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भारत की जलवायु प्रतिबद्धताओं पर सवालिया निशान लगातीं नई कोयला खदानें

द थर्ड पोल, 09 फरवरी

भारत के पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेन्द्र यादव ने 9 दिसंबर को कॉप-28 के दौरान, उत्सर्जन कटौती में देश की उपलब्धियों पर प्रकाश डालते हुए पेरिस समझौते के प्रति देश के “भरोसे और विश्वास” की पुष्टि की। लेकिन यह घोषणा महज तीन दिन पहले की गई एक अन्य घोषणा के उलट दिखाई देती है, जब कोयला मंत्री प्रह्लाद जोशी ने कहा था कि भारत, जीवाश्म ईंधन के लिए उत्पादन बढ़ाने का इरादा रखता है।

दो हफ्ते बाद जोशी ने कोयला मंत्रालय की सलाहकार समिति की बैठक में कहा कि कोयला खदानों की नीलामी के सात चरण पूरे हो चुके हैं जबकि दो की प्रक्रिया चल रही है। इन चरणों के भीतर, 91 खदानों की सफलतापूर्वक नीलामी की गई है। इनकी लगभग 22.1 करोड़ टन की अधिकतम वार्षिक उत्पादन क्षमता है।

संलग्न दस्तावेज में जोशी कहते हैं: “कुल मिलाकर, घरेलू कोयले की मांग को पूरा करने के लिए बड़ी संख्या में खदानों को लेकर काम चल रहा है।”

वर्ष 2022 में अपडेट किए गए अपने राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (एनडीसी) में, भारत ने तीन प्रमुख वादे किए हैं: 2030 तक 2005 के स्तर के आधार पर अपनी कार्बन उत्सर्जन तीव्रता (बिजली की प्रति यूनिट कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन) में 45 प्रतिशत की कमी; 2030 तक स्थापित बिजली का 50 फीसदी गैर-जीवाश्म-ईंधन स्रोतों से आएगा; और 2070 तक राष्ट्रीय कार्बन तटस्थता का लक्ष्य हासिल कर लिया जाएगा।
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