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बाढ़ के पानी में है जलसंकट का समाधान-- अनिल जोशी

दुनिया की बड़ी चर्चाओं में पानी और पर्यावरण दो प्रमुख मुद्‌दे हैं। वैसे पानी भी पर्यावरण का ही हिस्सा है पर अब यह सालभर चर्चाओं में रहता है। गर्मी आते ही देश-दुनिया में पानी के लिए त्राहि-त्राहि मच जाती है और इसके जाते ही पानी-पानी से त्राहि मच जाती है। इस बार देश के 11 राज्यों के 33 करोड़ लोगों ने सीधे पानी की मार झेली है। इससे पहले जलसंकट ने देशवासियों को त्रस्त किया, क्या केंद्र, क्या राज्य सबको पानी की हाय-हाय झेलनी पड़ी थी। जल-ट्रेन व जल-ट्रक दूरदराज के क्षेत्रों में जलदूत बनकर पहुंचे। शायद पहली बार सरकार को देश में पानी के संकट की बात समझ में आई होगी। इससे पहले छोटे-मोटे रूप में या एक-दो राज्यों में ही गर्मियों में पानी का रोना रोया जाता था, लेकिन पहली बार पानी के लिए चौकीदारी हुई और बंदूकें भी उठीं। संकट इतना बढ़ा कि पानी ने पार्लियामेंट को ही हिला दिया था। सरकारें अभी इस संकट से निपट भी नहीं पाई थीं कि पानी के प्रलय ने घेर लिया।

 


यह देश के गांवों की बदकिस्मती ही है कि पहले पानी के अभाव ने उन्हें घर छोड़ने पर मजबूर कर दिया था, अब मानसून ने भी बाढ़ के रूप में घर-खेत डुबा दिए। चाहे मध्यप्रदेश हो या महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश हो या बिहार सारे बड़े राज्यों में बाढ़ ने नए सिरे से तबाही मचा दी। सैकड़ों गांव जलमग्न हो गए। फिर एक बार पानी के इस भयावह रूप को लेकर संसद में शोर मचा।

 

मध्यप्रदेश के 23 जिलों में सामान्य से ज्यादा बारिश ने कहर ढाया। पूरे प्रदेश में इमरजेंसी नंबर जारी किया गया। दमोह, मंडला और सिवनी में बारिश-बाढ़ से 11 लोगों की मौत हो गई। सतना जिले के 300 गांव के करीब डेढ़ लाख लोग बाढ़ से प्रभावित हुए। पन्ना जिले में भी बुंदेलखंड पैकेज से सालभर पहले बनाए गए दो बांध शुरुआती बारिश में ही टूट गए। 30 जुलाई को बारिश से राजस्थान के कई गांव पानी में घिर गए। राज्य के गंगापुर शहर के वजीरपुर में 200 मिमी बरसात ने कस्बे को जलमग्न कर दिया। करौली में भी कई बस्तियां डूब गईं थीं।

सिर्फ मैदानी क्षेत्र ही नहीं पानी के इस प्रकोप ने पहाड़ी क्षेत्र भी ध्वस्त हो गए। खासतौर पर उत्तराखंड की रिपोर्ट सामने है। राज्य जंगल की आग से निपट भी पाया नहीं था कि अतिवृष्टि ने हमला बोल दिया। इस राज्य का बेस्तड़ी गांव ही नेस्तनाबूद नहीं हुआ बल्कि अनेक गांवों ने पानी का कहर झेला है। अभी डेढ़ माह की समयावधि में ही पौड़ी में अतिवृष्टि से सड़कंे क्षतिग्रस्त होने से 18 करोड़ रुपए, 32 पेयजल योजनाएं और स्कूलों के क्षतिग्रस्त होने से तीन करोड़ रुपए की क्षति हुई है। इस साल अब तक आपदा में करोड़ों रुपए की क्षति का आकलन किया गया है। इनके अलावा पेयजल की 150, सिंचाई की 297, ऊर्जा निगम की 10, वन विभाग की 23 योजनाओं को नुकसान पहुंचा है। जिले में 46 गांवों के कुल 2100 लोग प्रत्यक्ष तौर पर आपदा से प्रभावित हुए हैं। यह मात्र उत्तराखंड की ही नहीं बल्कि हिमाचल प्रदेश व जम्मू-कश्मीर जैसे राज्यों के दूरदराज के गांवों की भी कहानियां हैं,जो सुर्खियां नहीं बन पातीं। बड़ा सवाल यह है कि पानी के ये दो रूप कष्टकारी ही क्यों बनते हैं, बल्कि यह एक-दूसरे की आपूर्ति के हिस्से क्यों नहीं बन पाते। मसलन पानी की त्रासदी के संकट का हल बाढ़ का रूप लेने वाले वर्षा के पानी के संरक्षण से क्यों नहीं निकल सकता?

