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बेड़ियों से बेटियों की छलांग-- नासिरुद्दीन

हमारे समाज ने एक ‘अच्छी लड़की' के गुण तय कर रखे हैं. क्या हिंदू क्या मुसलमान, ‘अच्छी लड़की' के पैमाने के मामले में सभी धर्मों और जातियों में बिना किसी भेदभाव के एका है. लड़की का मामला है, इसलिए उसके अच्छे या बुरे होने का पैमाना कोई और ही तय करता है. कुछ धर्म/जाति के नाम पर तय होता है, कुछ घर-परिवार तय करते हैं, तो कुछ पंचायत और समाज तय करते हैं.
वैसे इन सबने ‘अच्छी लड़की' का पैमाना क्या बना रखा है- ‘अच्छी लड़की' तेज नहीं बोलती. ‘अच्छी लड़की' उछलती-कूदती नहीं है. जोर से हंसती नहीं है. चुस्त कपड़े नहीं पहनती है.

कपड़े ऐसे पहनती है, जिससे किसी मर्द की नजर न फिसले. ज्यादा खाती नहीं है. ज्यादा बोलती नहीं है. सीना तान कर नहीं चलती है. नजरें और कंधे झुका कर खड़ी होती है. लड़कों की संगत में नहीं रहती है. इच्छाएं जाहिर नहीं करती है. सपने नहीं बुनती है. बाहर लड़कों के साथ और मर्दों के सामने नहीं खेलती. देर शाम घर से बाहर नहीं रहती. बढ़ती उम्र की ‘अच्छी लड़की' खाना-सीना-पिरोना सीखती है. उछल-कूद वाले खेल नहीं खेलती है. पैर मोड़ कर बैठती है. दुपट्टा ठीक करके झुकती है. किसी से मुस्कुरा कर बात नहीं करती.

यानी ‘अच्छी लड़की' बनने का मतलब है, न-कार से भरी जिंदगी. न-कार की तादाद और पैमाने लड़की के रूप के हिसाब से बदलते रहते हैं. बेटी, बहन, पत्नी और मां के अलग-अलग रूपों में लड़की के ‘अच्छेपन' की कसौटी बदलती रहती है.

न-कारों के बीच स्त्री जाति की जिंदगी सदियों से ऐसे ही चल रही है. यह साबित करने में स्त्री जाति की पीढ़ियां गुजर गयीं कि वे ‘अच्छी लड़की' (बेटी, बहन, पत्नी, मां) हैं. फिर भी हमारे समाज को उनके ‘अच्छेपन' का आज तक यकीन नहीं हो पाता है. इसलिए बदलते वक्त के साथ वह ‘अच्छेपन' का पैमाना बदलता और बढ़ाता रहता है.

जैसे- अच्छी लड़कियां मोबाइल पर बात नहीं करतीं. व्हाॅट्सएप्प पर समय नहीं बिताती हैं. जिंस नहीं पहनती हैं. देर शाम तक बाहर नहीं रहती हैं. अकेले घूमने नहीं जाती हैं. अपने पसंद से शादी नहीं करती हैं. अकेले नहीं रहती हैं. बिना शादी के तो कतई नहीं रहती हैं.

अब इन नामों पर गौर करें- दीपा कर्माकर, साक्षी मलिक, पीवी सिंधु, ओपी जैशा, कविता, साइना नेहवाल, सानिया मिर्जा, विनेश फोगट, ललिता बाबर, दुती चंद, टिंटू लुक्का, बबिता कुमारी, दीपिका कुमारी, सीमा पुनिया, लक्ष्मीरानी मांझी, बॉमबायला देवी लैशराम, नमिता टोप्पो, दीप ग्रेस एक्का, मोनिका मलिक. ये रियो गयीं 50 से ज्यादा महिला खिलाड़ियों में से चंद के नाम हैं. हममें से कितने इन नामों से परिचित हैं?

अब कल्पना करें कि अगर ये सब ‘अच्छी लड़की' के सामाजिक/सांस्कृतिक/धार्मिक पैमाने पर अपने को कसने लगतीं, तो क्या नतीजा होता? अगर साक्षी अखाड़े में न कूदतीं और पटखनी न देतीं, पीवी सिंधु कोर्ट में छलांग न लगातीं, दीपा कर्माकर हवा में कलाबाजी नहीं करतीं, तो क्या ये सब रियो में नजर आयी होतीं? ये चुस्त कपड़े न पहनतीं, तो क्या पहनतीं? सोचनेवाली बात यह भी है कि खिलाड़ियों के शटल और शॉट, कुश्ती के दावं और जिमनास्टिक के रिदम से ध्यान हटा कर कैसे लोगों का लड़कियों के कपड़े पर ही ध्यान लगा रहता है?

