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फसल का नहीं खेती का बीमा हो!-- बिभाष

खेती की जब बात आती है, तो सभी आकाश की ओर ताकते हैं. अगर माॅनसून का समय और उसकी मात्रा उचित या पर्याप्त नहीं है, तो राजनीति की गति और दिशा दोनों बदल जाती है. बजट से लेकर बाजार तक सब आकाश ही निहारते हैं. कृषि में जोखिम प्रबंध बहुत ही कमजोर है. 

हरित क्रांति का चाहे जिस तरह से विश्लेषण या आलोचना करें, लेकिन उसने हमारी कृषि को तात्कालिक आर्थिक और राजनीतिक परिस्थितियों में एक अलग धरातल पर पहुंचाया. उस क्रांति को हमने बहुत दूहा, विश्लेषण किया, लेकिन अगले धरातल के लिए उचित प्रबंध नहीं किये गये. खेती का संकट और बढ़ता ही जा रहा है. इस संकट के कई आयाम हैं, जिसमें फसल और खेती का बीमा महत्वपूर्ण स्थान रखता है. साल दर साल फसल बीमा योजनाएं बन कर लागू होती रहती हैं, लेकिन खेती के संकट को छतरी नहीं मिल पाती है. अब प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना शुरू किया गया है. साथ में मौसम आधारित फसल बीमा योजना (डब्ल्यूबीसीआइएस) भी लागू की जा रही है. 

नयी फसल बीमा योजना, पहले की योजनाओं की तरह, के क्रियान्वयन की जिम्मेवारी सम्मिलित रूप से सरकार और केंद्र सरकार की है, लेकिन लगभग पूरी-की-पूरी परिचालनात्मक जिम्मेवारी राज्य सरकारों की है. राज्यों ने समुचित कदम भी उठाये हैं. लगभग सभी राज्यों ने ग्राम पंचायत या राजस्व गांव को बीमा यूनिट बनाया है. हिमाचल प्रदेश तथा अंडमान-निकोबार में सब डिवीजन अथवा तहसील को बीमा यूनिट बनाया गया है. लेकिन, हिमाचल प्रदेश में सब डिवीजन को बीमा यूनिट बनाने से फसलों के नुकसान का सही आकलन करना त्रुटिपूर्ण हो सकता है. 

फसल बीमा की एक सबसे बड़ी कमी रही है सभी फसलों को छतरी न प्रदान कर पाना. नयी योजना में इस बात का ध्यान राज्य सरकारों ने रखा है कि जिलेवार जरूरतों के हिसाब से फसलों को छतरी में शामिल किया जाये. कुछ राज्यों ने आज की जरूरत को ध्यान में रखते हुए दलहन-तेलहन को समुचित जगह दी है. लेकिन, फसलों के दो वर्ग, साग-सब्जी और फलों की खेती को समुचित जगह नहीं दी गयी है. उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, अंडमान-निकोबार, कर्नाटक आदि राज्यों ने साग-सब्जी की खेती को योजना में जगह दी है, लेकिन अन्य राज्यों ने इन्हें कोई महत्व ही नहीं दिया. 

इसी प्रकार फलों की खेती को सही मायने में मात्र कर्नाटक और मध्य प्रदेश ही ऐसे राज्य दिखाई देते हैं, जिन्होंने बीमा छतरी उपलब्ध कराया है. साग-सब्जी और फल भोजन के महत्वपूर्ण अंग हैं. फूड इन्फ्लेशन पर नियंत्रण, कुपोषण को दूर करने तथा इनके बराबर वितरण के लिए इन्हें बीमा के अंतर्गत लाना ही पड़ेगा. 

फसल बीमा योजना बैंकों से कर्ज लिए हुए किसानों के लिए तो अनिवार्य रही है, लेकिन जिन किसानों ने बैंकों से ऋण नहीं लिया है, उनके लिए इसे ऐच्छिक बनाया गया है. इस व्यवस्था से प्रतीत होता है कि यह फसल बीमा योजना न होकर, किसानों के बैंक ऋण को सुरक्षित करने की योजना है. फसल बीमा का यही दृष्टिकोण इसे सफल बनने से रोकता है. 

