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भारत के पहले जिओथर्मल प्लांट की संभावनाएं और चुनौतियां

द थर्ड पोल, 17 नवम्बर

लद्दाख के हिमालयी क्षेत्र में पुगा घाटी में सरकार द्वारा संचालित तेल और प्राकृतिक गैस निगम (ओएनजीसी) भारत का पहला जिओथर्मल प्लांट बना रहा है। लद्दाख के नीचे दो टेक्टोनिक प्लेटें टकराती हैं, जिससे यह स्थान गर्म झरनों जैसी जिओथर्मल घटनाओं के लिए एक प्रमुख केंद्र बनता है, और यह वह ऊर्जा है, जिसका दोहन करने के लिए ओएनजीसी उत्सुक है। यह नवीकरणीय ऊर्जा का संभावित जीरो-कार्बन स्रोत है। 

नवीकरणीय ऊर्जा के व्यावसायिक रूप से व्यवहार्य स्रोतों के अनुसंधान और विकास के लिए ओएनजीसी द्वारा स्थापित एक निकाय ओएनजीसी एनर्जी सेंटर (ओईसी) के महानिदेशक रवि कहते हैं, “इस परियोजना के साथ हम भारत को दुनिया के भू-तापीय मानचित्र पर लाने की उम्मीद करते हैं। प्रारंभिक चरण में हमारा इरादा 1,000 मीटर का कुआं खोदने, 200 डिग्री सेल्सियस से ऊपर के तापमान से ऊर्जा खींचने और एक मेगावाट बिजली का उत्पादन करने का है।’ द् थर्ड पोल को वह बताते हैं, “उन्नत चरणों में, हम 100 मेगावाट तक बिजली प्राप्त कर सकते हैं।”

हालांकि अगस्त 2022 में पुगा की एक धारा में जिओथर्मल द्रव (विभिन्न घुले हुए खनिजों से युक्त भूमिगत गर्म पानी) के अप्रत्याशित रूप से रिसाव के बाद परियोजना अभी रुकी हुई है। इससे यह आशंका पैदा हो गई कि ऊर्जा परियोजना, जल स्रोतों को प्रदूषित कर सकती है और संवेदनशील हिमालयी क्षेत्र में निवास स्थान यानी हैबिटेट को नष्ट कर सकती है।

पुगा घाटी जिओथर्मल परियोजना को झटका
जिओथर्मल ऊर्जा पृथ्वी की सतह के ठीक नीचे पाई जाने वाली ऊष्मा है, जो आमतौर पर टेक्टोनिक रूप से सक्रिय क्षेत्रों के करीब होती है। इस ऊर्जा का उपयोग सीधे तौर पर किया जा सकता है, जैसे किसी इमारत के माध्यम से जमीन से उठने वाली भाप को प्रवाहित करके, या अप्रत्यक्ष रूप से, जैसे टरबाइन को चलाने और बिजली उत्पन्न करने के लिए गर्म जिओथर्मल तरल पदार्थ या भाप का उपयोग करके।
पूरी खबर- द थर्ड पोल