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प्रदूषण के बड़े कारक-- देवेन्द्र जोशी

प्रदूषण आज किसी एक देश की नहीं बल्कि विश्वव्यापी समस्या है। दुनिया के बीस सबसे प्रदूषित शहरों में तेरह भारत में हैं। भारत में सबसे ज्यादा वायु प्रदूषण राजधानी दिल्ली में है। दिल्ली में सांस के रोगियों और इससे मरने के मामले सर्वाधिक हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने दिल्ली के बढ़ते प्रदूषण के कारणों में एक दिवाली पर पटाखों की बिक्री पर रोक भी लगाई थी। इसका असर पड़ा तो लेकिन थोड़ा। ‘लैसंट' जर्नल पत्रिका ने अपने एक अध्ययन के बाद जारी रिपोर्ट में बताया कि प्रदूषण से होने वाली मौतों में भारत सबसे ऊपर है। रिपोर्ट के मुताबिक भारत में 2015 में वायु, जल, ध्वनि और दूसरी तरह के प्रदूषण की वजह से सबसे ज्यादा मौतें हुर्इं। प्रदूषण के कारण 2015 में देश में पच्चीस लाख लोगों की जानें गर्इं। इन मौतों की वजह दिल की बीमारी, स्ट्रोक, फेफडेÞ का कैंसर और दमा जैसी बीमारियां रही हैं। प्रदूषण की वजह से दुनिया भर में प्रति वर्ष करीब नब्बे लाख लोगों की मौत होती है, जो कुल मौतों का छठवां हिस्सा है।


भारत में प्रदूषण के कारण हर दिन करीब 150 लोगों की मृत्यु हो जाती है और हजारों लोग फेफड़े और हृदय की बीमारियों के शिकार हो जाते हैं। इसे विडंबना ही कहा जाना चाहिए कि इतनी भयावह स्थिति के बावजूद दुनिया भर में प्रदूषण की बड़ी वजहों को नजरअंदाज कर छोटी-मोटी बातों पर हल्ला मचाया जाता है। दुनिया के लगभग सभी देशों में यह मनोवृत्ति-सी बन गई है कि छोटे-मोटे कारकों पर इतना शोर मचाया जाता है कि असली और बड़े कारकों तक ध्यान ही नहीं पहुंच पाता है। प्रदूषण के तीन प्रमुख स्रोत हैं- परिवहन, निर्माण और र्इंधन। सड़कों पर दौड़ने वाली गाड़ियों से निकलने वाला धुआं पेड़-पौधों की कार्बनडॉइआक्साइड सोखने की क्षमता और आॅक्सीजन उत्सर्जन क्षमता पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है। वाहनों की धूल भी हमारी सांसों के लिए बहुत घातक होती है। इसके समाधान में सार्वजनिक यातायात की बात सब करते हैं लेकिन उस पर अमल कितने लोग करते हैं! वाहनों से निकलने वाला धुआं एक ऐसा धीमा जहर है जो पल प्रति पल हमारी जिंदगी में जहर घोल रहा है। लेकिन वाहनों की बिक्री पर रोक लगाने की बात कोई नहीं करता। बड़ी मछली हमेशा से छोटी मछली को निगलती आई है। सारी बड़ी कंपनियां निर्माण क्षेत्र के अंतर्गत आती हैं, जिन्हें विकास का प्रतीक मान कर उन पर प्रदूषण विरोधी कार्रवाई की कभी हिम्मत ही नहीं जुटाई जाती। निर्माण कार्य से जुड़ी हर कवायद माल ढुलाई, खनन या औद्योगिक उत्पादन आखिरकार धूल कणों के उत्पादन की ही वजह बनता है लेकिन बड़ी मछली होने की वजह से उन पर कोई हाथ नहीं डालता।

प्रदूषण की तीसरी बड़ी वजह र्इंधन यानी ऊर्जा के लिए तेल, कोयला, लकड़ी आदि जलाना है। लेकिन जब भी प्रदूषणरोधी कार्रवाई का मौका आता है, कटे पेड़ों की खूंटी और कटी हुई फसल के जलते खेत ही दिखाई देते हैं। प्रदूषण के बड़े स्रोत औद्योगिक इकाइयों और ताप विद्युत संयंत्र आदि को अपने हाल पर छोड़ कर एक तरह से इन्हें प्रदूषण फैलाने का अघोषित लाइसेंस प्रदान कर दिया जाता है। छोटों को डांटने और बड़ों को पुचकारने की इस भेदभाव पूर्ण नीति के चलते प्रदूषण पर रोक लगे तो आखिर कैसे?


