Deprecated (16384): The ArrayAccess methods will be removed in 4.0.0.Use getParam(), getData() and getQuery() instead. - /home/brlfuser/public_html/src/Controller/ArtileDetailController.php, line: 73
 You can disable deprecation warnings by setting `Error.errorLevel` to `E_ALL & ~E_USER_DEPRECATED` in your config/app.php. [CORE/src/Core/functions.php, line 311]
Deprecated (16384): The ArrayAccess methods will be removed in 4.0.0.Use getParam(), getData() and getQuery() instead. - /home/brlfuser/public_html/src/Controller/ArtileDetailController.php, line: 74
 You can disable deprecation warnings by setting `Error.errorLevel` to `E_ALL & ~E_USER_DEPRECATED` in your config/app.php. [CORE/src/Core/functions.php, line 311]
Warning (512): Unable to emit headers. Headers sent in file=/home/brlfuser/public_html/vendor/cakephp/cakephp/src/Error/Debugger.php line=853 [CORE/src/Http/ResponseEmitter.php, line 48]
Warning (2): Cannot modify header information - headers already sent by (output started at /home/brlfuser/public_html/vendor/cakephp/cakephp/src/Error/Debugger.php:853) [CORE/src/Http/ResponseEmitter.php, line 148]
Warning (2): Cannot modify header information - headers already sent by (output started at /home/brlfuser/public_html/vendor/cakephp/cakephp/src/Error/Debugger.php:853) [CORE/src/Http/ResponseEmitter.php, line 181]
Notice (8): Undefined variable: urlPrefix [APP/Template/Layout/printlayout.ctp, line 8]news-clippings/पढ़ाई-का-परिदृश्य-कालू-राम-शर्मा-12189.html"/> न्यूज क्लिपिंग्स् | पढ़ाई का परिदृश्य-- कालू राम शर्मा | Im4change.org
Resource centre on India's rural distress
 
 

पढ़ाई का परिदृश्य-- कालू राम शर्मा

हम आज भी मैकाले को खलनायक के रूप में याद करते नहीं थकते हैं। अंगेजों के राज में एक खास प्रकार की शिक्षा-व्यवस्था रची गई थी, जो तब अंग्रेजी राज की जरूरतों के मुताबिक थी। आजादी पाने के पहले ही गांधीजी उस शिक्षा-व्यवस्था से न केवल व्यथित थे, बल्कि उनमें एक आक्रोश था और इसका उन्होेंने हल भी खोजा कि शिक्षा ऐसी हो जो देश की सामाजिक स्थिति और यहां के लोगों के माकूल हो, जिसमें पाठ्यपुस्तक और परीक्षा का बोलबाला न हो, बल्कि अपने परिवेश और समाज को चलाने के लिए जो समझ और सूझबूझ चाहिए वह बच्चों में विकसित हो। बच्चों में आत्मविश्वास पैदा हो, जो उन्हें जीवन में समस्याओं के हल खोजने का जज्बा पैदा कर सके। गांधी की बुनियादी शिक्षा इतिहास में दफ्न हो चुकी है। सोचने की बात है कि आजादी के बाद सरकार ने मैकाले की शिक्षा को उखाड़ने के लिए कितने फावड़े चलाए? हमारी शिक्षा नीतियां आजादी पाने के वक्त से ही बनने लगीं, वे आज भी कार्य रूप में परिणित होने की बाट जोह रही हैं। आजादी के बाद जो अभूतपूर्व कार्य हुआ वह यह कि स्कूल बड़ी तादाद में खुले। सर्व शिक्षा अभियान के तहत इसमें और तेजी आई और गांव-गांव, गलियों और मोहल्लों में स्कूल खुल गए। मगर शिक्षा में गुणवत्ता नदारद रही। शिक्षकों को दोयम दर्जे का समझा जाने लगा। शिक्षकों को शैक्षिक रूप से सशक्त बनाने की कवायदें नीतियों से बाहर न छलक सकीं और स्कूलों में शिक्षा का पतन जारी रहा।


