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भारत में महिलाओं के घरेलू कामकाज का मेहनताना अगर होता तो कितना?

-बीबीसी,

हाल में ही एक फ़िल्म स्टार की लॉन्च की गई राजनीतिक पार्टी ने वादा किया है कि अगर वह सत्ता में आती है तो घर-गृहस्थी संभाल रही महिलाओं को वेतन दिया जाएगा.

एक क़द्दावर सांसद ने भी इस आइडिया का समर्थन किया है. उन्होंने कहा है कि गृहस्थी संभाल रही महिलाओं को उनकी सेवाओं के लिए पैसे देने से उनकी ताक़त और स्वायत्तता बढ़ेगी और इससे एक यूनिवर्सल बेसिक इनकम पैदा होगी.

ख़ासतौर पर ऐसे वक़्त में जबकि महिलाएं नौकरियों में जगह गंवा रही हैं, इस वादे से एक बड़ी बहस पैदा हो गई है.

पूरी दुनिया में महिलाएं घर-गृहस्थी के कामों में अपने घंटों लगाती हैं और इसके लिए उन्हें कोई पैसा नहीं मिलता है. इंटरनेशनल लेबर ऑर्गेनाइज़ेशन (आईएलओ) के मुताबिक़, बिना किसी पगार वाले काम करने में सबसे ज़्यादा इराक़ में महिलाएं हर दिन 345 मिनट लगाती हैं, वहीं ताइवान में यह आंकड़ा सबसे कम 168 मिनट है. दुनिया के बाक़ी देशों में महिलाओं के अवैतनिक श्रम पर ख़र्च होने वाला वक़्त इन्हीं दोनों के बीच बैठता है.

औसतन पुरुष बिना पगार वाले घरेलू कामों पर 83 मिनट लगाते हैं, जबकि महिलाएं इसका तीन गुना वक़्त यानी 265 मिनट ऐसे कामों पर ख़र्च करती हैं.

तो क्या महिलाओं को उनके घरेलू कामकाज के लिए पैसे मिलने चाहिए?

भारत में ऐसी महिलाओं की संख्या क़रीब 16 करोड़ है जो कि घर-गृहस्थी संभाल रही हैं. दुनिया के बाक़ी देशों की महिलाओं की तरह से ये भी साफ़-सफ़ाई, खाना पकाना, कपड़े धोने और परिवार के वित्तीय इंतज़ाम देखने का काम करती हैं.

इसके अलावा, महिलाएं बच्चों और अपने सास-ससुर की देखरेख भी करती हैं.

भारत में महिलाओं को घरेलू कामकाज पर 297 मिनट ख़र्च करने पड़ते हैं, जबकि पुरुष केवल 31 मिनट ही ऐसे कामों पर लगाते हैं. पुरुषों का केवल एक-चौथाई हिस्सा ही ऐसे बिना पगार वाले कामकाज करता है, जबकि महिलाओं के मामले में हर पाँच में से चार महिलाएं इन कामों में लगी हुई हैं.

क़ानूनी जानकार गौतम भाटिया तर्क देते हैं कि बिना पगार वाला घरेलू कामकाज "जबरन मज़दूरी" है.

दिल्ली विश्वविद्यालय के शोधार्थी अर्पण तुलस्यान कहते हैं कि बिना वेतन वाले घरेलू कामकाज को पहचानने की ज़रूरत है.

भारत में घरेलू काम को पारंपरिक तौर पर महिलाओं की ज़िम्मेदारी माना जाता है

ज़्यादातर लोगों को हालांकि यह बात पता नहीं होगी कि पिछले 50 से ज़्यादा वर्षों से भारतीय अदालतें वास्तविकता में महिलाओं के बिना पगार वाले कामों पर मुआवज़े के आदेश देती आई हैं. लेकिन, ऐसा केवल उनकी मौत के बाद ही होता है.

