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भूकम्प पूर्वानुमान अब भी चुनौती-- अभिषेक कुमार

ईरान-इराक सीमा पर कुर्द-बहुल इलाके में हाल में 7.3 तीव्रता के भूकम्प में गई सवा सौ से ज्यादा जानें अपने पीछे यह सवाल फिर छोड़ गई हैं कि क्या इसकी आहट की कोई सूचना पहले से नहीं मिल सकती! यह सवाल ज्यादा चर्चा में इसलिए है कि हमारे पड़ोसी देश पाकिस्तान में भूकम्प की भविष्यवाणी को लेकर काफी हलचल है। इसका प्रमुख आधार कलायिल नामक एक भारतीय व्यक्ति की भविष्यवाणी है, जिसमें उसने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चिट्ठी लिख कर आगामी दिसंबर में हिंद महासागर में भूकम्प और सुनामी की चेतावनी दी है। कलायिल का दावा है कि उसने इस भूकम्प का अहसास अपनी छठी इंद्रिय से किया है। भारत में तो इस भविष्यवाणी को लेकर कोई सुगबुगाहट नहीं है लेकिन पाकिस्तान में इसे गंभीरता से लिया गया है।


पाकिस्तान के मौसम विभाग को वहां की खुफिया एजेंसी आइएसआइ की तरफ से यह सूचना मिली तो कई सरकारी संस्थान हिंद महासागार में संभावित भूकम्प और उसके प्रभाव से सुरक्षित रहने की तैयारी करने लगे। कलायिल ने साल खत्म होने से पहले हिंद महासागर में भूकम्प और सुनामी के चलते भारत-पाकिस्तान समेत सात देशों के प्रभावित होने की बात कही है, इसलिए पहले से भूकम्प के घाव झेल चुका पाकिस्तान इसे लेकर काफी संजीदा है। हम यह जानते हैं कि भारतीय उपमहाद्वीप के हिमालय क्षेत्र की जो भौगोलिक स्थिति है और वहां धरती के भीतर जिस तरह की हलचल मची हुई है, उसमें भूकम्प आने का खतरा हमेशा बना रहता है। ऐसे में हमारे देश से सैकड़ों किलोमीटर दूर इराक-ईरान सीमा पर भूकम्प से हुई तबाही और इस पर उठे एक सवाल ने इधर सोचने पर मजबूर किया है। जिस भूकम्प की चेतावनी कलायिल ने दी है, कहीं यह भूकम्प उसी का संकेत तो नहीं है।


इसी साल सितंबर में मैक्सिको में आए भूकम्प के बाद लोगों ने सोशल मीडिया पर लिखा था कि वहां के सीस्मिक अलर्ट सिस्टम यानी भूकम्प की चेतावनी देने वाली व्यवस्था ने ठीक से काम नहीं किया। मैक्सिको में भूकम्प चेतावनी सिस्टम 1991 में लगाया गया था। इस प्रबंध के तहत भूगर्भीय हलचलों पर नजर रखी जाती है और भूकम्पीय गतिविधि की सूचना देश के सभी शहरों में भूकम्प आने से पहले ही लाउडस्पीकर, रेडियो, टेलीविजन और फोन के जरिए दी जाती है। भूकम्प का अलर्ट जारी करने का जिम्मा वहां के सेंटर आॅफ इंस्ट्रूमेंटेशन एंड सीस्मिक रिकॉर्ड (सीआईआरईएस) पर है। 19 सितंबर 2017 के भूकम्प की चेतावनी समय पर नहीं देने को लेकर इस संस्थान की काफी आलोचना हुई थी।वैसे तो वैज्ञानिक भूकम्प के पूर्वानुमान की तमाम कोशिशें लंबे से कर रहे हैं, लेकिन अभी यह संभव नहीं हो पाया है, बल्कि इससे जुड़ी कुछ घटनाओं ने तो लोगों को इस बारे में और ज्यादा सतर्कता बरतने को विवश कर रखा है। एक घटना इटली में भूकम्प के पूर्वानुमान से जुड़ी है, जिसने दुनिया भर के वैज्ञानिक समुदाय को ही बेचैन कर दिया था। 2011 में वहां छह वैज्ञानिकों और एक सरकारी अधिकारी के खिलाफ इसलिए हत्या का मुकदमा दर्ज किया गया कि वे छह अप्रैल 2009 को इटली के ला-अकिला में आए भूकम्प की सही भविष्यवाणी करने में नाकाम रहे थे।


ये सभी इटली में प्राकृतिक आपदाओं के खतरे पर नजर रखने वाली समिति के सदस्य थे। इन्हें ला-अकिला में भूकम्प से ठीक एक दिन पहले यह जांच करने के लिए बुलाया गया था कि क्या वहां बड़े भूकम्प का कोई खतरा तो नहीं है। उस इलाके में निकल रही रेडॉन गैस की मात्रा के आधार पर इन वैज्ञानिकों ने आश्वस्त किया था कि फिलहाल खतरा ऐसा नहीं है कि पूरे इलाके को खाली कराया जाए। उनके आश्वासन देने के अगले दिन वहां 6.3 की ताकत वाला बड़ा भूकम्प आ गया, जिसमें तीन सौ से ज्यादा लोगों की मौत हो गई। दुनिया के हजारों वैज्ञानिकों ने साझा बयान में इस मुकदमे का विरोध किया था। उनका कहना था कि वैज्ञानिकों को बलि का बकरा बनाने के बजाय भूकम्प से सुरक्षा के उपायों पर ध्यान देने की जरूरत है, क्योंकि वैज्ञानिक तौर पर भूकम्प की पक्की भविष्यवाणी करने की कोई विधि अभी तक विकसित नहीं हो सकी है।


