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भाजपा शासित राज्यों समेत कई प्रदेशों ने की थी एमएसपी बढ़ाने की सिफ़ारिश, केंद्र ने ठुकराया

संसद का बजट सत्र शुरु होने से पहले बीते 31 जनवरी को राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने संसद के संयुक्त अधिवेशन में अपने अभिभाषण में कहा कि केंद्र सरकार किसानों को लागत का डेढ़ गुना मूल्य देने के लिए समर्पित भाव से काम कर रही है.

उन्होंने कहा कि खरीफ और रबी की फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) में लगातार की गई वृद्धि इसी दिशा में उठाया गया कदम है. हालांकि राष्ट्रपति का ये दावा सरकारी फाइलों में दर्ज एमएसपी की हकीकत पर खरा नहीं उतरता है.

द वायर  द्वारा सूचना का अधिकार कानून के तहत प्राप्त किए गए आधिकारिक दस्तावेजों से पता चलता है कि भाजपा शासित समेत कई राज्य सरकारों ने केंद्र सरकार द्वारा तय की गई फसलों की एमएसपी पर सहमति नहीं जताई थी और इसमें बदलाव करने की मांग की थी.

सरकारी फाइलों के मुताबिक राज्य सरकारों द्वारा स्वामीनाथन आयोग की सिफारिश के मुताबिक C2 के आधार पर लागत का डेढ़ गुना दाम देने की मांग के बजाय केंद्र सरकार A2+FL के आधार पर लागत का डेढ़ गुना दाम दे रही है.

A2+FL लागत में सभी कैश लेनदेन और किसान द्वारा किए गए भुगतान समेत परिवार श्रम मूल्य शामिल होता है. इसमें पट्टे पर ली गई भूमि का किराया मूल्य भी शामिल होता है.

वहीं C2 में A2+FL लागत के साथ-साथ खुद की भूमि का किराया मूल्य और खुद की पूंजी पर ब्याज भी शामिल होता है.

पिछले साल तीन जुलाई को कैबिनेट ने 2019-20 सीजन के खरीफ फसलों की एमएसपी को मंजूरी दी थी, जिसमें 2018-19 सीजन की तुलना में धान की एमएसपी में 3.7 फीसदी, ज्वार में 4.9 फीसदी, बाजरा में 2.6 फीसदी, मक्का में 3.5 फीसदी, मूंग में 1.1 फीसदी, उड़द में 1.8 फीसदी, कपास में 2.0 फीसदी की मामूली वृद्धि की गई थी.

केंद्रीय कृषि मंत्रालय के कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (सीएसीपी) की सिफारिशों के आधार पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में कैबिनेट ने फसलों की इस एमएसपी को मंजूरी दी थी. हालांकि दस्तावेजों से पता चलता है कि छत्तीसगढ़, हरियाणा, महाराष्ट्र, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, पुदुचेरी, तमिलनाडु, ओडिशा और कर्नाटक सरकार ने इसका विरोध किया था.

आलम ये है कि कैबिनेट बैठक से पहले तमिलनाडु और कर्नाटक सरकार की टिप्पणी आ जाने के बावजूद उनकी बातों को कैबिनेट नोट में शामिल नहीं लिया गया. कैबिनेट नोट वो महत्वपूर्ण दस्तावेज होता है जिसके आधार पर कैबिनेट किसी भी विषय पर फैसला लेती है.

अगर एमएसपी के दायरे में आने वाली सभी फसलों को मिला दिया जाए तो C2 लागत के मुकाबले कुल लाभ का मार्जिन मात्र 14 फीसदी है. यानी की C2 लागत के मुकाबले सिर्फ 14 फीसदी अधिक राशि जोड़कर एमएसपी तय की गई है.

आधिकारिक दस्तावेजों से यह भी पता चलता है कि देश के अलग-अलग राज्यों में विभिन्न फसलों की अलग-अलग उत्पादन लागत होने की वजह से एक एमएसपी राज्यों के किसानों की मांगों को पूरा नहीं कर पाती है. इसे लेकर कई राज्यों ने आपत्ति जताई थी.
 
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