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बुद्धि की मंदी है : मुद्दों का न होना- पी साईनाथ

म-से-कम दो प्रमुख अखबारों ने अपने डेस्कों को सूचित किया कि 'मंदी' (recession) शब्द भारत के संदर्भ में प्रयुक्त नहीं होगा। मंदी कुछ ऐसी चीज है, जो अमेरिका में घटती है, यहां नहीं. यह शब्द संपादकीय शब्दकोश से निर्वासित पडा रहा. यदि एक अधिक विनाशकारी स्थिति का संकेत देना हो तो 'डाउनटर्न' (गिरावट) या 'स्लोडाउन' (ठहराव) काफी होंगे और इन्हें थोडे विवेक से इस्तेमाल किया जाना है. लेकिन मंदी को नहीं. यह मीडिया के दर्शकों के खुशहाली भरे, खरीदारीवाले मूड को खराब कर देगा, जो कि अर्थव्यवस्था को उंउं, उंउं, ठीक है, मंदी (recession) से बाहर निकालने के लिए बेहद जरूरी है.

'डोंट वॅरी-बी हैप्पी' के इस फरमान ने हास्यास्पद और त्रासदीपूर्ण दोनों स्थितियों को पैदा किया है। कई बार उन्हीं या दूसरे प्रकाशनों के इस नकार भरे नजरियेवाली सुर्खियां हमें बताती हैं कि 'बुरे दिन बीत गये और उबरने की शुरुआत हो रही है.' किस बात के बुरे दिन? मंदी के? और हम किस चीज से किसी तरह उबरने लगे हैं? अनेक प्रकाशन और चैनल इस प्रकार के बहाने बना कर अनेक पत्रकारों समेत अपने कर्मियों को थोक में निकाल बाहर कर रहे हैं.

वे गरीब आत्माएं (इनमें से अनेक ने बडे होम लोन इएमआइ पर करार किये, जब कि अर्थव्यवस्था अब से भी अधिक गिरावट पर थी) नौकरियां खो रही हैं, क्योंकि...जो भी हो, ठीक है। कल्पना कीजिए कि आप डेस्क पर कार्यरत उनमें से एक हैं, अपने पाठकों को आश्वस्त करने के लिए कि सब ठीक है, खबरों की काट-छांट कर रहे हैं. आप शाम में मंदी के भूत की झाड-फूंक करते हैं. अगली दोपहर के बाद आप खुद को उसका शिकार पाते हैं, जिसे आपने मिटा दिया था. मीडिया का पाखंड इसमें है कि वह उसके उलटा व्यवहार करता है, जिसे वह यथार्थ कह कर वह अपने पाठकों को बताता है,-जी, यह बिजनेस की रणनीति का हिस्सा है. लोगों को डराओगे तो वे कम खर्च करेंगे. जिसका मतलब होगा कम विज्ञापन, कम राजस्व, और भी बहुत कुछ कम.

इन दैनिकों में से एक में एक बार एक शीर्षक में 'आर' शब्द का जिक्र था, जिसमें कुछ इस तरह का मखौल किया गया था कि कैसी मंदी? एक खास क्षेत्र में अधिक कारें बिक रही थीं, ग्रामीण भारत चमक रहा है (यहां शब्द था, 'नयी-नयी मिली समृद्धि')। हमें उजले पक्ष की खबरों की जरूरत है-तब भी जब हम निचली सतह पर कुछ अलग करने की कोशिश कर रहे हैं. टेलीविजन चैनल हमेशा की तरह (संदिग्ध) विशेषज्ञों को सामने ला रहे हैं, जो बता रहे हैं कि चीजें उतनी बुरी नहीं हैं, जितनी वे बना दी गयी हैं (किनके द्वारा, हमें यह बिरले ही बताया जाता है). गिरती मुद्रास्फीति के लिए खुशनुमा सुर्खियां हैं. (हालांकि कुछ बाद में इसकी उत्पाद संख्या बनाने को लेकर सतर्क हो गये हैं). लेकिन इस पर बहुत कम ध्यान दिया गया है कि अनाज की कीमतें कितनी गंभीर समस्या हैं. भूख अब भी कितना बडा मुददा है. इसका एक संकेत तीन या दो रुपये और यहां तक कि एक रुपये किलो चावल देने का वादा करती राजनीतिक पार्टियों के घोषणापत्रों में है. (यह अजीब है कि एक आबादी जो कारें खरीदने के लिए तत्पर दिखती है, अनाज खरीदने के लिए नहीं). हालांकि आप जानते हैं कि इन घोषणापत्रों की असलियत क्या है.

