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प्रत्याशियों को चुनाव में अनुदान का विकल्प- भरत झुनझुनवाला

एनडीए की भारी जीत ने हमारी चुनावी व्यवस्था में पार्टियों के वर्चस्व को एक बार फिर स्थापित किया है। विशेष यह कि चुनाव में जनता के मुद्दे पीछे और व्यक्तिगत मुद्दे आगे थे। यह लोकतंत्र के लिए शुभ सन्देश नहीं है। स्वतंत्रता हासिल करने के बाद गांधीजी ने सुझाव दिया था कि कांग्रेस पार्टी को समाप्त कर दिया जाए और जनता द्वारा बिना किसी पार्टी के नाम के सीधे अपने प्रतिनिधियों को संसद में भेजा जाए। इसके विपरीत हम देख रहे हैं कि सम्पूर्ण चुनावी व्यवस्था पार्टियों के इर्दगिर्द सिमट गयी है।

पूर्व में एक-दो स्वतंत्र प्रत्याशी चयनित हो जाते थे। अब वह भी समाप्तप्राय ही हो गया है। स्वतंत्र प्रत्याशी के नाम पर पार्टी के बागी व्यक्ति ही चुनाव लड़ रहे हैं। जनता की आवाज़ आज संसद में नहीं पहुंच रही है। किसी भी विषय पर सकारात्मक चर्चा नहीं हो रही है। हर चर्चा का उद्देश्य अपनी पार्टी को बढ़ाना रह गया है। पार्टियों द्वारा जनता के हितों को बढ़ाने के स्थान पर अपने अथवा धनियों के हितों को बढ़ाया जा रहा है। यह समस्या केवल अपने देश में नहीं बल्कि तमाम लोकतांत्रिक देशों में देखी गयी है। इससे निजात पाने के लिए कई प्रयोग भी किये गए हैं।

ऑस्ट्रेलिया में हर प्रत्याशी को कुछ रकम सरकार द्वारा मिले वोटों के अनुपात में दी जाती है। शर्त यह होती है कि उन्हें कम से कम चार प्रतिशत वोट हासिल करने चाहिए। यह शर्त इसलिए लगायी गयी है कि फर्जी प्रत्याशी केवल सरकारी अनुदान प्राप्त करने के लिए पर्चे न भरें। इसी प्रकार अमेरिका में कई राज्यों में प्रत्याशियों को आर्थिक अनुदान देने की व्यवस्था है। जैसे अरिजोना में किसी भी प्रत्याशी को चुनाव लड़ने के लिए कम से कम 100 व्यक्तियों से 5-5 डॉलर प्रति व्यक्ति यानी कुल कम से कम 1000 डॉलर एकत्रित करने के प्रमाण देने पड़ते हैं। ऐसा करने के बाद उसे 25,000 डॉलर का सरकारी अनुदान मिलता है। इस व्यवस्था का भी यही उद्देश्य है कि न्यूनतम जन समर्थन हासिल होने के बाद ही सरकारी अनुदान दिया जाए।

इन सरकारी अनुदानों के सकारात्मक प्रभाव सामने आये हैं। यूनिवर्सिटी ऑफ़ विस्कानसिन द्वारा किये गए एक शोध में पाया गया कि सरकारी अनुदान से प्रत्याशियों की संख्या में वृद्धि हुई है। साथ-साथ निवर्तमान प्रत्याशियों का निर्विरोध चयन होने की एवं पुनः जीतने की सम्भावना में गिरावट आई है। यानी सरकारी अनुदान देने से नए लोगों का चुनावी दंगल में प्रवेश बढ़ जाता है। चुनावी प्रतिस्पर्धा बढ़ती है। प्रतिस्पर्धा बढ़ने से उत्तम व्यक्ति के चुने जाने की संभावना बढ़ती है। इसी प्रकार ड्यूक यूनिवर्सिटी द्वारा किये गए एक अध्ययन में पाया गया कि सरकारी अनुदान से विधायिका में जनता के मुद्दों को ज्यादा उठाया जाता है। यह भी कहा है कि तमाम लोग जो सामान्य रूप से चुनाव लड़ने में हिचकिचाते हैं, वे चुनावी अनुदान मिलने पर चुनाव लड़ने को तैयार हो जाते हैं। नये लोगों का चुनावी दंगल में प्रवेश होता है।

यह शोध हमारे लिए अति महत्वपूर्ण है। चूंकि हाल के चुनाव में सभी पार्टियों ने प्रतिद्वंद्वी के व्यक्तिगत चरित्र पर ज्यादा बहस की है और जनता के मुद्दों पर कम। हमारा लोकतंत्र अब जनता का प्रतिनिधित्व नहीं करता है। यह पार्टी के नेताओं की कुश्ती मात्र बन कर रह गया है।

