिक और सबसे अधिक संभावित प्रभाव यह है कि अब इन परियोजनाओं के लिए जमीन बिना किसी पूर्व निर्धारित प्रक्रिया के अधिग्रहीत की जा सकती है। इस प्रक्रिया को सामाजिक प्रभाव आकलन यानी एसआईए के रूप में भूमि अधिग्रहण कानून में शामिल किया गया था। इसके तहत जमीन अधिग्रहण के लिए प्रभावित परिवारों की सहमति आवश्यक थी। इस संशोधन पर निगाह डालने से पता चलता है कि यह न केवल समस्याएं पैदा करने वाला है, बल्कि पीछे ले जाने वाला भी है। इससे जमीन के मालिकों और उनकी आजीविका को गहरा नुकसान पहुंचेगा।

सबसे पहले तो यह देखना होगा कि भूमि अधिग्रहण कानून के डीएनए में सहमति और एसआईए प्रक्रिया को शामिल करने के पीछे एक ठोस तर्क था। भूमि अधिग्रहण शासन द्वारा अपनी ताकत के मनमाने इस्तेमाल का एक उपकरण बनकर रह गया था। जमीन का अधिग्रहण लगभग हमेशा शक्ति के बल पर किया जाता था, जिससे तमाम तरह की हिंसक घटनाओं और विरोध-प्रदर्शनों का जन्म होता था। शासन के लिए प्रभावित परिवारों में से 70 से 80 प्रतिशत लोगों की सहमति अनिवार्य बनाने से कानून उन लोगों को ताकत देने वाला बना, जिन्हें सत्ता के मनमाने इस्तेमाल से प्रभावित होना पड़ता था। आजाद भारत के इतिहास में पहली बार लोगों को यह कहने का अधिकार मिला कि शासन को उनकी भूमि के प्रति किस तरह का बर्ताव करना चाहिए। अब सरकार जो संशोधन करने जा रही है, उससे हमें एक बार फिर अंग्रेजों के जमाने के उस कानून की ओर लौटना पड़ रहा है, जिसके सामने लोगों की एक नहीं चलती थी।

दूसरे, 2013 का कानून दो साल तक चले अभूतपूर्व राष्ट्रव्यापी विचार-विमर्श के बाद बनाया गया था। इस सिलसिले में दो सर्वदलीय बैठकें हुईं और बिल पर संसद के दोनों सदनों में 12 घंटे की चर्चाएं चलीं। इन चर्चाओं में 60 से अधिक सदस्यों ने भाग लिया। सुषमा स्वराज और अरुण जेटली द्वारा सुझाए गए दो महत्वपूर्ण संशोधनों को भी स्वीकार किया गया। सुमित्रा महाजन (संप्रति लोकसभा स्पीकर) की अध्यक्षता वाली स्थायी समिति द्वारा की गई 28 सिफारिशों में से 26 को स्वीकार कर कानून में शामिल किया गया। भाजपा ने न केवल संसद में कानून का समर्थन किया था, बल्कि उन प्रावधानों के प्रति भी अपनी रजामंदी दिखाई थी, जिन्हें अब उसकी सरकार कानून से बाहर करना चाहती है। मोदी सरकार का यह बड़ा यू-टर्न चौंकाने वाला बन जाता है।

तीसरे, असंशोधित अधिनियम के तहत सहमति और एसआईए प्रावधान से छूट केवल चौथी अनुसूची के 13 कानूनों के रूप में दी गई थी। यह तथ्य ध्यान में रखते हुए कि कुछ परियोजनाएं अन्य की तुलना में कहीं अधिक राष्ट्रीय महत्व वाली होती हैं, कानून के निर्माताओं ने पहले ही परियोजनाओं की एक अलग श्रेणी बना दी थी, जिनमें रेलवे, राष्ट्रीय राजमार्ग, परमाणु ऊर्जा, बिजली आदि से जुड़ी परियोजनाएं शामिल हैं। इसी तरह रक्षा और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए जमीन अधिग्रहण को तात्कालिकता संबंधी प्रावधान के तहत छूट प्रदान की गई थी। हैरत की बात है कि इन 13 कानूनों को भी एक साल के भीतर संशोधित करने की जरूरत महसूस की जा रही है।

