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भारत को वैज्ञानिक सोच के साथ आवारा कुत्तों से निपटना होगा

मोंगाबे हिंदी, 29 दिसम्बर 

डेविड क्वामेन ने अपनी किताब ‘द सॉन्ग ऑफ द डोडो’ में लिखा है, “इस बीच, ब्रिटिश जहाजों से लाए गए घरेलू कुत्ते तस्मानिया में जंगली हो गए थे और वे हिंसक जंगली कुत्ते खुद ही कई भेड़ों को मार रहे थे।” उनकी किताब द्वीपों में प्रजातियों के खत्म होने का स्पष्ट रूप से वर्णन करती है। वे कई बार इंसानी वजहों से जानवरों के खत्म होने के खतरे का उल्लेख करते हैं। इनमें आक्रामक प्रजातियों को इसका सबसे सामान्य और बड़ा कारण माना जाता है। समस्या भले आसान थी, लेकिन इसकी कई परतें थी। औपनिवेशिक युग के व्यापारियों और नई जगहों की खोज करने वाले सैलानियों ने कई प्रजातियों को उन नई जगहों पर पहुंचाया, जहां उनका होना असंभव था। यह काम उन्होंने गलती से या फिर जान-बूझकर भी किया।

आक्रामक प्रजातियों का अध्ययन करने वाले वैज्ञानिकों और संरक्षणवादियों को पता है कि ये प्रजातियां तेजी से नए माहौल में ढल जाती हैं। आखिरकार, उनके अनुकूलन और विकास के चलते कई मूल प्रजातियां खत्म हो गईं। लेकिन तब क्या होता है जब ऐसी आक्रामक प्रजाति भी इंसानों की भरोसेमंद साथी बन जाती है?

इसी तरह, आवारा कुत्ते भी बड़े पैमाने पर जैव विविधता को नुकसान पहुंचा रहे हैं। यह ना सिर्फ द्वीप वाले सिस्टम में दिखाई देता है, जैसा कि डेविड क्वामेन ने उल्लेख किया है। ये नुकसान दुनिया के दूसरे देशों में भी देखे जाते हैं। उनसे जैव विविधता को होने वाला नुकसान बड़ा है। बहुत ज्यादा विविधता वाला देश भारत भी इसका अपवाद नहीं है। वैज्ञानिक समुदाय ने सबूत के साथ स्थापित किया है कि भारत भर में लुप्तप्राय और खतरे में पड़ी जंगली प्रजातियों को नुकसान में डालने के लिए कुत्ते सीधे तौर पर जिम्मेदार हैं।

पूरी रपट- मोंगाबे हिंदी