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बजट 2016-17 : बजट से उम्मीदें कुछ ठोस सी

नोटबंदी के बाद यह सबसे बड़ा आर्थिक अनुष्ठान है. इससे जनता को बहुत उम्मीदें हैं. उम्मीदें इसलिए हैं कि नोटबंदी के बाद जनता काफी परेशानी से गुजरी है. यह ठीक है कि नोटबंदी,नकद-न्यूनतम अर्थव्यवस्था भविष्य में अर्थव्यवस्था का भला करेगी, पर फौरी तौर पर तो उसने आम जनता यानी रोज कमाने-खानेवाले लोगों को परेशान ही किया है. इसका असर भी दिखाई पड़ा है. तमाम संगठनों ने 2016-17 के आर्थिक विकास के आंकड़े को कम कर के ही अनुमानित किया है. पहले आर्थिक विकास की दर आठ प्रतिशत के आसपास अनुमानित की जा रही थी, अब सात प्रतिशत के आसपास ही इसे रखा जा रहा है. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, 2016-17 में आर्थिक विकास दर 7.1 प्रतिशत रहनेवाली है, 2015-16 में यह 7.6 प्रतिशत थी.


टूथपेस्ट कंपनियों से लेकर मोटरसाइकिल कंपनियां शिकायत कर रहीं हैं कि सेल और मुनाफे दोनों में कमी आयी है.सरकार पर संसाधनों का संकट नहीं : मोतीलाल ओसवाल नामक संस्था ने अपनी एक रिपोर्ट में बताया है कि नोटबंदी से सरकार को फिलहाल कुछ ठोस हासिल नहीं हुआ है, इसलिए यहां से संसाधनों की उम्मीद बहुत ज्यादा नहीं है.

मोतीलाल ओसवाल की रिपोर्ट के मुताबिक नोटबंदी से करीब 32,800 करोड़ रुपये तो बतौर पेनल्टी, कर मिल जायेंगे और करीब 40000 करोड़ रुपये ऐसे हो सकते हैं, जो सिस्टम में वापस नहीं आये यानी नोटबंदी के बाद वो नोट लोगों ने वापस नहीं किये, जिनके आय के स्रोत बताने में उन्हें हिचक थी. कुल मिलाकर करीब 72,800 करोड़ रुपये ही नोटबंदी ने सरकार की झोली में डाले हैं, ऐसा अनुमान है. पहले अनुमान लगाया जा रहा था कि सरकार को करीब तीन लाख करोड़ रुपये का फायदा नोटबंदी से हो जायेगा. पर इसके बावजूद संसाधनों का संकट नहीं है.

 


वित्तमंत्री ने बताया है कि 2016-17 में कुल 16 लाख 30 हजार करोड़ रुपये की प्राप्ति का अंदाज है, वास्तविक कर-संग्रह इससे ज्यादा ही होगा यानी संसाधनों की कोई दिक्कत नहीं है.

 

 


जेब में नकदी : सरकार की तैयारियां ऐसी लगती हैं कि वह देश के गरीब नागरिक की जेब में कुछ नकदी डालना चाहती है. ऐसा करना अच्छा अर्थशास्त्र भी है और अच्छी राजनीति भी. जेब में नकदी का हिसाब-किताब यह है. आयकर की सीमा बढ़ा कर लोगों की जेब में कुछ अतिरिक्त रकम डाली जा सकती है.

 

 


अभी ढाई लाख रुपये तक की आय आयकर के दायरे में नहीं है. अनुमान लगाये जा रहे हैं कि चार लाख रुपये तक की आय को कर के दायरे से बाहर कर दिया जायेगा. पर ऐसा करना आसान नहीं है, क्योंकि भारत में पहले ही करदाताओं की संख्या कुल जनसंख्या के हिसाब से ज्यादा नहीं है. 127 करोड़ की जनसंख्या में कुल चार करोड़ लोग भी आयकर नहीं देते.

 

 


हरेक को कैश : ऐसी खबरें हैं कि आर्थिक सर्वेक्षण में यूनिवर्सल बेसिक इनकम उर्फ सबको न्यूनतम आय पर व्यापक विमर्श होगा. रोजगारविहीन विकास का दौर यह है यह. मतलब विकास हो सकता है, पर रोजगार उससे कईयों को मिले, ऐसा जरूरी नहीं है. रोबोट, कंप्यूटरों के चलते विकास की रफ्तार तो पढ़ सकती है पर इनसानी रोजगार अवसर स्थिर रह सकते हैं.

 

 


तो ऐसी सूरत में सरकार एक काम यह भी कर सकती है कि आर्थिक तौर पर कमजोर हर बंदे के खाते में एक तय रकम का हस्तांतरण कर दे. जनधन खाते इस हस्तांतरण का माध्यम हो सकते हैं. करीब 25 करोड़ जनधन खातों में एक हजार रुपये महीने का हस्तांतरण किया जाये, तो भी एक न्यूनतम रकम आर्थिक तौर पर विपन्न लोगों के पास आ सकती है. इस काम के लिए करीब तीन लाख करोड़ रुपये सालाना की दरकार होगी. यह रकम छोटी नहीं है. 2016-17 में सर्विस टैक्स से कुल जितनी रकम के संग्रह का अनुमान है, यह रकम उससे भी ज्यादा है. पर सबको आय का मामला एक स्मार्ट राजनीतिक दावं भी है और रोजगार के मौकों को पैदा करने में विफलता को ढंकने का परदा भी.

 

 


रोजगार का मसला : रोजगार बड़ा मसला है. सिर्फ आर्थिक नहीं, राजनीतिक मसला है. देखा जा सकता है कि हरियाणा का जाट आंदोलन, गुजरात का पटेल आंदोलन और राजस्थान का गूर्जर आंदोलन, इस सबके मूल में कहीं ना कहीं सिर्फ रोजगार नहीं, बेहतर रोजगार का मसला है.

 

 


सिर्फ नौकरी नहीं, ठीक ठाक रोजगार चाहिए. अपना काम, अपना स्टार्ट अप शुरू करने को तैयार हैं युवा, पर उनके लिए कुछ सस्ते कर्ज हों, आसान कर्ज शर्त हों. बजट से उम्मीद की जानी चाहिए कि बहुत ही छोटे कारोबारियों के लिए सस्ते और बेहतर कर्ज का जुगाड़ होगा. तकनीक जिस तरह से पंख फैला रही है, उसे देखते हुए रोजगार के अवसर बहुत तेजी से बढ़ने के आसार दिखाई नहीं देते. निजी घरेलू छोटे कारोबारों को किस तरह से वित्तीय सहारा वित्तीय संस्थान दे सकते हैं, आसान शर्तों पर, इस सवाल को बजट को हल करना होगा.