इसलिए मीडिया अपने चुने हुए विश्वस्त विशेषज्ञों, प्रवक्ताओं और विश्लेषकों से बात करता है और एलान करता है : इस चुनाव में कोई मुददा नहीं है। निश्चित तौर पर मीडिया जिनके बारे में बात कर रहा है, वैसे बहुत नहीं हैं. और हां, यह राजनीतिक दलों के लिए एक राहत की तरह आता है, जो उन्हें सामने आ रही बडी समस्याओं को टालने में सक्षम बनाता है. यहां तक कि उभरते हुए मुद्दों को सामने लाने के अवसर, जो अनेक मतदाताओं के लिए एक बडी मदद होते-छोड दिये जा रहे हैं. इस तरह हमें आइपीएल बनाम चुनाव, वरुण गांधी, बुढिया, गुडिया और इस तरह की दूसरी बकवासों के ढेर पर छोड दिया गया है. जरनैल सिंह को (जिन्होंने बेयरफुट जर्नलिज्म-नंगे पांव पत्रकारिता को एक नया मतलब दिया है) इसका श्रेय जाता है कि उन्होंने वरुण गांधी जैसी बकवासों को परे कर दिया और 1984 के बाद से सभी चुनावों के लिए महत्वपूर्ण रहे एक मुद्दे पर वास्तव में ध्यान खींचा.

हम अमेरिका में हो रहे विकास के बारे में जो रिपोर्ट करते हैं, उसमें और यहां जिस यर्थाथ पर हम जोर देते हैं, उसमें एक अनोखा अंतर है, और वास्तव में अंतर महत्वपूर्ण हैं-लेकिन वे सामने कैसे आये इसे प्रस्तुत करना हम नहीं चाहते। वर्षों से, हम वैश्वीकरण के एक खास स्वरूप के मुनाफों की दलाली करते रहे हैं. इसमें हम विश्व अर्थव्यवस्था (पढें, अमेरिकी और यूरोपीय) से अधिक से अधिक एकाकार होते गये, सारी चीजें अच्छीं हासिल हुईं. लेकिन जब वहां चीजें बदतर होने लगीं, वे हमें प्रभावित नहीं करतीं. ओह नहीं, बिल्कुल नहीं.

यह अनेक तरीकों से यहां पार्टियों में जानेवालों और साधारण लोगों के बीच की दूरी की माप भी है। बादवाले लोगों के लिए किसी भी तरह बहुत उत्साहित नहीं होना है. उनमें से अनेक आपको विश्वास दिलायेंगे कि उनके पास मुद्दे हैं. लेकिन हम कैसे उन समस्याओं को उठा सकते हैं, जिनका अस्तित्व हम पहले ही खुले तौर स्वीकार चुके हैं? इसलिए भूल जाइए, कृषि संकट और पिछले एक दशक में एक लाख 82 हजार किसानों की आत्महत्याओं को. और बहरहाल, भुखमरी और बेरोजगारी मीडिया में मुद्दा कब रहे? अधिकतर प्रकाशनों ने ग्लोबल हंगर इंडेक्स में भारत के निराशाजनक प्रदर्शन को नगण्य स्पेस दिया है. ये सारी समस्याएं वॉल स्ट्रीट में गिरावट के पहले घटी थीं (मीडिया के लिए जो खुद अप्रत्याशित तौर पर, बिना किसी चेतावनी के घट गया.)

पिछले डेढ साल से, इतनी भीषण चीजें कहीं नहीं हुईं। उद्योग जगत का संकट, निर्माण उद्योग में नकारात्मक विकास, इन सेक्टरों में कुछ नौकरियों का खत्म होना, इन सबका थोडा जिक्र हुआ. अधिकतर एक चलताऊ जिक्र. लेकिन चीजें असल में तब बुरी हुईं जब ऊपर का 10 प्रतिशत हिस्सा शिकार बना. उन्हें फिर से आश्वस्त किये जाने और कारें खरीदना जारी रखे जाने की जरूरत है. कुछ जगहों पर 'उन्हें शिकार मत बनाओ' का मतलब है विभ्रमों, सिद्धांत, यथार्थ और रिपोर्टिंग के बीच की रेखा को धुंधला करना है. इसका बेहद खतरनाक नतीजा हो सकता है.