वर्षा का रुख कैसा भी हो पर हर वर्ष सूखे की स्थिति में भी राजस्थान, गुजरात के कुछ इलाकों को छोड़कर 100 से 200 मिमी बारिश तो पड़ती ही है। पहाड़ों के आंकड़े देखें तो बुरी से बुरी स्थिति में 400-500 मिमी बारिश हो ही जाती है। अच्छी बारिश हो तो आंकड़ा 2000 से भी ऊपर पहुंच जाता है। दक्षिण भारत व उत्तर भारत में अथाह बारिश अपनी भौगोलिक परिस्थितियों का परिणाम है। सारे देश में हर वर्ष औसतन 666.46 मिमी वर्षा होती है। हर वर्ष बरसने वाले पानी की मात्रा लगभग 3,000 अरब क्यूिबक मीटर है यानी 30 लाख अरब लीटर। अगर हम हर वर्ष 120 करोड़ लोगों की पानी की खपत के 70 लीटर प्रतिदिन का हिसाब लगाएं तो 8400 करोड़ लीटर होगा यानी साल में करीब 30 लाख करोड़ लीटर। इससे कई गुना पानी हर वर्ष देश में वर्षा के माध्यम से उपलब्ध है। हर गांव में जितनी भी वर्षा होती है उसका 14-15 प्रतिशत जल संग्रहण गांव की जल संबंधी सभी आवश्यकता को पूरा कर सकता है। पानी के बिगड़ते हालात देखते हुए वर्षा जल संग्रहण पर भरपूर जोर दिए जाने की आवश्यकता है। पानी कि किल्लत शहरों को ही नहीं बल्कि अब गांवों को ही ज्यादा झेलनी पड़ रही है। शहरों की जल आपूर्ति के लिए हर मशक्कत हो जाती है, क्योंकि सरकार शहरों में ही बसती है। दिल्ली की बढ़ती किल्लत के मद्‌देनजर प्रधानमंत्री कार्यालय हिमाचल प्रदेश व उत्तराखंड की सरकारों को तलब करता है पर गांवों की जलापूर्ति पर उतनी चिंता नहीं दिखाई जाती। जल होगा तो ही प्रबंधन होगा। जब नदियों-कुंओं से तेजी से पानी विलुप्त हो रहा है तो सरकारी निर्देश भी किसी काम के नहीं रहेंगें।

अगर हम देश की आवश्यकता देख लें तो पानी के तीन बड़े उपयोग साफ और सामने हैं खेतों के लिए पानी, पीने के लिए पानी व उद्योगों के लिए पानी की खपत। और इस पानी के तीन ही बड़े रास्ते भी हो सकते हैं, वर्षा के पानी को पहाड़ों में चाल, ताल, खाल के अलावा मैदानों में छोटे-बड़े तालाबों के माध्यम से जोड़ा जा सकता है। इसी तरह पीने के पानी व घरेलू उपयोग के पानी के लिए हर छत को चाहे गांव की हो या शहर की, जलागम के रूप में उपयोग में लाया जा सकता है क्योंकि उद्योग जगत भूमिगत पानी का ही उपयोग करते हैं, इसलिए इसको सिंचित करने के लिए भी रास्ते तैयार करने होंगे। सच तो यह है कि यह उनका ही बड़ा दायित्व होना चाहिए।

 

सबसे बड़ी बात है पानी का संरक्षण। पानी का उपयोग कुछ हद तक कानूनी दायरे में लाना होगा। मसलन पानी के उपयोग के साथ हर घर, परिवार, उद्योग इसके संरक्षण की भी पहल करे। अगर हम ऐसा करने में सफल हुए तो पानी के कारण होने वाली दोनों तरह की तबाही से उबर पाएंगे। कितनी अजीब बात है कि हम अब तक पानी की अति को अभाव से नहीं जोड़ पाएं। अब समय है कि हम इस मुद्‌दे पर गंभीर हो जाए वरना हर वर्ष दोनों तरह की पानी की मार हमें पूरी तरह तोड़ देगी। अति और आभाव दोनों ही जीवन के लिए संकट का कारण बन चुके हैं।
(ये लेखक के अपने विचार हैं।)