प्रदूषण कोई लाइलाज बीमारी नहीं है। इसे समूल खत्म भले ही नहीं किया जा सके लेकिन पर्याप्त राजनीतिक इच्छाशक्ति, अपेक्षित जागरूकता और कुछ बंधनकारी उपायों के जरिए इसे कम अवश्य किया जा सकता है। यूरोप के कई शहरों में वाहनों पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। न्यूयार्क की मुख्य सड़कों पर गाड़ियों का चलना बंद कर दिया गया है। इन उपायों से प्रेरणा लेकर क्या हम अपनी जरूरत के मुताबिक कोई कारगर कदम नहीं उठा सकते! पर्यावरण संबंधी एक रिपोर्ट के मुताबिक अगर सरकार बाह्य प्रदूषण रोकने में विफल रही तो 2040 तक प्रदूषित वायु के कारण प्रतिदिन औसतन ढाई सौ लोगों की मौत हो सकती है। प्रदूषण के मामले में राजधानी दिल्ली ने बीजिंग को भी पीछे छोड़ दिया है।


दिल्ली की हवा में सांस लेना एक दिन में आठ सिगरेट पीने के बराबर है। राजनीतिक इच्छाशक्ति इस मामले में कितनी कम है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वायु प्रदूषण अकाल मौतों का पांचवां बड़ा कारक होने के बावजूद आज तक किसी राजनीतिक पार्टी ने पर्यावरण प्रदूषण को अपने चुनाव घोषणा पत्र में मुद्दा नहीं बनाया। भाषण तो खूब दिए जाते हैं लेकिन जब कार्रवाई की बात आती है तो सरकारें मौन ही नजर आती है। जब अदालतों का डंडा चलता है तभी सरकारों की नींद खुलती है। कब तक हम रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़े विषयों में अदालतों पर निर्भर रहेंगे। जब सब काम अदालतों को ही करना है तो फिर एक चुनी हुई सरकार का औचित्य ही क्या रह जाएगा!


विश्व भर में वायु प्रदूषण से तीस लाख मौतें प्रति वर्ष होती हैं। इनमें भारत में सबसे ज्यादा दिल्ली विश्व के दस सबसे प्रदूषित शहरों में से एक है। एक अन्य अध्ययन के मुताबिक देश का सकल घरेलू उत्पाद पिछले दो दशकों में 2.5 प्रतिशत बढ़ा है, जबकि वाहनों से होने वाला प्रदूषण आठ गुना तथा उद्योगों से बढ़ने वाला प्रदूषण चार गुना हो गया है। दुनिया भर में प्रदूषण से मरने वाले सबसे ज्यादा लोग भारत और चीन में पाए गए हैं। ग्लोबल एअर रिपोर्ट के अनुसार प्रदूषण से मरने वालों में भारत सबसे आगे है। वायु प्रदूषण से अस्थमा, कैंसर जैसी जानलेवा बीमारियां होने का खतरा रहता है। वहीं सलफेट नाइट्रेट और ब्लैक कार्बन फेफड़ों के लिए जानलेवा हो सकता है। वायु प्रदूषण का सबसे ज्यादा असर बच्चों के अविकसित फेफड़ों पर पड़ता है। इससे बच्चों को निमोनिया और सांस से जुड़ी बीमारियां भी हो जाती हैं।


यूनिसेफ की एक रिपोर्ट के मुताबिक बच्चों की मृत्यु-दर की एक बड़ी वजह प्रदूषण है। दुनिया भर के सात बच्चों में से एक दूषित हवा में सांस लेने से मरता है। हर साल पांच साल से कम उम्र के छह लाख बच्चों की मौत वायु प्रदूषण से होती है। वायु प्रदूषण के कारण दिल्ली में दस में से चार बच्चे फेफडेÞ से जुड़ी बीमारी के शिकार हैं। ओजोन प्रदूषण से होने वाली मौतों में भारत सबसे ऊपर है। पर्यावरण इंडेक्स में भारत 178 देशों में 155 वें स्थान पर है। प्रदूषण के मामले में ब्रिक्स देशों में भारत सबसे आगे है। भारत की तुलना में पाकिस्तान, नेपाल, चीन, श्रीलंका बेहतर स्थिति में हैं। जीडीबी ग्लोबल बर्डन आॅफ डिजीज के अनुसार 2015 में प्रदूषण से होने वाली मौतें धूम्रपान से होने वाली मौतों की डेढ़ गुना, एड्स, टीबी और मलेरिया से होने वाली मौतों की तीन गुना, सड़क दुर्घटना में होने वाली मौतों की छह गुना ज्यादा है।


भारत में आंतरिक प्रदूषण से हर साल तेरह लाख मौतें होती हैं। पर्टिकुलेट मैटर, जो इंसान के बाल से भी तीस गुना ज्यादा पतला होता है, के कारण अस्थमा का खतरा बढ़ता है और हृदय की दशा खराब होती है। इससे अक्सर नाक बहने, छींक आने और जुकाम होने की जोखिम बढ़ जाती है। एंटी पाल्यूशन एअर मास्क इन छोटे कणों से हमारा बचाव करने में मददगार हो सकता है। वृक्षों की अंधाधुंध कटाई ने भी पर्यावरण को अत्यधिक क्षति पहुंचाई है। विश्व में हर साल एक करोड़ हेक्टेयर से अधिक वन काटे जाते हैं। भारत में दस लाख हेक्टेयर वन प्रतिवर्ष काटे जा रहे हैं। वन क्षेत्रफल कम होने से रेगिस्तान के विस्तार को बढ़ावा मिल रहा है। अगर प्रदूषण पर समय रहते लगाम नहीं लगी तो आने वाले समय में न सिर्फ जीना दूभर हो जाएगा, बल्कि विकास और समृद्धि की महत्त्वाकांक्षाएं भी पूरी नहीं होंगी।