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बांध सुरक्षा और पूर्व चेतावनी प्रणाली की अनदेखी ने बनाया सिक्किम की बाढ़ को घातक

मोंगाबे हिंदी,10 अक्टूबर

साल 2011 में सिक्किम में आए 6.9 तीव्रता के भूकंप की याद में हर साल 18 सितंबर को राज्य में आपदा जोखिम न्यूनीकरण दिवस के रूप में मनाया जाता है। इस साल भी तीस्ता नदी में आने वाली बाढ़ को लेकर तैयारियों पर ध्यान दिया गया। लेकिन कुछ हफ़्तों के बाद ऐसा हुआ जिसका राज्य और बांध अधिकारियों को आपदा के पैमाने का अनुमान नहीं तक था। यह 1968 के बाद से अब तक की सबसे भीषण बाढ़ की घटनाओं में से एक जिसने बाढ़ से निपटने की प्रदेश की तैयारियों को बौना साबित कर दिया।

पिछले हफ्ते 4 अक्टूबर की रात को, उत्तरी सिक्किम में ग्लेशियर के पिघलने से बनी दक्षिण ल्होनक झील फुट गई, जिससे ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (जीएलओएफ) यानी बर्फीली झील के फूटने से आयी बाढ़ की घटना हुई। इस घटना ने राज्य के सबसे बड़े जलविद्युत संयंत्र को नष्ट कर दिया और 9 अक्टूबर तक कम से कम 35 लोगों की मौत हो गई और लगभग 104 लापता हो गए। भारतीय विज्ञान संस्थान, बेंगलुरु में दिवेचा सेंटर फॉर क्लाइमेट चेंज के एक शोधकर्ता आशिम सत्तार ने कहा, “भले ही हमने ऐसा होने की संभावना का अध्ययन किया है, लेकिन जब मैंने पहली बार खबर सुनी तो मैं सदमे से सुन्न हो गया था।” साल 2021 के मॉडलिंग अध्ययन में झील पर जीएलओएफ की घटना का अनुमान लगाया गया है।

तीस्ता नदी पर बांध बनने से प्रभावित वैज्ञानिकों और नागरिकों ने 2005 से ही जीएलओएफ घटना के खतरों के बारे में चेतावनी दी है। राज्य और केंद्र सरकार जोखिमों से अवगत हैं और अतीत में बाढ़ के खतरे को कम करने के लिए टुकड़ों में प्रयास किए हैं। लेकिन 4 अक्टूबर को झील के फूटने की खबर अधिकारियों को तुरंत नहीं मिल पाई क्योंकि झील पर कोई प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली या अर्ली वार्निंग सिस्टम (ईडब्ल्यूएस) स्थापित नहीं की गई थी। भारत तिब्बत सीमा पुलिस, जिसकी नदी के रास्ते पर मौजूदगी है, ने सबसे पहले चेतावनी दी, जिसने नदी के निचले हिस्से में, जहां 1,200 मेगावाट की तीस्ता III जलविद्युत परियोजना स्थित है, लोगों को बचाने के प्रयास शुरू किए।
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