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पूर्ण साक्षरता का सपना -- रिजवान निजामुद्दीन अंसारी

कई देशों ने बीसवीं सदी में ही संपूर्ण साक्षरता के लक्ष्य को पा लिया और अपने समाज में शिक्षा के औसत स्तर को भी ऊपर उठाया। लेकिन भारत अब भी पूर्ण साक्षर नहीं हो सका है। एक तरफ हम ज्ञान आधारित समाज और डिजिटल इंडिया की बात करते हैं, लेकिन इस कड़वी सच्चाई को नजरअंदाज कर जाते हैं कि साक्षरता और शिक्षा के लिहाज से हमारे समाज की तस्वीर कैसी है।


हम अक्सर ही देखते हैं कि जब कोई समस्या देश और समाज के लिए नासूर बन जाती है तो हमारी सरकारें उसे जड़ से खत्म करने के लिए व्यापक स्तर पर एक मुहिम छेड़ती हैं ताकि हमें उससे पूरी तरह निजात मिल सके। उदाहरण के तौर पर पोलियो की समस्या को जड़ से खत्म करने के लिए जब अखिल भारतीय मुहिम छेड़ी गई। फलस्वरूप आज भारत पोलियो-मुक्त हो चुका है। हाल ही में मोदी सरकार ने काले धन को जड़ से खत्म करने के लिए नोटबंदी कराई और देश में नकदी विहीन लेन-देन का अभियान चलाया। इसी प्रकार देश को साफ-सुथरा बनाने केलिए ‘स्वच्छ भारत अभियान' शुरू किया गया और पूरे देश में इसके लिए जागरूकता कार्यक्रम चलाया गया। हालांकि इन दोनों ही योजनाओं में सरकार अभी पूरी तरह सफल नहीं हो पाई है। लेकिन महत्त्वपूर्ण यह है कि एक मुहिम शुरू तो की गई। ऐसे और भी कई मसले हैं जो देश में व्यापक जन-जागरूकता के अभियान की मांग करते हैं जिसमें सरकार तो शामिल हो ही, समाज की भी उत्साहपूर्ण भागीदारी हो।


शिक्षा ऐसी ही चीज है। यह मानव विकास के लिए काफी अहम पैमाना है। शिक्षा लोगों के रहन-सहन को ही शिष्ट नहीं बनाती, उन्हें सोचने-समझने में भी अधिक समर्थ बनाती है औरउन्नति तथा समृद्धि की ओर भी ले जाती है। शिक्षा की इस भूमिका को समझते हुए कई देशों ने बीसवीं सदी में ही पूर्ण साक्षरता के लक्ष्य को पा लिया और अपने समाज में शिक्षा के औसत स्तर को भी ऊपर उठाया। लेकिन भारत अब भी पूर्ण साक्षर नहीं हो सका है। क्या ‘सौ फीसद साक्षर भारत' की मुहिम छेड़ी गई? प्रत्येक दस वर्ष पर साक्षरता दर में कुछ फीसद के इजाफे से हम खुश हो जाते हैं। देश की तीन चौथाई आबादी साक्षर है, यह जान कर भी बेहद खुशी होती है। लेकिन एक चौथाई आबादी अब भी निरक्षर है, तालीम की रोशनी के बिना ही गुजर-बसर करने को बेबस है। इनके लिए क्या हमने कोई आंदोलन चलाया? कोई व्यापक लड़ाई लड़ी? एक तरफ हम ज्ञान आधारित समाज की बात करते हैं, डिजिटल इंडिया की बात करते हैं, लेकिन इस कड़वी सच्चाई को नजरअंदाज कर जाते हैं कि साक्षरता और शिक्षा के लिहाज से हमारे समाज की तस्वीर कैसी है। कहने का तात्पर्य है कि जब बदलते भारत में भी एक बहुत बड़ी आबादी शिक्षा जैसे मूलभूत अधिकार से वंचित हो तो यकीनन देश के विकास के हिस्सेदार ये बदनसीब लोग नहीं हो सकते।


देश की यही स्थिति भारत और इंडिया में फर्क करने की जरूरत भी महसूस करवाती है। हमें यह समझना होगा कि जिस विकास का ढोल हमारी सरकारें पीटती आ रही हैं वह तथाकथित विकास शिक्षा के अभाव में अधूरा है। संयुक्त राष्ट्र कहता है कि मानव विकास के जो भी पैमाने हैं उनमें शिक्षा काफी अहम है। हालिया मानव विकास सूचकांक में भारत को पिछड़ा हुआ बताया गया है और 131वें पायदान पर रखा गया है जो साफ तौर से इशारा करता है कि शिक्षा के मामले में भी हम दुनिया के 130 देशों से पीछे हैं। यहां तक कि मालदीव और श्रीलंका जैसे देश हमसे बेहतर स्थिति में हैं। यदि सौ फीसद साक्षरता की बात करें तो कई ऐसे देश हैं जो इस क्लब में शामिल हो चुके हैं। फिनलैंड, नार्वे, अजरबैजान, रूस कुछ ऐसे ही उदाहरण हैं। लिहाजा, यह सवाल मुमकिन है कि हम अमेरिका जैसी महाशक्ति बनने की बात तो करते हैं लेकिन क्या ये लक्ष्य निरक्षरों की इतनी बड़ी जमात के साथ हासिल करेंगे? हालत यह है कि हम अजरबैजान जैसे देश की बराबरी नहीं कर पा रहे हैं, फिर अमेरिका की बराबरी कैसे करेंगे!