ओलिंपिक में पदक के लिए जूझते और पदक से चूकते मुल्क को जब साक्षी ने कांस्य दिलाया, तो अचानक माहौल बदल गया. बेटियों पर प्यार आने लगा. जब सिंधु का पदक पक्का हो गया, तो यह प्यार हिलोरें मारने लगा. बेटियों की कामयाबी के गीत गाये जाने लगे. कविताएं लिखी गयीं. सूक्तियां रची गयीं. व्हाॅट्सएप्प, फेसबुक, ट्विटर पर बेटियों की तारीफ में संदेशों की बाढ़ आ गयी. रातों-रात सभी को उनकी काबिलियत दिखाई देने लगी. अचानक पूरा मुल्क बेटियों के हक में खड़ा नजर आने लगा. ऐसा लगा जैसे बेटियों के लिए दुनिया में इससे अच्छा देश कोई और हो ही नहीं सकता. लेकिन क्या ऐसा ही है?

रियो तक एक महिला एथलीट के पहुंचने का वही अर्थ नहीं है, जो एक मर्द एथलीट का है. कुछ दिक्कतें दोनों एथलीट के साथ होंगी. यहां यह कतई मकसद नहीं है कि मर्द एथलीट की कामयाबी को कम करके आंका जाये. लेकिन, दुनिया में आते ही ‘अच्छी लड़की' बनने की पायल, किसी मर्द एथलीट के पैर की शोभा नहीं बनी होगी.

हर पल ‘अच्छा लड़का' साबित करने का हार पहने किसी मर्द एथलीट को शायद ही हर पल जीना पड़ा होगा. शायद ही किसी मर्द एथलीट को जिंदगी के हर पड़ाव पर खेल से इतर अच्छेपन की नयी कसौटी से सामना करना पड़ा होगा. शायद ही कभी किसी मर्द एथलीट से परिवार, संस्कार, रीति-रिवाज निभाने की उम्मीद की जाती होगी.

इसलिए घर से निकल कर मोहल्ले तक, मोहल्ले से निकल कर शहर तक, शहर से निकल कर सूबे तक, सूबे से निकल कर देश तक, देश से दुनिया और फिर दुनिया से ओलिंपिक तक पहुंचने का सफर हमारे देश की महिला एथलीट के लिए बहुत लंबा और बड़ा सफर है.

इस सफर में वह एक साथ कई बाधा दौड़ में बार-बार हिस्सा लेती है. वह ट्रैक पर हवा की रफ्तार से दौड़ती है, लेकिन अच्छी लड़की का पायल उसके साथ रुन-झुन करता पीछा करता रहता है. जब साथी खिलाड़ी को चित कर वह सीना ताने अखाड़े से बाहर आती है, तो उसके गले में मेडल के साथ ‘स्त्रीपन का हार' भी साथ-साथ सवार होता है. वह ये सब बाधाएं पार करती हुई रियो तक पहुंचती है. इस सफर में वह ‘अच्छी लड़की' की कसौटी से भी बाहर होती जाती है.

कामयाबियों के जश्न के बीच क्या इन बेटियों के सामने खड़ी बाधाओं पर हमारी नजर है? जश्न का खुमार उतर जाये, तो लड़कियों के लिए बाधाएं खड़ी करने के जुनून पर भी जरा हम ध्यान दें. ‘अच्छी लड़की' की कसौटी या पैमाना, ट्रैक पर खड़ी बाधा से बहुत बड़ी और ज्यादा मुश्किल है.

लड़कियों को ‘अच्छी बनने' के बोझ से मुक्त कर ही समाज उनसे अच्छा खिलाड़ी बनने की उम्मीद पालने का हकदार है. तो दीपा, साक्षी, सिंधु के बहाने बेटियों की कामयाबी के गीत गाते हुए हम अपने घरों की बेटियों की राह से हर तरह की ‘बाधाएं' हटाने को तैयार हैं न! वे ‘अच्छी लड़की' के बोझ से अब मुक्त हैं न!