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प्रसंगवश : संभावनाओं से भरे खेतों को बाजार से जोड़ना जरूरी

मौसम रूठा, बादलों से ओले बरसे और देखते ही देखते मध्यप्रदेश के एक हिस्से की फसलें जमीन पर जा गिरीं! यहां सरकार की मजबूरी समझी जा सकती है, लेकिन उसी दौरान दूसरे इलाके के खेतों में बंपर पैदावार की वजह से भाव नहीं मिले और किसान सड़कों पर टमाटर फेंकते, खेतों से पौधे उखाड़ते नजर आए! यह हर हाल में अस्वीकार होना चाहिए, किसान को भी और सरकार को भी! यदि कृषि कर्मण अवार्ड लेकर मध्यप्रदेश हर वर्ष अपनी प्रशंसा की नई परिभाषा लिख रहा है तो खेत के सोने को यूं मिट्टी होते देखना भी इस दौर में दर्ज किया जाना चाहिए।


क्योंकि, इन्हीं घटनाओं से समझा-समझाया जा सकता है कि अब हमें एक स्पष्ट और योजनाबद्ध कृषि नीति की आवश्यकता है। पिछले साल मध्यप्रदेश सहित देश के कई राज्यों में प्याज को लेकर बने ऐसे ही हालात के बाद राष्ट्रीय बागवानी अनुसंधान एवं विकास प्रतिष्ठान ने अपनी तरफ से एक पहल की है। कार्यकारी निदेशक डॉ. पीके गुप्ता बताते हैं- नाफेड के जरिए उज्जैन और सीहोर में प्याज के लिए 10-10 हजार मीट्रिक टन के दो कोल्ड स्टोरेज बनाए जा रहे हैं। इसमें जमा प्याज अप्रैल से अक्टूबर के बीच तब बाजार में लाया जाएगा, जब सभी स्थानों से प्याज की आपूर्ति बंद रहती है और इसी दौरान मांग भी सबसे ज्यादा रहती है।


हम देखना चाहते हैं कि उस समय किसानों को कितना मुनाफा होता है। जो किसान अपना प्याज इसमें रखेंगे, उनके लागत मूल्य का बीमा भी होगा। संभवत: अप्रैल में शुरू हो रहा यह पायलट प्रोजेक्ट यदि सफल रहा तो अन्य फल-सब्जियों के लिए भी इस तरह के कोल्ड स्टोरेज तैयार किए जाएंगे। डॉ. गुप्ता का यह भी मानना है- मप्र सरकार को प्राथमिकता से भंडारण व्यवस्था विकसित करने के लिए क्षेत्रवार सर्वे करना चाहिए।


हर फसल की पैदावार के साथ स्थानीय-राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय बाजार में मांग का तुलनात्मक अध्ययन भी करवाना चाहिए। ताकि, संबंधित इलाके में आधुनिक स्टोरेज और फूड प्रोसेसिंग को विकसित किया जा सके। उधर, मध्यप्रदेश की तुलना में कर्नाटक, महाराष्ट्र और गुजरात जैसे राज्यों ने इस तरह की प्रक्रियाओं में काफी रुचि ली है। गुजरात की गंभीरता को इस तथ्य से भी समझा जा सकता है कि फूड प्रोसेसिंग यूनिट लगाने में भावनगर देशभर में पहले स्थान पर आ गया है! गुजरात सरकार ने अवसर का लाभ उठाने के लिए कई और प्रयास भी शुरू कर दिए हैं।


जैसे, राज्य सरकार ने वाइब्रेंट गुजरात (वर्ष 2017) में फूड प्रोसेसिंग यूनिट को बढ़ावा देने के लिए पांच साल तक टैक्स में 100 फीसदी छूट देने की बात कही, सर्विस टैक्स और कस्टम ड्यूटी में भी छूट का प्रावधान कर दिया, 100 प्रतिशत एफडीआई के साथ 95 फीसदी ऋण की सुविधा भी गुजरात सरकार दे रही है। बाजार पर कब्जा जमाने के लिए तीन क्लस्टर में मेगा फूड पार्क, कोल्ड चेन लॉजिस्टिक, फूड प्रोसेसिंग मशीनरी यूनिट्स को भी प्रमोट किया जा रहा है। यह सरकार की नीतियों का ही परिणाम है कि गुजरात में अभी 10 लाख लोगों को रोजगार देने वाली 30 हजार से ज्यादा फूड प्रोसेसिंग यूनिट काम कर रही हैं।


किसानों की मेहनत बचाने मुनाफे को बढ़ाने के लिए 560 कोल्ड स्टोरेज यूनिट पहले से ही हैं। दो मेगा फूड पार्क का निर्माण कार्य भी जारी है। क्या मध्यप्रदेश के पास ऐसा कोई रोडमैप है? हमें विश्व बाजार में भारत का हिस्सा और मध्यप्रदेश की स्थिति को भी गंभीरता से समझना चाहिए। भारत दलहन, दूध, चाय, काजू उत्पादन में विश्व में सबसे आगे है। वहीं गेहूं, चावल, सब्जी, फल, गन्ना, कपास और तिलहन में दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक देश है। इसमें दलहन, तिलहन, कपास, सब्जी, फल में मध्यप्रदेश की भागीदारी देश में पहले से लेकर तीसरे स्थान तक है।


विश्व में आम, पपीता, अमरूद और केले का उत्पादन भारत में सबसे ज्यादा होता है। मप्र को पपीता और केले का गढ़ माना जाता है। विश्व में प्याज, मटर, भिंडी का उत्पादन भारत में सबसे ज्यादा होता है। मप्र आलू, टमाटर और प्याज उत्पादन में देश में दूसरे-तीसरे स्थान पर है। विशेषज्ञ मानते हैं कि 2020 तक भारत में फूड और रिटेल मार्केट 30949 अरब रुपए तक पहुंच जाएगा। फूड प्रोसेसिंग सेक्टर में ही 2019 अरब रुपए के निवेश का अनुमान भी लगाया जा रहा है, यह 90 लाख से ज्यादा लोगों को रोजगार दे सकता है। बहरहाल, इन तमाम कवायदों के बीच मुंबई के भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर में पिछले दो साल से एक शोध चल रहा है। स्वास्थ्य, भोजन और कृषि क्षेत्र के शोध प्रभारी डॉ. सुनील घोष बताते हैं- हम रेडिएशन के जरिए टमाटर की संरक्षण क्षमता बढ़ाने का प्रयास कर रहे हैं। अभी एक साल का परिणाम आना शेष है।


यदि यह सफल रहा तो मप्र सरकार रेडिएशन यूनिट लगाकर भी फसलों को बचा सकती है! हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि मध्यप्रदेश की तीन चौथाई जनसंख्या खेती और उससे जुड़े व्यवसाय के जरिए जीवनयापन करती है। इसलिए, राज्य सरकार को मौसम की मेहरबानी और किसानों की मेहनत से लहलहा उठी पैदावार को मुनाफे में बदलने का तरीका ढूंढना ही चाहिए। तभी संभावना से भरी खेतों की जमीन को बाजार की जरूरत से जोड़ा जा सकेगा!

आशीष व्यास