चौथे, इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्टों (पीपीपी परियोजनाओं समेत) की तरह कुछ मामलों के लिए अलग श्रेणी बनाना ताकि उन्हें सहमति की अनिवार्यता से मुक्त किया जा सके, हर लिहाज से हैरान करने वाला है। असंशोधित कानून में जो छूट प्रदान की गई थी, वह व्यापक विचार-विमर्श का परिणाम थी, लेकिन अध्यादेश के मामले में छूट इस तरह के किसी स्पष्टीकरण के बिना प्रदान की गई है कि अमुक परियोजना अथवा सेक्टर को क्यों इस श्रेणी में रखा गया है? कानून बनाने के इस तरह के तौर-तरीके प्रशासनिक निर्णय प्रक्रिया में मनमानी की ओर ले जाते हैं। संशोधन के समर्थक नि:संदेह यह तर्क देंगे कि बदले रूप में भूमि अधिग्रहण कानून मुआवजे, पुनर्वास और पुनर्स्थापना के प्रावधानों को तनिक भी हल्का नहीं करता, बल्कि केवल जमीन अधिग्रहण की प्रक्रिया को सुगम-सरल बनाता है। लेकिन वे यह समझ पाने में नाकाम हैं कि सरकार की लेन-देन की शक्ति और न्यूनतम साझा सहमति के बीच बहुत बड़ा दायरा है। सामाजिक प्रभाव आकलन की प्रक्रिया प्रभावित लोगों (प्राय: किसान) को मुआवजे की बेहतर कीमतों पर बातचीत करने का अधिकार देती है। इस प्रक्रिया के जरिए कलेक्टर व सरकार के अन्य प्रतिनिधियों द्वारा विशेषाधिकार के चुनिंदा इस्तेमाल की संभावना को भी समाप्त कर दिया गया था।

अब जब एसआईए प्रक्रिया को हटा दिया गया है, तब कलेक्टर एक बार फिर यह निर्धारण कर सकते हैं कि उनके हिसाब से जन-उद्देश्य क्या है और कितनी जल्दी जमीन का अधिग्रहण किया जा सकता है। उनके इसी बिना रोक-टोक वाले अधिकार के कारण पिछले 70 वर्षों में भूमि अधिग्रहण कानून का मनमाना इस्तेमाल होता रहा। विशेषाधिकार की जगह एक स्पष्ट और पारदर्शी प्रक्रिया अपनाई गई थी ताकि मनमाने फैसलों को रोका जा सके। अब यह सुरक्षा ढह गई है। एसआईए को इस तरह बनाया गया था कि न्यूनतम जरूरत से तनिक भी अधिक जमीन का अधिग्रहण न किया जा सके। यह एक महत्वपूर्ण उद्देश्य था, क्योंकि ज्यादातर अधिग्रहणों में शासन की ओर से मनमानी देखने को मिलती थी। हर परियोजना के लिए जरूरत से ज्यादा जमीन का अधिग्रहण कर लिया जाता था।

एसआईए के बिना मनमानी की आशंका फिर से एक वास्तविकता बन गई है। इसके साथ ही बदला हुआ कानून पुनर्वास और पुनर्स्थापना के प्रावधानों पर जोर नहीं देता। भूमि अधिग्रहण कानून बनने से पहले ही सुप्रीम कोर्ट ने पुनर्वास और पुनर्स्थापना को अनिवार्य कर दिया था। दरअसल इस संदर्भ में एक राष्ट्रीय नीति अस्तित्व में जरूर थी, लेकिन इसका उल्लंघन कभी रुक नहीं सका। एक अन्य भय यह भी है कि यह अध्यादेश कृषि अथवा बहुफसली भूमि के अधिग्रहण की सीमाएं निर्धारित करने की व्यवस्था को भी निष्प्रभावी कर देगा, जबकि यह व्यवस्था खाद्य सुरक्षा को ध्यान में रखकर की गई थी। अब जो संशोधन किए जा रहे हैं, उनके तहत बेखटके अधिग्रहण किए जा सकेंगे। नए संशोधन ग्रामसभा को भी शक्तिहीन बनाने का काम करेंगे।

विकास के नाम पर सरकार ने भूमि न्याय की ओर भारत के बढ़ते कदमों को पीछे खींचने का काम किया है। 1894 का कानून जबरन जमीन अधिग्रहण, जरूरत से ज्यादा अधिग्रहण और अधिग्रहीत जमीन के दूसरे इस्तेमाल अथवा इस्तेमाल न किए जाने के दरवाजे खोलता था, जिन्हें सितंबर 2013 में बंद कर दिया गया था। अब इन दरवाजों को फिर से खोल दिया गया है। यह हमारे किसानों, भूमिहीन लोगों और दलितों व आदिवासियों के लिए अशुभ संकेत है।