इस वक्त हमारे देश की शिक्षा-व्यवस्था एक ऐसे दौर से गुजर रही है, जहां परीक्षा बुरी तरह हावी है। जहां सीखना-सिखाना हाशिए पर जाता प्रतीत होता है। शिक्षा नीतियां मूल्यांकन को कमजोर करने की पेशकश करती रही हैं, मगर हमारे नौकरशाहों को मूल्यांकन ही सबसे ज्यादा भाता है। उन्हें लगता है कि मूल्यांकन के जरिए ही बच्चे सीख पाते हैं और शिक्षक भी तभी पढ़ाते हैं जब परीक्षा का डर हो। बच्चों की बेतहाशा ऊर्जा और वक्त परीक्षा की तैयारी और उसे पास करने में लगाना पड़ता है। और दरअसल, यहीं से शिक्षा के उद्देश्य भटक जाते हैं। आरटीई-2009 एक कानून के रूप में हमारे सामने आया, जो गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और बच्चों को एक कक्षा से दूसरी कक्षा में बिना रोके पहुंचाने की पैरवी करता है। पर विडंबना है कि यह बात हमारे मंत्रियों और अधिकारियों को नहीं सुहाती। वे परीक्षा को ही गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का पर्याय समझ बैठे हैं। पिछली नई शिक्षा नीति जिसे अब तक जारी नहीं किया गया है, जब इसे लेकर जनमत लिया जा रहा था तब परीक्षा की बात ही प्रखर रूप से सामने आ रही थी कि ‘परीक्षा और वह भी बोर्ड की परीक्षा होनी ही चाहिए।'


दरअसल, यह एक मिथ है। ऐसे लोग परीक्षा की मानसिकता से ग्रस्त होकर ही शिक्षा में काम करते हैं। समस्या यह है कि ये लोग समाज की मांग को ध्यान में रखते हुए परीक्षा के चक्रव्यूह से मुक्त नहीं हो पाते। क्या शिक्षा का मकसद छात्र को डिग्री उपलब्ध कराना है? इस सवाल का करारा जवाब जॉन होल्ट अपनी किताब ‘बच्चे क्यों असफल होते हैं?' में देते हैं। अगर परीक्षा की कैद से शिक्षा को मुक्त कर दिया जाए, तो शिक्षा के उद्देश्यों को हासिल करने में एक बड़ा कदम होगा।

स्कूलों में सभी बच्चों को एक ही नजर और मानसिकता से देखा जाता है। स्कूल मानो कोई कारखाना हो, जहां पर कच्चा माल एक तरफ से डाला जाता है और दूसरी तरफ से एक जैसी चीज बन कर निकलती है। इंसानी मस्तिष्क की तासीर के मुताबिक स्कूलों में शिक्षा नहीं दी जा पा रही है। यही वजह है कि स्कूलों में बच्चे सीख नहीं पाते हैं। दूसरे, स्कूल बच्चों में समानता के बीज बोने में कामयाब नहीं हो पा रहे हैं। भारत विविधताओं का देश है, जहां भाषा हो या सोच, हर स्तर पर विविधता देखने को मिलती है। पर विडंबना है कि इन विविधताओें को विषमताओं का रूप दे दिया गया है, जहां भाषा के तौर पर ही समाज में ऊंच-नीच बनी हुई है। अंग्रेजी भाषा का इस्तेमाल करने वालों को हम बेहतर और स्थानीय भाषा इस्तेमाल करने वाले को निकृष्ट मानने लगते हैं। यही नियति व्यापक तौर पर बन चुकी है। जहां जाति और धर्म के नाम पर भारी विषमताएं हैं। जहां अमीरी-गरीबी के पैमाने के आधार पर विषमता व्याप्त है। इन सभी को विविधता के चश्मे से देखे जाने की जरूरत है। और यह चश्मा शिक्षा ही दे सकती है। हमें ऐसी शिक्षा नहीं चाहिए, जिसमें समाज के बने-बनाए ढांचे में बच्चों को फिट कर दिया जाए। बल्कि उसे सोचने-समझने वाला इंसान बनाए, जो आज जहां है उससे आगे बढ़ सके। एक शिक्षक अपनी कक्षा में विषयों का शिक्षण करता है। ये विषय क्यों पढ़ाए जाते हैं, इसकी समझ जरूरी है। इन विषयों को पढ़ाने के पीछे समझ यह है कि हम शिक्षा के व्यापक उद्देश्यों को विषयों के जरिए हासिल करना चाहते हैं। इस लिहाज से हमारे लिए शिक्षा के मकसदों के साथ ही विषयों की तासीर को भी समझना आवश्यक है, जो हमें शिक्षा के उद्देश्यों को पूरा करने में अहम भूमिका निभाते हैं। जैसा समाज चाहिए वैसा स्कूल होना चाहिए। और वे उद्देश्य स्कूल के कारोबार में परिलक्षित होने चाहिए। हम बच्चों को लोकतांत्रिक बनाना चाहते हैं तो हमारे स्कूलों में वे प्रक्रियाएं चलनी चाहिए। यानी इन मूल्यों को पूरा का पूरा स्कूल- प्रधानाध्यापक, शिक्षक और बच्चे सब मिल कर जिएं, तभी ये मूल्य पोषित हो सकते हैं।

