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भद्रलोक की हिंसा का मनोविज्ञान-- हरिराम पांडेय

पश्चिम बंगाल में व्यापक चुनार्वी ंहसा न तो कोई नई बात है और न ही यह कोई अजूबा। बंगाल का भद्रलोक समाज राजनीतिक हिंसा को एक रूमानी रूप देता रहा है। यहां हर दौर में सिर्फ झंडे बदल जाते हैं, जबकि डंडे और उनके काम उसी तरह रहते हैं। कुछ लोग इसे इतिहास से भी जोड़कर देखते हैं। जंगे आजादी के बाद में जब भारत का बंटवारा हुआ, तो जो हिंसा हुई, वह इतिहास में ‘ग्रेट कलकत्ता किलिंग' के नाम से दर्ज है। कभी अंग्रेजों ने बंगाल को गैर दंगाई या मारपीट से दूर रहने वाली कौम बताया था, लेकिन ऐसा था नहीं। जिन लोगों ने बंगाल को देखा है, उन्हें साठ का दशक याद होगा। उस समय यहां कांग्रेस का शासन था और सत्ता को हासिल करने के लिए भारतीय माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में वाम मोर्चा ने पंजे लड़ाने शुरू किए थे और यह लड़ाई खूनी संघर्ष में बदल गई। 1977 में वाम मोर्चा सरकार पश्चिम बंगाल की सत्ता पर कायम हो गई। कांग्रेस एक तरह से निस्तेज हो गई। 34 वर्षों तक वाम मोर्चे का शासन चला। इस काल में राज्य में लगभग 28 हजार राजनीतिक हत्याएं हुईं।

वर्तमान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की राजनीतिक दीक्षा कांग्रेस में ही हुई थी। बाद में उन्होंने कांग्रेस छोड़कर तृणमूल कांग्रेस का गठन किया। वाम मोर्चा के खिलाफ एक नई जंग शुरू हो गई, जिसकी कमान ममता बनर्जी के हाथ में थी। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े बताते हैं कि लगभग हर वर्ष पश्चिम बंगाल में कुछ न कुछ राजनीतिक हत्याएं होती रही हैं। 2001 से 2009 तक यानी 8 वर्षों में 218 लोग हिंसा के शिकार हुए। केवल 2010 में 38 लोग मारे गए और 2011 में जब बंगाल में लाल किला ध्वस्त हुआ, उस समय 38 लोग मारे गए। यह सिलसिला रुका नहीं। 2012 में 22, 2013 में 26, 2014 में 10 लोग राजनीतिक हिंसा में मारे गए। 2015 और 2016 अपेक्षाकृत शांत रहे।

तृणमूल कांग्रेस की सत्ता सुरक्षित चल रही थी, लेकिन यहां अचानक भाजपा का उदय हुआ और धीरे-धीरे हिंसा सुलगने लगी। जिसका सुबूत पिछले साल के पंचायत चुनाव के दौरान हुई हिंसक घटनाएं हैं। 2019 में लोकसभा चुनाव के दौरान एक बार फिर हिंसा का दौर शुरू हो चुका है, इसका कारण है कि जो लोग शुरुआती दौर में वामपंथी दलों को छोड़कर तृणमूल के झंडाबरदार बने थे, आज अचानक उनमें से बड़ी संख्या में लोग भाजपा में आने लगे हैं। जो पहले वहां हथियार उठाया करते थे, वे अब इधर से हथियार उठाने लगे हैं।