पूर्ण साक्षरता वाले देशों में फिनलैंड की बात करें तो वहां की असाधारण शिक्षा-प्रणाली भारत से बिल्कुल अलग है। मसलन, बच्चे ज्यादा दिन तक बच्चे रहते हैं यानी सात वर्ष की उम्र में स्कूल में दाखिला लेते हैं जबकि भारत में तीन वर्ष की उम्र में ही दाखिले की होड़ लगी रहती है। फिनलैंड में निजी कॉलेज नहीं होते जबकि हमारे यहां निजी कॉलेज और अब निजी विश्वविद्यालय भी कुकुरमुत्तों की तरह फैलते जा रहे हैं। इसकारण शिक्षा-सुविधा गरीबों के बूते से बाहर होती जा रही है। आए दिन इन निजी संस्थानों की मनमानी की खबरें मिलती रहती हैं। इनकी बेहिसाब फीस पूर्ण साक्षर भारत और ज्ञान आधारित समाज की राह में सबसे बड़ी बाधा है। इससे इतर, फिनलैंड के बच्चों पर होमवर्क का बोझ भी नहीं डाला जाता। एक अध्ययन के मुताबिक वहां के किशोर एक हफ्ते में औसतन 2.8 घंटे ही होमवर्क करते हैं, लेकिन हमारे स्कूलों में पुस्तक और होमवर्क का बोझ बढ़ती कक्षा के साथ बढ़ता रहता है। बीच में ही पढ़ाई-लिखाई छोड़ने की यह भी एक वजह है। इस समस्या को लेकर अभिभावक भी खासे चिंतित रहते हैं लेकिन हालत यह है कि इनकी सुनने वाला कोई नहीं है।
इसके अलावा हमारे यहां अंक प्रणाली भी एक बड़ी समस्या है। फिनलैंड जैसे देश में बच्चों के प्रदर्शन पर केवल फीडबैक दिया जाता है जिससे बच्चों में तनाव जैसी समस्या नहीं पनपती। लेकिन यहां की अंक प्रणाली या ग्रेड सिस्टम के कारण जो तनाव पैदा होता है उसकी परिणति हमें आत्महत्या में देखने को मिलती है। आए दिन खराब परीक्षा परिणाम के कारण विद्यार्थियों की आत्महत्या के समाचार मिलते रहते हैं।


साक्षरता के मापदंड पर भी विचार करने की जरूरत है। भारत सरकार की मानें तो केवल पढ़ने और लिखने वाले को साक्षरता के दायरे में लिया जा सकता है। लिहाजा, इसके लिए कोई स्पष्ट पैमाना नहीं है। हमारे नीति नियंताओं को समझना होगा कि केवल पढ़ना और लिखना आ जाने से जीवन-स्तर बेहतर नहीं हो सकता। बेहतरीन तौर-तरीके इंसान तभी सीखता है जब वह पढ़ाई का अच्छा-खासा सफर तय करता है, क्योंकि पढ़ लेने और हस्ताक्षर कर लेने भर की सलाहियत लोग अधेड़ उम्र में भी सीख लेते हैं, लेकिन उससे उनकी जिंदगी में साक्षर नागरिक वाली महक नहीं आ पाती। फिर ऐसी साक्षरता भला किस काम की? लिहाजा, सरकार को आठवीं या दसवीं तक का एक पैमाना तय करना चाहिए, जिसे प्राप्त करने वालों को ही साक्षर समझा जाएगा। इससे लोगों में कम से कम उतनी शिक्षा प्राप्त करने की एक मानसिकता पैदा हो सकेगी।


बहरहाल, पूर्ण साक्षरता के लक्ष्य को हासिल करने के लिए शिक्षा को आमजन तक पहुंचाने के प्रयास को युद्ध-स्तर पर कार्यान्वित करने की आवश्यकता है। केवल नारों के बजाय जमीनी हकीकत को समझ कर, हल ढूंढ़ना होगा। यूनेस्को की मानें तो 2014 में जहां फिनलैंड अपने जीडीपी का 7.2 फीसद शिक्षा पर खर्च करता था, वहीं भारत अपने जीडीपी का महज 3.8 फीसद शिक्षा पर खर्च कर पाया। लिहाजा, भारत सरकार को और इच्छाशक्ति दिखाने की जरूरत है। यों तो हम अपने को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कह कर प्रकारांतर से अपने जनसंख्या-बल का गुमान करते हैं, लेकिन क्या हमने कभी सोचा है कि लोकतंत्र की कामयाबी के लिए शिक्षा कितनी जरूरी है। असमानता की खाई को पाटने और संविधान के अनुच्छेद 21-अ के तहत प्रारंभिक शिक्षा की पहुंच को सब तक मुमकिन बनाने के लिए इलाहाबाद उच्च न्यायालय के उस आदेश को भी धरातल पर उतारने की जरूरत है जिसमें अधिकारियों के बच्चों को भी सरकारी विद्यालयों में पढ़ाने की बात कही गई थी।