शिक्षकों की तैयारी के पूर्व शिक्षक प्रशिक्षकों की तैयारी अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। शिक्षक प्रशिक्षकों और शिक्षकों के बीच बराबरी स्थापित करने के संजीदा प्रयास नहीं होते। जब शिक्षक प्रशिक्षणों में व्यावहारिक ज्ञान भाषणों से पढ़ाया जाता है तो शिक्षक भी अपनी कक्षाओं में वैसा ही करते हैं। प्राथमिक कक्षाओं में बच्चों को पढ़ना-लिखना सिखाना एक महत्त्वपूर्ण कौशल है। मगर प्रशिक्षण संस्थानों में बच्चों को स्वतंत्र ढंग से कैसे पढ़ना-लिखना सिखाया जाए इस पर समझ बनाने और मौके पर कार्य करने के अवसर नहीं मिलते। स्वतंत्र ढंग से पढ़ने-लिखने की प्रक्रियाएं शिक्षकों के साथ भी नहीं हो पातीं कि उनकी भाषाई क्षमता को विस्तार मिले। साथ ही बच्चों के साथ वे कौनसी प्रक्रियाएं की जाएं कि बच्चे एक स्वतंत्र पाठक और लेखक बन सकें, इस पर खुल कर विमर्श के अवसर भी नहीं मिलते। शिक्षा जगत में बच्चों में सृजनशीलता विकसित करने की बातें तो काफी होती हैं मगर शिक्षकों की सृजनशीलता को बढ़ाने के प्रयास न के बराबर होते हैं। इसका नतीजा यह होता है कि शिक्षक भी बच्चों के साथ इस प्रकार के प्रयास नहीं कर पाते। यही वजह है कि जिस भावना से शिक्षक प्रशिक्षक शिक्षकों को प्रशिक्षित करता है उसी भावना के साथ शिक्षक स्कूल में अपने बच्चों के साथ पेश आते हैं। शिक्षा के मान्य उद्देश्यों को स्कूलों में स्थापित करने के लिए शक और दंड की व्यवस्था न बच्चों पर, न ही शिक्षकों पर कारगर होगी। स्कूलों को नौकरशाही मानसिकता से मुक्ति दिलानी होगी। शिक्षकों पर विश्वास करते हुए उनके बीच विमर्श के मंच तैयार करने होंगे, जहां कोरे विषयी ज्ञान की बात न हो, बल्कि उन मूल्यों को स्कूल के बच्चों में विकसित करने का नजरिया गढ़ सकें। साथ ही उनके साथ शिक्षा, समाज, इंसान समेत दुनियावी मसलों पर विमर्श हो, जो उनकी सोच को पैना कर सके और उन्हें वे बच्चों के साथ अमल में ला सकें।