अपने देश में भी सरकारी अनुदान देने पर चिंतन हुआ है। इन्द्रजीत गुप्ता कमेटी ने 1988 में सुझाव दिया था कि क्षेत्रीय और राष्ट्रीय पार्टियों को चुनाव के लिए सरकारी अनुदान दिया जाए। यद्यपि उन्होंने स्वतंत्र प्रत्याशियों को यह अनुदान देने की संस्तुति नहीं की थी। वर्ष 1999 में लॉ कमीशन ने सुझाव दिया था कि चुनाव के लिए सरकारी धन उपलब्ध होना चाहिए लेकिन साथ में कहा था कि प्रत्याशियों को किसी दूसरे स्रोत से धन लेने पर प्रतिबन्ध होना चाहिए। यानी चुनाव लड़ने में केवल सीमित मात्रा में उपलब्ध सरकारी धन का उपयोग होना चाहिए।

2008 में द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग ने सुझाव दिया था कि प्रत्याशियों को आंशिक अनुदान दिया जाए। इसी क्रम में नवम्बर 2016 में नोटबंदी के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था कि चुनाव लड़ने के लिए सरकारी अनुदान की व्यवस्था पर चर्चा होनी चाहिए। यह चिंतन बताता है कि अपने देश में भी चुनाव में धनबल के उपयोग और उसे रोकने के लिए सरकारी अनुदान देने पर चिंतन हुआ है। यद्यपि देश में चर्चा पार्टियों तक सीमित रही है।

दूसरे देशों के ऊपर बताये गए अनुभवों और अपने देश में ही इस विषय पर हुई चर्चा के आधार पर सुझाव है कि चुनाव में प्रत्याशियों को सरकारी अनुदान मिलना चाहिए। इस अनुदान का दुरुपयोग न हो, उसके लिए कुछ शर्तें लगायी जा सकती हैं, जैसा कि ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका में किया गया है। ऐसा करने से स्वतंत्र लोगों को चुनाव लड़ने की ताकत मिलेगी और देश में जनता की आवाज़ विधानसभा और संसद में पहुंचेगी। विधायिका में जनता के मुद्दों पर वास्तविक खुली चर्चा होने की संभावना बढ़ेगी।

इस सुझाव के विरोध में तर्क दिया जा सकता है कि सभी प्रत्याशियों को वोट के अनुपात में अनुदान देने से वर्तमान में पार्टियों के धनाढ्य प्रत्याशियों को भी यह धन मिलेगा और इससे प्रत्याशियों के बीच असमानता बढ़ेगी, न कि घटेगी। कहा जा सकता है कि धनाढ्य प्रत्याशियों को भी रकम देने से इस व्यवस्था का औचित्य ही समाप्त हो जाता है। यह बात सही नहीं है। मान लीजिये वर्तमान में कोई धनाढ्य प्रत्याशी एक करोड़ रुपये खर्च करता है, उसे 10 लाख वोट मिलते हैं और इसके अनुसार उसे 10 लाख रुपये का अनुदान मिलता है। यह सरकारी अनुदान उसके कुल खर्च का 10 प्रतिशत बैठेगा। इससे उसके कुल खर्च में विशेष अंतर नहीं पड़ेगा।


इसके सामने कोई स्वतंत्र प्रत्याशी वर्तमान में एक लाख रुपये का खर्च करता है और उसे 10 लाख वोट मिलते हैं और इसके अनुसार उसे भी 10 लाख रुपये का अनुदान मिलता है। सरकारी अनुदान उसके कुल खर्च का दस गुणा बैठेगा। इससे उसके कुल खर्च में भारी अंतर पड़ेगा। स्वतंत्र प्रत्याशी को उसकी आर्थिक शक्ति की तुलना में 10 गुना रकम मिलेगी जबकि धनाढ्य प्रत्याशी को उसकी आर्थिक शक्ति की तुलना में केवल 10 प्रतिशत रकम मिलेगी। अतः स्वतंत्र प्रत्याशियों को इस रकम से बड़ा सहारा मिलेगा और उनकी चुनाव लड़ने की क्षमता में विस्तार होगा।

हाल में हुए चुनाव हमारे लोकतंत्र की गिरती स्थिति को दर्शाते हैं। चुनाव में अधिकतर मुद्दे व्यक्तिगत रहे और जनता के विषयों को उठाने का अवसर ही नहीं मिला। अतः अपने लोकतंत्र को बचाने के लिए जरूरी है कि अगले चुनाव के पहले हम प्रत्याशियों को सरकारी अनुदान देने की व्यवस्था को लागू करें, जैसा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा था।

लेखक आर्थिक मामलों के जानकार हैं।