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बुनियादी आय गारंटी योजना-- आकार पटेल

छोटे किसानों को प्रतिवर्ष 6,000 रुपये नकद देने की योजना की सरकारी घोषणा एक शानदार कदम माना जा रहा है, जिससे चुनाव में राजनीतिक लाभ प्राप्त किया जा सकता है. बजट में घोषित इस योजना के पहले दो बातें हुई हैं.

पहली वह रिपोर्ट, जिसे सरकार ने दबा दिया है, जो कहती है कि बेराजगारी दर 45 वर्षों में सर्वाधिक है. दूसरी यह कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी न्यूनतम आय गारंटी की बात कर रहे हैं. भारत में किसानों के लिए ऐसी योजना पहले से ही मौजूद है. तेलंगाना में किसानों को प्रतिवर्ष प्रति हेक्टेयर आठ हजार रुपये दिया जाता है.

मोदी सरकार की योजना उन किसानों के लिए है, जिनके पास दो हेक्टेयर से कम खेत (करीब पांच एकड़) है. ऐसे किसान को तेलंगाना में पहले से ही 40 हजार रुपये मिल रहा है. ओडिशा में सभी किसानों को पांच हजार रुपये नकद मिलता है. इसके अतिरिक्त, छोटे किसानों को बुवाई के पांच मौसमों में सहायता के लिए 25 हजार और प्रति भूमिहीन परिवार को तीन चरणों में 12,500 रुपये मिलता है.

इन दोनों ही योजनाओं के आलोचक हैं, जो कहते हैं कि पहचान की मुश्किलों के कारण इसे लागू करना कठिन होगा (कोई यह कैसे निर्धारित करेगा कि कौन भूमिहीन हैं और कौन छोटे किसान हैं?) और जाहिर है कि संसाधनों की कमी है.

ऐसा लगता है कि यह ऐसी बात है, जिसका अनुकरण हर राज्य सरकार करने जा रही है, विशेषकर तब जब केंद्र सरकार भी ऐसा कर रही है और इसे राजनीतिक रूप से बहुत लाभकारी माना जा रहा है. यह विचार कि राज्य द्वारा सीधे नकद हस्तानांतरण के बिना कोई व्यक्ति जीवित नहीं रह सकता, भारत तक ही सीमित नहीं है और इस विचार की उत्पत्ति विदेश में ही हुई है.

ब्रिटेन में बेराेजगार दंपति को सरकार से प्रति सप्ताह 114 पाउंड (42 हजार रुपये प्रतिमाह) मिलता है. जिन परिवारों के पास मकान नहीं है या जो खराब हालत में रह रहे हैं, उन्हें अत्यधिक छूट वाले काउंसिल घरों में सरकारी आवास दिया जाता है. अमेरिका में भी बेराेजगारी लाभ और खाद्य टिकटों की पेशकश की जाती है.

जून, 2016 में स्विट्जरलैंड में सभी के लिए बुनियादी आय गारंटी शुरू करने के प्रस्ताव, जैसा राहुल गांधी प्रस्ताव दे रहे हैं, को मतदाताओं ने अस्वीकार कर दिया था. जनमत संग्रह में स्विट्जरलैंड के 77 प्रतिशत नागरिकों ने ऐसी योजना के खिलाफ मतदान किया, जो प्रत्येक व्यक्ति को बिना शर्त मासिक आय प्रदान करती, चाहे उनके पास नौकरी थी या आय का कोई अन्य स्रोत.

इस प्रस्ताव के समर्थकों ने प्रत्येक वयस्क को प्रतिमाह 2,500 स्विस फ्रैंक (1.8 लाख रुपये प्रतिमाह) और प्रत्येक बच्चे को 625 स्विस फ्रैंक (45 हजार रुपये प्रतिमाह) देने का आह्वान किया था. इस योजना के समर्थकों का यह तर्क था कि ऑटोमेशन के बढ़ने का मतलब यह होगा कि बहुत जल्द पश्चिमी देशों में लोगों के लिए नौकरियां उपलब्ध नहीं होंगी. वहीं विरोधियों का तर्क था कि इस तरह की योजना स्विट्जरलैंड में लाखों प्रवासियों को आकर्षित करेगी.

पाठकों को यह जानने में दिलचस्पी होगी कि बहुत कम स्विस राजनेता इस प्रस्ताव के समर्थन में थे और कोई संसदीय दल भी इसके पक्ष में नहीं था. यह स्थिति भारत से एकदम अलग है, जहां स्विट्जरलैंड जितना पैसा तो नहीं है, लेकिन सभी दल नकद में पैसा देना चाहते हैं.

कुछ दिनों पहले ही फिनलैंड ने अपने दो वर्ष के परीक्षण, जिसमें 28 से 58 वर्ष की आयु के दो हजार व्यक्तियों को 560 यूरो (45 हजार रुपये प्रतिमाह) दिया जाता था, को बंद कर दिया. स्पेन के शहर बार्सीलोना (यहां बेरोजगारी दर बहुत ज्यादा है) और नीदरलैंड के यूट्रेंच में भी इसी तरह के प्रयोग हो रहे हैं.

पूरे विश्व में, भारत से यूरोप तक, सार्वभौमिक बुनियादी आय का विचार अपनी जगह बना रहा है. वामपंथी और उदारवादी मानते हैं कि यह गरीबी और असमानता को खत्म कर सकता है. दक्षिणपंथी मानते हैं कि कल्याण वितरण के लिए यह ज्यादा उपयुक्त और कम नौकरशाही का तरीका है. प्रधानमंत्री मोदी इस वादे के साथ सत्ता में आये थे कि वे मनरेगा जैसी योजनाओं को दफन कर देंगे, जिसे उन्होंने मनमोहन सिंह सरकार की असफलता का जीवित स्मारक कहा था.

लेकिन, इस बजट में मोदी ने मनरेगा का आवंटन लगभग 10 प्रतिशत बढ़ा दिया है. यह दिखाता है कि मनरेगा को लेकर उनके विचार बदल गये हैं.

सच तो यह है कि दुनियाभर में नौकरियां कम हो रही हैं और यह कमी जारी रहेगी, खासकर वैसी नौकरियां, जैसी लोग चाहते हैं. कई विशेषज्ञ अगले डेढ़ दशक के भीतर अधिकांश उन्नत अर्थव्यवस्थाओं में बड़े पैमाने पर बेरोजगारी की भविष्यवाणी कर रहे हैं.

इसका मतलब सार्वभौमिक बुनियादी आय पर अधिक से अधिक जोर है. भारत में पश्चिम की तुलना में समस्या कहीं बड़ी है. हम पश्चिम की प्रति व्यक्ति आय से बहुत पीछे हैं (एक औसत स्विस नागरिक एक औसत भारतीय की तुलना में तीस गुना अधिक कमाता है). इसलिए बहुत से लोगों को बहुत अधिक धन देने की आवश्यकता अन्य देशों की तुलना में भारत में जल्द ही पड़ेगी.

इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि हमारे पास एक प्रतिभाशाली प्रधानमंत्री हैं (वर्तमान की तरह) या विश्व स्तर पर सम्मानित एक उच्च प्रशिक्षित अर्थशास्त्री (जो पहले थे). यह एक संरचनात्मक समस्या है, जिससे हम बच नहीं सकते हैं और आगामी चुनाव में अन्य दल भी इस बारे में बात करेंगे.