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बजट 2020 : सीधा-सरल नहीं, अंदर की बात में छिपे हैं झटके

-आउटलुक हिंदी
 
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने दशक का पहला बजट पेश करते हुए उसकी थीम “आकांक्षी भारत, आर्थिक विकास और हितैषी समाज” बताई। इस बजट से आम आदमी, किसान, कॉरपोरेट जगत को भी कई सारे आकांक्षाए थी। उसे उम्मीद थी कि मंदी के भंवर में फंस चुकी अर्थव्यवस्था को निकालने के लिए वित्त मंत्री लोगों के बजट में इजाफा करेंगी। इसके लिए उन्होंने टैक्स छूट का ऐलान भी किया। बजट भाषण के दौरान 5-10 फीसदी तक टैक्स छूट का ऐलान काफी बड़ा लगा था। लेकिन भाषण खत्म होते-होते वह झुनझुना ही साबित हुआ।

क्योंकि एक तो उन्होंने टैक्स कटौती का लाभ देने के लिए टैक्स सेविंग का विकल्प ही हटा दिया है। यानी अगर 5-10 फीसदी की टैक्स छूट लेनी है तो आपको 80 सी सहित दूसरे विकल्प का फायदा नहीं मिलेगा। साथ ही 50 हजार रुपये का मिलने वाला स्टैण्डर्ड डिडक्शन भी छोड़ना होगा। सी.ए. समीर गोगिया के कैलकुलेशन के अनुसार, नया टैक्स विकल्प चुनने पर कम आय वाले करदाता को जहां नुकसान होगा, वहीं ज्यादा इनकम वालों को फायदा होगा। इसी तरह वित्त मंत्री ने भाषण में तो यह कहा कि नए टैक्स सिस्टम से करदाता को सिंपल सिस्टम मिलेगा। लेकिन उन्होंने अब चार की जगह सात टैक्स स्लैब बना दिए हैं। जाहिर अब टैक्स सिस्टम कहीं ज्यादा पेचीदा हो गया है। क्योंकि करदाता को यह हिसाब लगाने में भी काफी माथा-पच्ची करनी होगी कि वह पुराना टैक्स सिस्टम अपनाकर फायदे में रहेगा या फिर नए टैक्स सिस्टम से उसे फायदा मिलेगा। साथ ही वित्त मंत्री ने कम टैक्स के लिए प्रोत्साहन दिया है लेकिन इसका नेगेटिव इंपैक्ट यह भी हो सकता है कि करदाता टैक्स बचाने के लिए सेविंग से परहेज करने लगेंगे क्योंकि अभी तक वह टैक्स बचाने के बहाने एलआईसी, पीपीएफ, एनपीएफ जैसे सामाजिक सुरक्षा योजनाओं में निवेश करते हैं। लेकिन जब उन्हें लगेगा कि इसमें बचत करने का फायदा नहीं मिलेगा तो इन योजनाओं में बचत नहीं करेंगे और इसका उन्हें लंबी अवधि में नुकसान हो सकता है।

इसके अलावा वित्त मंत्री ने डिपॉजिट इन्श्योरेंस की लिमिट 5 लाख रुपये बढ़ाकर आम निवेशक के बैंकिंग सेक्टर पर डगमगाते भरोसे को संभालने की कोशिश की है। अभी तक बैंकों में रखी जमाओं पर एक लाख रुपये तक का इन्श्योरेंस कवर मिलता था। नई लिमिट के बाद भारतीय बैंकिंग सिस्टम अब अंतरराष्ट्रीय मानकों के बराबर हो गया है।
 
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