योजना को सबके लिए आकर्षक बनाया जाना चाहिए कि किसान खुद-ब-खुद फसल बीमा कराना शुरू करे. आपदा पड़ने पर मिलनेवाली दावाराशि को देख कर इनमें उत्साह पैदा नहीं हो पाता. किसानों को मिलनेवाली दावाराशि के हास्यास्पद होने की खबरें हर साल अखबारों और खबरिया चैनलों में मिल ही जाती हैं. योजना सफल हो, इसके लिए यह बहुत जरूरी है कि नुकसान को देखते हुए दावाराशि सम्मानजनक हो.

ऋण न लेनेवाले किसानों में एक बड़ी संख्या बंटाईदारों और मौखिक पट्टेदारों की होती है. बैंक की सारी व्यवस्था होते हुए भी इन्हें बैंक ऋण मिलना आसान नहीं होता है. फिर भी इनके लिए पचास हजार रुपये तक ऋणराशि के लिए किसी प्रकार के भूमि अभिलेख की जरूरत नहीं होती है, बस इनके खुद की उद्घोषणा के आधार पर ही ऋण दिया जा सकता है. 

लेकिन, ऋण न लेनेवाले ऐसे किसानों को बीमा योजना में लाभ पाने के लिए उनके द्वारा जोती जा रही भूमि संबंधी कतिपय प्रमाण प्रस्तुत करना होगा. बैंकों को ऋण की तरह बीमा व्यवस्था को लचीला बनाना होगा, जिससे ये लोग जोती जा रही भूमि संबंधी अपनी उद्घोषणा के आधार पर ही बीमा का लाभ पा सकें.

प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना में छिटपुट किसानों के स्तर पर भी लोकलाइज्ड नुकसानों की भरपाई की व्यवस्था भी है, जो कि सराहनीय है. जिंसों के दामों में भारी गिरावट एक ऐसी आपदा है, जो लगभग हर साल कहीं-न-कहीं आती है, लेकिन इसे बीमा छतरी में शामिल नहीं किया गया है. ऐसी खबरें लगातार मिलती रहती हैं कि उचित दाम न मिलने पर किसान अपने उत्पादों को ही नष्ट कर देते हैं. यह एक महत्वपूर्ण आपदा है, जो किसानों को वैसे ही बरबाद कर जाती है, जैसे सूखा और बाढ़. जिंसों के दामों में भारी गिरावट को भी प्राकृतिक आपदा मानते हुए फसल बीमा नीति और दिशानिर्देशों में परिवर्तन करना चाहिए.

ग्रामीण ऋण में स्वयं सहायता समूह ऋणों को तो बढ़ावा दिया जाता है, लेकिन फसल बीमा में इन्हें कोई भूमिका नहीं दी गयी है. समूह फसल बीमा का भी प्रावधान होना चाहिए.

हमारी खेती का बीमा कार्यक्रम टुकड़ों में बंटा हुआ है. फसल बीमा के लिए अलग व्यवस्था है, खेती की मशीनों और औजारों के लिए अलग व्यवस्था है, पशुधन के लिए अलग व्यवस्था है और किसान की दुर्घटना से मृत्यु आदि के लिए अलग व्यवस्था है. दरअसल, खेती में जोखिम प्रबंध को मजबूत बनाने के लिए एक एकीकृत बीमा व्यवस्था होनी चाहिए. 

खेती का बीमा भी सरकार की अन्य योजनाओं की तरह बैंकों पर लाद दिया गया है, जिसकी वजह से फोकस नहीं बन पाता. एग्रीकल्चर इन्श्योरेंस कॉरपोरेशन को ब्लॉक स्तर पर अपनी शाखाएं खोलनी चाहिए और उन्हें सिर्फ खेती का बीमा ही नहीं करना चाहिए, बल्कि खेती में जोखिम प्रबंध के लिए किसानों के परामर्शदाता के रूप में भी काम करना चाहिए.