पश्चिम बंगाल की सबसे बड़ी खूबी यह है कि यहां नेता बाद में टोपियां बदलते हैं, समर्थक पहले झंडे बदल देते हैं। 2011 में जब सत्ता परिवर्तन हुआ, तो लाल झंडे लेकर चलने वाले लोगों ने जोड़ा फूल वाला झंडा उठा लिया। क्लबों और पार्टी दफ्तरों के रंग रातोंरात बदल गए। आज फिर वही स्थितियां बनने लगी हैं। साल 2011 में चाहे जितनी हिंसा हुई हो, लेकिन ममता बनर्जी का एक नारा उस समय बड़ा कारगर हुआ था, वह नारा था - बदला नोय, बदल चाई यानी ‘बदला नहीं बदलाव चाहिए।' एक ऐसी नेता, जो खुद राजनीतिक हिंसा का कई बार शिकार हो चुकी थीं, वह सकारात्मक नारे लगा रही थीं। लेकिन यह आशावाद कायम नहीं रह सका। सत्ता पर तृणमूल के आसीन होने के साथ ही माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने हिंसा का झंडा उठा लिया और ममता बनर्जी के शासनकाल के पहले दौर में कई जगह हिंसक घटनाएं हुईं। तृणमूल कांग्रेस ने अक्सर उन स्थानों पर कब्जा किया, जो अब तक कम्युनिस्ट पार्टी के कब्जे में रहे थे। तृणमूल कांग्रेस ने पहले पंचायतों पर ही कब्जा जमाना शुरू किया। उसे यह मालूम था कि गांव के लोग पंचायतों पर ही निर्भर करते हैं। अगर पंचायतों पर कब्जा कर लिया गया, तो पूरे बंगाल पर खुद-ब-खुद कब्जा हो जाएगा। यह किसी भी जाति धर्म से परे बात थी। पश्चिम बंगाल में एक और खूबी है कि अन्य राज्यों की तरह यहां जाति और धर्म से परिचय नहीं होता। राजनीतिक पार्टियां और उनके विचार बंगाल में सबसे बड़ी पहचान हैं। आजादी के बाद से ही राजनीतिक दल और उनके आदर्श बंगाल में जमीन के मसले से जुड़कर एक भावनात्मक मसला बन जाते हैं। इसीलिए ममता बनर्जी ने मां-माटी-मानुष का नारा गढ़ा था।

इस समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पश्चिम बंगाल में वोट पाने के लिए जीतोड़ कोशिश में लगे हैं, जबकि दूसरी तरफ की कोशिशों का स्तर भी यही है। इससे स्थिति लगातार खतरनाक होती जा रही है। हकीकत तो यह है कि पश्चिम बंगाल में 42 सीटों के लिए सात चरणों में मतदान का मतलब ही था कि यह लड़ाई लंबी चलेगी। दोनों तरफ से न केवल जुबान चल रही है, बल्कि हथियार भी चल रहे हैं और अब तो यह युद्ध साइबर स्पेस में भी पहुंच गया।

सच तो यह है कि पश्चिम बंगाल में जब भी कोई राजनीतिक परिवर्तन होता है, खास करके सत्ता का परिवर्तन, तो उस समय हिंसा होती है। अंग्रेज बंगाली कौम को शांतिप्रिय और डरपोक मानते थे। शायद यही उनकी गलती थी। और जब 1857 का सिपाही विद्रोह हुआ, तो कलकत्ता और बैरकपुर में सेना की बंगाल टुकड़ी ने ही बगावत को फैलाया। अंग्रेजों को भगाने में बंगाल के क्रांतिकारियों ने सबसे पहले कदम आगे बढ़ाया था, तब से अब तक जब भी सत्ता परिवर्तन हुआ है, बंगाल में हिंसा हुई है। बंगाली भद्रलोक समाज अच्छे कार्यों के लिए खून खराबे को रूमानी दृष्टिकोण से देखता रहा है। बंगाल का मानस इसी स्वरूप में ढल गया है। क्रांति यहां रूमानी बन जाती है। यही कारण है कि हर चुनाव में बंगाल में हिंसा होती है। जब सत्ता परिवर्तन का भय शुरू होता है, तो हिंसा बढ़ जाती है। कहा जा सकता है कि बंगाल में जब किसी इलाके में पहले से स्थापित पार्टी को जोरदार चुनौती मिलती है, तो वर्चस्व की लड़ाई में हिंसा का सहारा लिया जाता है। वर्तमान चुनाव के दौरान यह हिंसा कहीं ऐसा ही संकेत तो नहीं कर रही?

(ये लेखक के अपने विचार हैं)