किंग्स कॉलेज लंदन में लॉ एंड जस्टिस की प्रोफ़ेसर प्रभा कोटिस्वरण ने 1968 से 2021 के बीच क़रीब 200 मामलों की पड़ताल की है. ये मामले एक ऐसे भारतीय क़ानून के तहत दायर किए गए थे जो कि सभी रोड ट्रांसपोर्ट वाहनों और ख़राब गाड़ी चलाने समेत दूसरी चीज़ों पर पेनाल्टी लगाने से जुड़ा हुआ है.

उन्होंने पाया कि जजों ने घरेलू कामकाज के लिए अच्छी पगार से संबंधित एक बेहतरीन क़ानूनी फ्रेमवर्क विकसित कर लिया था. जज सड़क हादसों में मारी गईं महिलाओं के बिना पगार वाले घरेलू कामकाज की एक वैल्यू निकालते हैं और उनके परिवारजनों को मुआवज़ा दिलाते हैं.

घरेलू कामकाज की वैल्यू तय करते वक़्त जजों ने अवसर की लागत पर नज़र डाली है. यह कुछ ऐसे है कि अगर महिला घर के काम करने की बजाय कुछ और करती तो वह कितना कमा लेती.

इसमें स्किल्ड और अनस्किल्ड वर्कर्स की न्यूनतम मज़दूरी के मानकों और महिला की पढ़ाई-लिखाई को देखते हुए महिलाओं के श्रम का निर्धारण किया जाता है. इसके बाद अदालत मुआवज़े की रक़म तय करती है. इसमें महिला की उम्र और उनकी संतान हैं या नहीं, इन चीज़ों पर भी ग़ौर किया जाता है.

दिसंबर 2020 में एक अदालत ने सड़क हादसे में मारी गई एक 33 साल की घरेलू महिला के परिवार को 17 लाख रुपये का मुआवज़ा दिए जाने का आदेश दिया. इस आदेश में अदालत ने महिला की मासिक सैलरी 5,000 रुपये महीने मानी थी.

सुप्रीम कोर्ट 34 से 59 साल के बीच की मृतक पत्नी के लिए 9,000 रुपये महीने तक की अनुमानित तनख़्वाह के आधार पर मुआवज़ों के आदेश दे चुका है. 62 से 72 साल की आयु की महिलाओं के लिए यह रक़म कम होती है क्योंकि कोर्ट मानता है कि चूंकि इन महिलाओं के बच्चे बड़े हो चुके होते हैं, ऐसे में बच्चों की देखरेख की उनकी ज़िम्मेदारी कम हो जाती है.

अदालतों ने महंगाई के साथ भी मुआवज़े का सामंजस्य बैठाने की कोशिश की है.

एक फ़ैसले में जजों ने शादियों को एक "समान आर्थिक भागीदारी" के तौर पर देखा है और इस तरह से घरेलू महिला की सैलरी पति की सैलरी की आधी बैठती है.

इस तरह के मुआवज़े का सबसे पहला मामला प्रोफे़सर कोटिस्वरण को 1966 के आदेश का मिला है.

इस मामले में कोर्ट ने आदेश दिया था कि पति का अपनी पत्नी के रखरखाव का ख़र्च पत्नी की अनुमानित सैलरी के बराबर होती. ऐसे में उन्हें कोई मुआवज़ा नहीं दिया गया.

अदालतों द्वारा तय की गई कुछ मामलों में मुआवज़े की रक़म नगण्य रही है. लेकिन प्रो. कोटिस्वरण कहती हैं कि बिना पगार वाले काम की किसी पेशे से तुलना करना और मान्यता दिया जाना ही अपने आप में एक बड़ी चीज़ है.

ऐसे में यह सवाल पैदा होता है कि अगर किसी परिवार को महिला के मरने के बाद उसके द्वारा किए जाने वाले बिना पगार के कामकाज के लिए मुआवज़ा मिल सकता है, तो महिला के जिंदा रहने पर उसे तनख़्वाह क्यों नहीं मिल सकती है?

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