वैसे भूकम्प की भविष्यवाणी के मामले में वैज्ञानिक हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठे हैं। वे कई विधियों से धरती के अंदर चल रही हलचलों की टोह लेने की कोशिश करते हैं। भूकम्पवेत्ता धरती की भीतरी चट्टानी प्लेटों की चाल, अंदरूनी फॉल्ट लाइनों और ज्वालामुखियों से निकल रही गैसों के दबाव पर नजर रख कर भूकम्प का पूर्वानुमान लगाने की कोशिश करते हैं। जापान और कैलिफोर्निया में जमीन के अंदर चट्टानों में ऐसे सेंसर लगाए गए हैं जो बड़ा भूकम्प आने से ठीक तीस सेकेंड पहले इसकी चेतावनी जारी कर देते हैं। 2005 में अमेरिका के जियोलॉजिकल सर्वे विभाग ने तो इसके लिए बाकायदा एक वेबसाइट बनाई थी, जिसमें स्थान विशेष के धरातल में हो रहे बदलावों पर नजर रख कर हर घंटे भूकम्प की संभावना वाले क्षेत्रों का अनुमान लगाते थे। इन जानकारियों और गणनाओं के लिए उस विभाग में एक बड़ा नेटवर्क बना रखा है।


हालांकि अमेरिका से उलट भारत में सरकार ने 2015 में लोकसभा में बताया था कि भारत ही नहीं, दुनिया में कहीं भी भूकम्प की भविष्यवाणी के लिए कोई तकनीक या प्रौद्योगिकी का विकास नहीं हुआ है। अभी अप्रत्यक्ष माध्यम के जरिए कुछ आकलन किए जाते हैं। जिस तरह से हमारे पूर्वज पक्षियों के स्वभाव में परिवर्तन देखकर आकलन करते थे, उसका भी उपयोग किया जा रहा है। निस्संदेह दुनिया में भूकम्प का पूर्वानुमान लगाने के कुछ अपारंपरिक तौर-तरीके भी प्रचलित हैं। जैसे माना जाता है कि कई जीव-जंतु अपनी छठी इंद्रिय से जान जाते हैं कि कोई जलजला आने वाला है। ब्रिटेन के जर्नल आॅफ जूलॉजी में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार 2009 में इटली के ला-अकिला में आए भूकम्प से तीन दिन पहले टोड अपने प्रजनन स्थल छोड़कर दूर चले गए थे। दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) का बड़ा हिस्सा भूकम्प की दृष्टि से अत्यधिक संवेदनशील पैमाने (स्केल-4) पर आता है। साथ ही, उत्तरांचल, उत्तर प्रदेश और पूरा बिहार खिसकती हुई हिमालयी प्लेट के क्षेत्र में हैं। ईरान-इराक सीमा पर आए भूकम्प को एक चेतावनी के तौर पर लिया जा सकता है।


भूकम्प से बचाव का सबसे अच्छा तरीका है सतर्कता और बचाव के इंतजाम करना। कई देशों के उदाहरण इस संदर्भ में दिए जा सकते हैं। जैसे, अल्जीरिया में ज्यादातर स्कूलों और रिहाइशी इलाकों की इमारतें सीस्मिक बिल्डिंग कोड के तहत बनाई गई हैं। इसी तरह कनाडा का अपना राष्ट्रीय बिल्डिंग कोड है और वहां अस्पताल, स्कूल और अन्य सरकारी-रिहाइशी इमारतें इसी के तहत बनाई जाती हैं। मध्य अमेरिका में सेंट्रल अमेरिका स्कूल रेट्रोफिटिंग प्रोग्राम के तहत स्कूलों की इमारतों को खतरे से बचाने के लिए खास इंतजाम किए गए हंै। चिली के स्कूलों में बच्चों को साल में तीन बार भूकम्प से बचने का प्रशिक्षण दिया जाता है। इसके तहत बाकायदा मॉक ड्रिल भी होती है। चिली में 27 फरवरी 2010 को 8.8 तीव्रता का भूकम्प आया था, तब स्कूलों को सबसे कम नुकसान इसीलिए हुआ था कि उनकी इमारतें पूरी तरह बिल्डिंग कोड का पालन करती थीं। इसी तरह बीते कुछ सालों में भूकम्प के पच्चीस से ज्यादा झटके झेल चुके इंडोनेशिया में स्कूलों को भूकम्प से बचाने के लिए ‘द स्कूल अर्थक्वेक सेफ्टी इनिशिएटिव प्रोजेक्ट' लागू किया जा चुका है।