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बढ़ती आबादी का सच और मौजूदा चुनौतियां- ज्ञानेन्द्र रावत

दुनिया की आबादी सात अरब को पार कर चुकी है और बढ़ोतरी जारी है। फिलहाल दुनिया की आबादी में हर साल आठ से नौ करोड़ की वृद्धि हो रही है। संयुक्त राष्ट्र का अनुमान है कि भविष्य में कुछ बड़े अफ्रीकी और दक्षिण एशियाई देश ही वैश्विक आबादी को तेजी से बढ़ाएंगे। इनमें भारत भी शामिल है, जो दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाला दूसरा देश है। आने वाले 10-12 वर्षों में भारत चीन से भी आगे निकल जाएगा। जल क्षेत्र में प्रमुख परामर्श कंपनी इए वॉटर की मानें, तो 2025 में बढ़ती आबादी के कारण भारत को भीषण जल संकट का सामना करना पड़ेगा। अनुमान है कि 2060 में भारत की आबादी 1.7 अरब तक पहुंच जाएगी। और तब चुनौतियां सिर्फ पानी की नहीं, कई तरह की होंगी, खासकर शहरों में उनका आकार तेजी से बढ़ेगा। साल 2010 से 2050 तक 49.7 करोड़ और लोग शहरों में बस जाएंगे।

भारत में 2001 की तुलना में वर्ष 2011 में आबादी में 18 करोड़ की बढ़ोतरी दर्ज की गई। इसमें ग्रामीण आबादी के मुकाबले शहरी आबादी में अपेक्षाकृत बढ़ोतरी अधिक हुई। इसका एक कारण यह भी रहा कि 2001 में 2,500 के करीब मलिन बस्तियों को, जो ग्रामीण क्षेत्र में आती थीं, 2011 में शहरी क्षेत्र में शामिल कर लिया गया। उनमें पेयजल की समस्या तो पहले से ही थी, शहरी क्षेत्र में शामिल होने के बाद उसने विकराल रूप धारण कर लिया। यही नहीं, राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़ के अलावा अन्य राज्यों में ग्रामीण जनसंख्या वृद्धि दर में तेजी से गिरावट दर्ज की गई है। दूसरी तरफ, 2001 से ही गोवा, केरल, नगालैंड और सिक्किम में ग्रामीण आबादी में गिरावट आने के संकेत मिलने शुरू हो गए थे। आंध्र प्रदेश एक ऐसा राज्य है, जहां ग्रामीण आबादी स्थिर है।

 

भारत मौजूदा दौर में मध्य आय वर्ग की स्थिति में है, जबकि उसकी औसत आबादी युवा है। तकरीबन 70 फीसदी भारतीय 35 साल से कम आयु के हैं। दुनिया के दूसरे बड़े देशों के मुकाबले भारत इस समय सबसे युवा है। माना तो यही जाता है कि देश की आबादी में युवाओं की अधिक संख्या का उस देश की अर्थव्यवस्था पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। इन हालात में इस सदी के मध्य तक भारत का विश्व की आर्थिक शक्ति बनने का सपना पूरा हो सकता है, क्योंकि भारत के पास अर्थव्यवस्था के मामले में अन्य देशों के मुकाबले तीव्र गति से विकास करने की क्षमता है। लेकिन यह तभी संभव है, जब हम मौजूदा चुनौतियों का सामना कर पाने में सक्षम हों। इसके अभाव में भारत अपने जनसांख्यिकीय लाभांश को भुनाने में अब तक नाकाम रहा है। आर्थिक प्रगति सिर्फ युवा शक्ति उपलब्ध होने भर का मामला नहीं है, बल्कि ऐसी नीतियां भी जरूरी हैं, जो हर युवा को काम दिला सकें। और यही सबसे बड़ी चुनौती है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)