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'भारत' वाला बजट, इंडिया वाला नहीं-- संदीप बामजई

उपकार फिल्म का एक गाना है- मेरे देश की धरती सोना उगले उगले हीरा मोती... आम बजट 2018-19 पूरी तरह से इस गाने के सच को पूरा करनेवाला लगता है. यह बजट कृषि और ग्रामीण क्षेत्र के विकास के लिए अपनी प्रतिबद्धता दर्शाता है. यानी यह बजट 'भारत' को ज्यादा तरजीह देनेवाला बजट है, 'इंडिया' को कम. ग्रामीण भारत के लिए, गरीब परिवारों के स्वास्थ्य के लिए, राष्ट्रीय राजमार्गों के लिए और कृषि क्षेत्र के लिए यह बजट बहुत शानदार है.

ओबामा केयर की तर्ज पर अब तक की सबसे बड़ी राष्ट्रीय स्वास्थ्य सुरक्षा योजना 'आयुष्मान भारत' योजना को भारत के दस करोड़ गरीब परिवारों के लिए एक 'मोदी केयर' योजना माना जा सकता है. इस योजना के तहत 50 करोड़ लोगों को हर साल पांच लाख रुपये का स्वास्थ्य बीमा मिलेगा. इसका अर्थ यह है कि यह बजट ग्रामीण वोट का बैंक बैलेंस बढ़ानेवाला बजट है.

इस ऐतबार से मेरा ख्याल है कि आम चुनाव अगले साल नहीं, बल्कि इसी साल राज्यों के चुनाव के साथ हो सकता है. जिस तरह से यूपीए सरकार का 'मनरेगा' एक बहुत बड़ी योजना थी, जिसने ग्रामीण भारत को सशक्त करने में एक बड़ी भूमिका निभायी थी, ठीक उसी तरह से 'आयुष्मान भारत' भी एक बड़ी स्वास्थ्य योजना है. ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबों के स्वास्थ्य के लिए यह बहुत जरूरी था, क्योंकि गरीब लोग महंगे इलाज के चलते एक तो इलाज नहीं करा पाते, या फिर इलाज कराकर और गरीब होते रहते हैं.

पर्सनल इनकम टैक्स स्लैब में अरुण जेटली ने कोई बदलाव नहीं किया, लेकिन छोटे उद्योगों के लिए कॉरपोरेट टैक्स को 30 प्रतिशत से कम करके 25 प्रतिशत कर दिया है. यानी 250 करोड़ से कम टर्नओवर वाली कंपनियों अब 25 प्रतिशत टैक्स देना होगा. इसका अर्थ यह है कि कृषि और ग्रामीण केंद्रित कंपनियांे के लिए यह बहुत फायदेमंद होगा. अरुण जेटली ने बजट पेश करते वक्त विवेकानंद जी को कोट किया था कि- 'आप स्वयं को उस रिक्ति में विलय कर दें और विलुप्त हो जायें तथा अपने स्थान पर नये भारत का सृजन होने दें. उसे किसान की झोपड़ी से, हल के जुए से और झोपड़ी से उत्पन्न होने दें...' यह अपने आप में एक संकेत है कि सरकार ने 'भारत' को ध्यान में रखकर बजट बनाया है.

जेटली ने 'इंडिया' को कुछ खास नहीं दिया, यहां तक कि टैक्स देनेवालों और सैलरी क्लास को भी राहत नहीं दी. पर्सनल इनकम टैक्स में कोई बदलाव नहीं किया. हां, सीनियर सिटीजनों को पचास हजार रुपये तक की इनकम टैक्स में छूट देकर अच्छा किया है. यहां एक आैर बड़ी बात यह है कि फिस्कल डेफिसिट यानी राजकोषीय घाटे के बारे में कहा कि यह बजट अनुमान 3.2 प्रतिशत से बढ़ाकर 3.5 प्रतिशत तक रहेगा. यानी यह साफ है कि यह बजट पूरी तरह से ग्रामीण पर फोकस है.

'भारत' केंद्रित इस बजट की जरूरत तो है, क्योंकि आज भी साठ प्रतिशत लोग गांवों में रहते हैं और सत्तर प्रतिशत लोग कृषि से जुड़े रोजगार से जुड़े हुए हैं. इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती है और सरकार ने अनदेखी की भी नहीं है. मसला यह नहीं है, मसला यह है कि कई सरकारें आयीं और चली गयीं, सबने योजनाएं लायी थीं, लेकिन उसका आज तक क्या क्रियान्वयन सही तरीके से हुआ? योजनाओं का मतलब यह नहीं है कि सिर्फ उनका ऐलान किया जाये, बल्कि उसका क्रियान्वयन बहुत जरूरी है.