आबादी के बडे हिस्से के लिए, जो अपने मोबाइल फोन पर शेयर बाजार की ताजा सूचनाएं नहीं पाता, चीजें उतनी बेहतर नहीं हैं। वर्ष 2006 मीडिया में एक बडे बूमवाले वर्ष के रूप में दर्ज है. लेकिन उस वर्ष के तथ्य हमें संयुक्त राष्ट्र मानव विकास सूचकांक में 132वें स्थान पर रखते हैं. तब से उस पहले से ही निराशाजनक स्थान से आयी और गिरावट ने हमें 128वें स्थान पर रखा है-भूटान से भी नीचे. कमवजन के और कुपोषित बच्चों के संदर्भ में भारत एक आपदाग्रस्त जोन है. सूचकांक में हमसे नीचे रहे देश भी इस मोरचे पर काफी बेहतर कर रहे हैं. हम इस ग्रह पर ऐसे बच्चों की सबसे अधिक संख्यावाले देश हैं. और मुद्दे हैं ही नहीं? प्रभावी राजनीतिक ताकतों की उन मुद्दों को टाल जाने की क्षमता का मतलब यह नहीं कि वे मौजूद नहीं हैं. यह बात कि हम अपने आसपास चल रही विशाल प्रक्रियाओं से जुडने में अक्षम हैं, हमें मीडिया के बारे में अधिक और मुद्दों के बारे में कम बताती है.

ऑर्डरों के रद्द हो जाने के कारण निर्यात आधारित सेक्टरों में उदासी है। यह गुजरात, महाराष्ट्र और हर जगह की सच्चाई है. यह सब होने के साथ ही, लाखों मजदूर-हर जगह के प्रवासी, उडीसा, झारखंड या बिहार अपने घरों को लौटने लगे हैं. वे किसके लिए लौट रहे हैं? उन जिलों के लिए, जहां काम का भारी अभाव है, जिस वजह से उन्होंने पहले उन्हें छोडा था. उस जर्जर सार्वजनिक वितरण प्रणाली के पास, जो पहले की ही, घटी हुई, आबादी को खिला पाने में अक्षम है. नरेगा के पास, जो शुरू होने में ही अक्षम था और निश्चित तौर पर फंडिंग के अपने वर्तमान स्तर पर, इन अतिरिक्त लाखों लोगों का सामना नहीं कर सकता.

यह मंदी-या इसे आप जो चाहें कहें-के नये चरण के हमले और इन चुनावों में वोट देने के बीच फंसा हुआ समय है। इस माह और मई में हम वोट देने जा रहे हैं. प्रवासी मजदूरों और दूसरों की नौकरियों का जाना हर हफ्ते बढ रहा है. मानसून के आते-आते आपके पास एक थोडी बुरी स्थिति होगी. कुछ महीनों के बाद, अभूतपूर्व रूप से यह बुरी होगी. लेकिन चुनाव अभी हो रहे हैं. अगर ये आज से कुछ माह बात होते, तो कुछ राज्यों में बेहद निर्णायक नतीजे आते. और मुद्दे भी वरुण, बुढिया, गुडिया या अमर सिंह के अंतहीन कारनामे नहीं होते.

इसी बीच, अपने दर्शकों को मीडिया यह शायद नहीं बताये कि हम महान मंदी (ग्रेट डिप्रेशन) के बाद के सबसे बुरे, 80 वर्षों के बाद देखे गये सबसे गंभीर आर्थिक संकट का हिस्सा हैं. इसके बाद जो हो सकता है, उसके लिए पाठकों, श्रोताओं और दर्शकों को तैयार करने के लिए कुछ भी नहीं हो रहा है. अकेला ठहराव खबरों (और लकवाग्रस्त संपादकीय प्रतिभा) में है. बडी गिरावट मीडिया के प्रदर्शन में है. बाकी की दुनिया के लिए यह एक मंदी है, जिसमें हम और बदतरी की ओर बढ रहे हैं.

अनुवाद : रेयाज उल हक