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भूख से मौत और उसके बाद-- ज्यां द्रेज

सिमडेगा जिले की संतोषी कुमारी की भूख से मौत के बाद आज बारह महीने बीत चुके हैं. इन बारह महीनों में झारखंड में भूख से मौतों की कम-से-कम पंद्रह और खबरें आयीं हैं. शायद किसी राजनीतिक दल या अतिसक्रिय पत्रकार की कृपा से इन पंद्रह घटनाओं में से एक या दो अतिरंजित हुई होंगी, लेकिन इनमें अधिकतर ऐसी घटनाएं हैं, जिनकी जांच ध्यान से की गयी है और उन्हें सही पाया गया. अगर भविष्य में भूख से मौतों को रोकना है, तो इस साल की घटनाओं से सीखना जरूरी है.

पीड़ित परिवारों की स्थिति को देखें, तो एक पैटर्न दिखता है. ऐसे परिवार थे, जिनके पास कुछ नहीं था- न संपत्ति, न शिक्षा, न रोजगार. ज्यादातर दलित या आदिवासी थे. कई बार पेंशन या जन-वितरण प्रणाली के सहारे जी रहे थे.

सोचनेवाली बात है कि झारखंड में अब भी लाखों परिवार जीने के लिए इन योजनाओं पर निर्भर हैं. उसी प्रकार के परिवारों में भूख से मौतें हुईं, जब किसी कारण वे पेंशन और जन-वितरण प्रणाली से वंचित हुए. इन मौतों के पीछे तीन तरह की असफलताएं हैं- सरकार, आधार और समाज की विफलताएं.

सरकार की जिम्मेदारी साफ दिख रही है. अगर सामाजिक सुरक्षा की योजनाएं ठीक से क्रियान्वित होतीं, तो झारखंड में किसी को भूखा सोने की जरूरत नहीं पड़ती. मसलन, संतोषी कुमारी का परिवार पिछले साल कम-से-कम छह योजनाओं के लिए योग्य था- जन-वितरण प्रणाली, विधवा पेंशन, नरेगा, मध्याह्न भोजन, मातृत्व लाभ और आंगबाड़ी कार्यक्रम, लेकिन मध्याह्न भोजन को छोड़कर संतोषी कुमारी का परिवार इनमें से एक भी योजना का लाभ नहीं उठा पा रहा था.

सामाजिक सुरक्षा की योजनाओं में अंत्योदय अन्न योजना का उल्लेख जरूरी है. अंत्योदय योजना अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के समय अतिगरीब लोगों के लिए शुरू की गयी थी. अंत्योदय परिवारों को जन-वितरण प्रणाली से हर महीने 35 किलो अनाज दिया जाता है. कई राज्यों में दाल या तेल भी दिया जाता है.

जितने लोग इस साल झारखंड में भूख से मरे, सब अंत्योदय के लिए योग्य थे, लेकिन कुछ ही परिवारों के पास अंत्योदय कार्ड था और उनको भी किसी कारणवश अनाज नहीं मिल रहा था. राज्य सरकार इस योजना पर बिल्कुल ध्यान नहीं दे रही है.

राज्य सरकार की और कई गलतियां हैं. हरेक मामले में सरकार की एजेंसियों ने भूख से मौत को नकारने की कोशिश की. कई बार फर्जी जांच की या करायी गयी. साथ ही, जिन सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भूख से मौतों की सच्चाई को उजागर किया, उन्हें ही बदनाम करने की कोशिश की गयी. कार्रवाई करना, सुधार लाना और पीड़ित परिवारों को राहत उपलब्ध कराना तो दूर की बात है.

अब आधार की बात करें. सोलह मौतों में से कम-से-कम आधे में आधार की भूमिका दिख रही है. रामगढ़ जिले में आधार कार्ड नहीं होने के कारण राजेंद्र बिरहोर जन-वितरण प्रणाली और पेंशन योजना से वंचित रहा.

सिमडेगा में संतोषी कुमारी के परिवार का राशन कार्ड आधार से लिंक नहीं होने के कारण रद्द कर दिया गया. देवघर में रूपलाल मरांडी को महीनों तक इसलिए राशन नहीं मिला, क्योंकि बायोमेट्रिक मशीन उनका अंगूठा पहचान नहीं पा रही थी. गढ़वा जिले में प्रेमनी कुंवर की पेंशन राशि किसी और के खाते में चली गयी, जो गलती से उन्हीं के आधार नंबर से लिंक किया गया था. कई अन्य लोगों ने भी आधार के कारण अपना राशन या पेंशन खोया और दम तोड़ दिया.

राशन और पेंशन के अलावा और कई योजनाओं में भी आधार ने नुकसान किया है. उदाहरण के लिए, आधार संबंधित समस्याओं के कारण आजकल मनरेगा मजदूरों के भुगतान की कोई गारंटी नहीं है. मातृत्व लाभ का भुगतान भी कई बार आधार के कारण फंस जाता है.

इसके बावजूद, सरकार यह मानने को तैयार नहीं है कि आधार के कारण कई लोग अपने राशन, पेंशन, रोजगार जैसे अधिकारों से वंचित हो रहे हैं.

सरकार आधार को अपना ब्रह्मास्त्र समझती है. जन-वितरण प्रणाली में बायोमेट्रिक्स अनिवार्य करने का नुकसान जितना भी दिखे, सरकार में इस नीति को वापस लेने की हिम्मत नहीं है. याद रखें, ऑनलाइन बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण के कई विकल्प हैं, जैसे स्मार्ट कार्ड. अगर हिमाचल प्रदेश की जन-वितरण प्रणाली में स्मार्ट कार्ड का सफल प्रयोग हो रहा है, तो अन्य राज्यों में क्यों नहीं हो सकता है?

भूख से मौतों में समाज की जिम्मेदारी भी है. संतोषी कुमारी के गांव में कमी अनाज की नहीं थी, एकजुटता की थी. उसका परिवार उस गांव में घासी जाति का इकलौता परिवार है. दुख की बात है कि भारतीय समाज में आपसी मदद की भावना ज्यादातर अपनी जाति तक सीमित है.

इस कारण संतोषी के परिवार को सहायता कम मिली. बाकी मौतों को देखें, तो यही कहानी है. पीड़ित परिवार के पड़ोसी या तो खुद गरीब थे या दूसरे समुदाय के थे. हां, इधर-उधर पड़ोसियों ने कुछ दिनों तक मदद की, लेकिन भूख से मौत को रोकना गांव, ग्राम पंचायत या मोहल्ले की सामूहिक जिम्मेदारी नहीं मानी जाती है. मध्य वर्ग, मुख्यधारा का मीडिया और राजनीतिक दलों ने भी इस मुद्दे पर बहुत कम ध्यान दिया है.
समाज और संस्कृति में परिवर्तन लाने के लिए समय लगेगा. सरकार की नीति और आधार की व्यवस्था में सुधार जल्दी लाया जा सकता है, लेकिन सरकार इन तथ्यों को माने तब न!