अगर आप गौर करें, तो किसान रिकॉर्ड स्तर पर उत्पादन कर रहा है- फल, सब्जियां, दूध, पशुधन, मांस-मछली, ये सारे उत्पादन किसान कर रहे हैं, लेकिन उनको वाजिब दाम नहीं मिल रहा है.

यह अजीब तरह का विकास है, जो पहली बार भारत में देखने को मिल रहा है. इसके लिए पिछले कुछ वक्त से जिस तरह से किसान परेशान रहे हैं, उनमें एक तरह का आक्रोश रहा है, उसे देखते हुए यह कहा जा सकता है कि इस बजट से उन्हें राहत मिलेगी. कृषि उपज पर कीमतों का भारी दबाव पहले से ही है, जिसके लिए एमएसपी (न्यूनतम समर्थन मूल्य) को डेढ़ गुना बढ़ा दिया गया है. यह एक बड़ा कदम है. किसानों को आलू-टमाटर सड़क पर न फेंकना पड़े, इसके लिए जरूरी है कि उन्हें उपज की कीमत हर हाल में मिले.

ऑपरेशन ग्रीन, फूड प्रोसेसिंग, ऑर्गेनिक खेती, किसान क्रेडिट कार्ड, कृषि ऋण को 10 लाख करोड़ रुपये से बढ़ाकर 11 लाख करोड़ रुपये किया जाना, ये सारे कदम अपनी जगह बहुत सही हैं, लेकिन सरकार को यह भी सोचना चाहिए था कि देश में एक बड़ा मध्य वर्ग है और टैक्स देनेवाले लोग भी हैं, जो बढ़ रहे हैं, इनके लिए भी कुछ किये जाने की जरूरत थी. इस बार इस वर्ग के बजाय ग्रामीण भारत को लुभाया गया है. गांवों में इन्फ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करने के लिए बजट में 14.34 लाख करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है, यह बहुत शानदार आवंटन है, जो अगर सही से क्रियान्वयन हो गया, तो गांवों की तस्वीर बदल सकती है. इससे गांवों में जीविका के ढेर सारे साधन भी बनेंगे. हालांकि, प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था कि लोकलुभावन बजट नहीं होगा, लेकिन यह है. यानी 'वोट कैचिंग बजट' है.

क्योंकि, अरसे से जिस तरह से ग्रामीण भारत को लेकर कोई बड़ा प्रावधान नहीं हो रहा था, अब जब आम चुनाव नजदीक हैं, तो ऐसा प्रावधान इस बजट को लोकलुभावन बना देता है. खैर, एक क्षेत्र में तो सरकार की मंशा ठीक लग रही है, खास तौर से 'भारत' माता की जय वाले बजट के हिसाब से. बजट लोकलुभावन तब नहीं होता, जब हर क्षेत्र को कुछ न कुछ जरूर मिलता.

जो रेलवे सबसे ज्यादा परेशान रहता है कि वह घाटे में चल रहा है, उसको जेटली जी ने सिर्फ दो मिनट में निपटा दिया. यह भी कि रेलवे को हाइटेक करने के लिए बड़े-बड़े दावे करनेवाली सरकार ने अगर रेलवे की थोड़ी अनदेखी की है, तो यह संकेत भी यही बताता है कि इस बार ग्रामीण भारत को मजबूत करने का वादा करके ग्रामीण वोट बैंक पर पकड़ मजबूत बनायी जायेगी. हां, फुटवेयर, लेदर और टैक्सटाइल को प्रोत्साहन दिया गया है, जिससे रोजगार बढ़ेंगे.

इस बजट से महंगाई पर कुछ खास फर्क नहीं पड़ेगा. अप्रत्यक्ष कर के जीएसटी में जाने से वह खत्म हो गया, और प्रत्यक्ष कर में कुछ ही चीजों का दाम कम हुआ है. इसलिए महंगाई जैसी है, वैसी बनी रह सकती है. हां, ग्रामीण विकास होगा, तो उन्हें महंगाई से लड़ने की ताकत जरूर मिल जायेगी, लेकिन यह इतनी जल्दी नहीं होगा. काफी वक्त लगेगा.
(वसीम अकरम से बातचीत पर आधारित)