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भविष्य के शिक्षक, शिक्षकों का भविष्य-- हरिवंश चतुर्वेदी

आज के दिन देश के लाखों स्थानों पर स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में शिक्षक दिवस धूमधाम से मनाया जाता है। लेकिन क्या डॉ राधाकृष्णन की कल्पना के अनुरूप आज भी समाज में शिक्षक और शिक्षा के पेशे को हम वह सम्मान दे पाए हैं, जो उन्हें मिलना चाहिए? हम इंजीनियरों, डॉक्टरों, चार्टर्ड अकाउंटेंट, आईएएस, आईपीएस, नेताओं, उद्योगपतियों, साधु-संतों और फिल्मी अभिनेताओं से मिलकर जितना गद्गद् होते हैं और सेल्फी लेने लगते हैं, क्या ऐसा हम तब भी महसूस करते हैं, जब अपने किसी पुराने शिक्षक से मिलते हैं? भारतीय अर्थव्यवस्था अभी हाल ही में सकल राष्ट्रीय उत्पाद के आधार पर दुनिया में नंबर छह पर पहुंच गई। अगले कुछ वर्षों में हम तीसरे स्थान पर भी पहुंचने की उम्मीद रखते हैं। क्या शिक्षा व्यवस्था में बड़े गुणात्मक परिवर्तनों और सुधारों के बिना यह संभव होगा?

पिछले एक दशक में तकनीक के क्षेत्र में ऐसे युगांतरकारी परिवर्तन आए हैं कि विश्व स्तर पर उद्योगों, व्यवसायों, बाजारों, समाज, शिक्षा, मीडिया और राजनीति में सब कुछ उलट-पलट रहा है। इतनी तेजी से कि कभी-कभी हमें ऐसा लगता है कि हम कोई वैज्ञानिक उपन्यास पढ़ रहे हैं, कोई सपना देख रहे हैं या हॉलीवुड की अवेंजर्स जैसी कोई फिल्म देख रहे हैं। सूचना क्रांति ने दुनिया को बदलने में एक बड़ी भूमिका निभाई थी, किंतु चौथी औद्योगिक क्रांति ऐसे बड़े बदलाव लाने जा रही है, जिनकी कोई कल्पना नहीं कर पाएगा। क्या हमारे स्कूल, कॉलेज, विश्वविद्यालय इस चौथी औद्योगिक क्रांति के बारे में सजग हैं या अब भी कुंभकर्णी निद्रा में सोये हुए हैं? क्या हमारे राजनेता, नीति-निर्माता, शिक्षक और विद्यार्थी इस कटु सत्य से वाकिफ हैं कि वर्ष 2030 तक, आज-कल मिलने वाले अधिकांश रोजगार खत्म हो जाएंगे और जो नए रोजगार मिलेंगे, उनकी तैयारी के लिए आवश्यक शिक्षा, पाठ्यक्रम, उपकरण, शिक्षक और पढ़ाने के तौर-तरीके हमारे पास नहीं हैं।

आजकल चौथी औद्योगिक क्रांति के अनुरूप ‘शिक्षा 4.0' की बहुत चर्चा हो रही है। 2030 तक शिक्षक का पेशा खत्म नहीं होने जा रहा, लेकिन एक बात तय है कि शिक्षक की महत्ता और भूमिका में बड़े बदलाव आएंगे। सबसे बड़ा बदलाव होगा कि शिक्षक का काम सिर्फ व्याख्यान देकर ज्ञान बांटना न होकर, युवा पीढ़ी को कोच, मेंटर या मित्र के रूप में भविष्य का रास्ता दिखाने का होगा।

आजादी के बाद भारतीय समाज ज्ञान, विद्या, समानता, चरित्र-निर्माण, भाईचारा, सद्भाव और सामाजिक प्रतिबद्धता जैसे मूल्यों के प्रति अपनी निष्ठा लगातार खोता गया है। इस दौर में शिक्षकों की पेशागत प्रतिबद्धताओं और योग्यताओं में भी लगातार क्षरण होते देखा गया। आजादी के बाद के प्रारंभिक दशकों में शिक्षकों की कार्य-दशाएं और वेतन-भत्ते अन्य पेशों की तुलना में कम थे। नतीजतन, पूरे देश में प्राथमिक, स्कूली और कॉलेज-यूनिवर्सिटी शिक्षकों की यूनियनों ने शिक्षकों को लामबंद करके लगातार आंदोलन किए। शिक्षकों को राजनीतिक दलों ने विधायिकाओं और संसद के लिए भी नामित किया और उन्हें चुनाव लड़ने की छूट दी। शिक्षक संघों के आंदोलनों से जहां उनकी आर्थिक स्थिति में सुधार आया, वहीं दूसरी ओर उन्हें शिक्षा के उन्नयन से विमुख होते भी देखा गया। क्या राष्ट्रीय व प्रादेशिक संघ शिक्षकों की इस उदासीनता के लिए उत्तरदायी नहीं?

पिछले तीन दशकों में चौथे वेतन आयोग से लेकर छठे वेतन आयोग की सिफारिशों के लागू होने के फलस्वरूप सरकारी कर्मचारियों की तरह शिक्षकों के वेतनमानों में लगातार वृद्धि होती गई। मिसाल के तौर पर 1977 में डिग्री कॉलेज के लेक्चरर को करीब एक हजार रुपये मासिक वेतन मिलता था, जो छठे वेतन आयोग की सिफारिशें लागू होने के बाद लगभग 45,000 रुपया तक पहुंच गया है, यानी 41 वर्षों में 45 गुना। भारतीय समाज में शिक्षकों की प्रतिष्ठा में गिरावट का कारण शिक्षकों के आर्थिक स्तर में सुधार के साथ-साथ उनकी पेशागत प्रतिबद्धता में कमी होना भी है।

देश के किसी भी कॉलेज या यूनिवर्सिटी कैंपस में अगर आप जाएं, तो युवा विद्यार्थियों का अक्सर हुजूम दिखाई देगा। आमतौर पर इसका कारण कक्षाएं न लगना होता है। लेकिन इस भीड़-भाड़ का एक मुख्य कारण युवा आबादी में हो रही बेतहाशा वृद्धि के साथ-साथ उच्च शिक्षा का समुचित विस्तार न होना भी है। कल्पना करिए कि 2025 तक उच्च शिक्षा में विद्यार्थियों की संख्या जब मौजूदा 3.54 करोड़ से बढ़कर 5.4 करोड़ हो जाएगी, तो कैसा परिदृश्य होगा? विश्व के अन्य विकसित व विकासशील देशों की तुलना में हमारे पास कम शिक्षक उपलब्ध हैं। मानव संसाधन विकास मंत्रालय की रिपोर्ट (2013) के अनुसार, इस समय देश में करीब 12 लाख शिक्षक कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में कार्यरत हैं। एक सर्वेक्षण के अनुसार, राज्य विश्वविद्यालयों में 40 प्रतिशत और केंद्रीय विश्वविद्यालयों में 35 प्रतिशत शिक्षकों की जगहें खाली पड़ी हैं।

हमारी शिक्षा से जुड़ी समस्याएं जितनी विराट हैं, उनका पुख्ता समाधान सरकार, शिक्षक और समाज के संयुक्त और दीर्घकालीन प्रयासों से ही संभव है। आज जो चुनौतियां भारतीय शिक्षा में दिख रही हैं, उनके बीज ‘60 और ‘70 के दशकों में बोए गए थे। जाहिर है, भारतीय समाज और सरकार को शिक्षकों की भूमिका का नए सिरे से मूल्यांकन करना होगा। शिक्षकों में भी आत्मालोचना की बड़ी जरूरत है। उन्हें नई शिक्षण पद्धतियों, सूचना प्रौद्योगिकी, चौथी औद्योगिक क्रांति और 21वीं सदी के शिक्षाशास्त्र से प्रशिक्षित और सुसज्जित करने की जरूरत है।

यह कार्य कितना कठिन है, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि सातवें अखिल भारतीय स्कूल शिक्षा सर्वेक्षण के अनुसार सन 2002 में हमारे स्कूलों में 55.30 लाख शिक्षक कार्यरत थे। इनकी कुल संख्या अब करीब 80 लाख होनी चाहिए। इसमें अगर 12 लाख कॉलेज व विश्वविद्यालय के शिक्षकों की संख्या को जोड़ दें, तो देश में शिक्षकों की कुल संख्या 92 लाख हो जाएगी। क्या हम भारतीय समाज में उनको एक सम्मानजनक स्थान देने की स्थिति में हैं और क्या 21वीं सदी के ज्ञानोन्मुख समाज के लिए हम उन्हें नए सिरे से प्रशिक्षित और प्रेरित कर पाएंगे? (ये लेखक के अपने विचार हैं)