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भ्रष्टाचार के विरुद्ध तीन देवियां

वर्ष 2008 में पूरे देश भर की तरह मेघालय के जोंगक्षा गांव में भी नरेगा (अब मनरेगा) योजना लागू हुई. घपला-घोटाला भी साथा आया. नरेगा में काम करनेवालों को मजदूरी के रूप में 70 रुपये ही दिये जा रहे थे. इसके चलते नरेगा का स्थानीय भाषा में एक खास नाम पड़ गया, जिसका अर्थ होता है 70 टकिया.

इस भ्रष्टाचार के खिलाफ़ कोंग फ़ातिमा मायनसोंग, कोंग एक्यूलाइन सोंनथीअंग और कोंग मतीलदा सुतिंग नामक तीन महिलाओं ने आवाज बुलंद की और जीत हासिल की. कोंग फ़ातिमा को गांव में नरेगा के लिए समुदाय संयोजक की भूमिका दी गयी थी.

योजना की शुरुआत में ही फ़ातिमा ने गौर किया कि समानों की खरीद और मजदूरी भुगतान में कुछ धांधली चल रही है. जब फ़ातिमा ने इस बारे में गांव की संचालन समिति से जानकारी चाही, तो समिति ने यह कहते हुए फ़ातिमा को टाल दिया कि यह उसके कार्यक्षेत्र का मामला नहीं है.

फ़ातिमा को बताया गया कि मुखिया को तमाम बातों की जानकारी है कि कौन क्या कर रहा है? कोंग एक्यूलाइन सोंनथीअंग जिनकी जिम्मेदारी योजना को सुचारु रूप से लागू करने की थी, को भी इसी तरह की समस्या का सामना करना पड़ रहा था. इसके अलावा गृहिणी मतीलदा सुतिंग भी नरेगा में भ्रष्टाचार को लेकर चिंतित थीं.

तीनों महिलाओं ने सोचा कि संबंधित व्यक्तियों से बातचीत कर कामगारों को उनका वास्तविक अधिकार दिलवाया जा सकता है. लेकिन उनके सारे प्रयास बेकार रहे, किसी के कानों में जूं तक नहीं रेंगी. गांव में कुछ लोगों को लगा कि इन महिलाओं का आरोप बेबुनियाद नहीं है. वे लोग इनके साथ हो गये. जन समर्थन मिला तो साहस भी बढ़ा.

सूचना के अधिकार का इस्तेमाल कर जानकारियां जुटायी गयीं. यह उनकी पहली छलांग थी. जब उनसे पूछा गया यह सब करते हुए उन्हें कभी डर नहीं लगा, तो उन्होंने कहा कि हम जानते थे हम सच्चाई के रास्ते पर हैं. हम गांव की भलाई के लिये मुखिया और पदाधिकारियों से लड़ रहे थे.

आरटीआइ के तहत सूचना मांगे जाने के बाद गांव में दो धड़े बन गये. गांव में लोग एक दल को आरटीआइ पार्टी और दूसरे को मुखिया पार्टी कहने लगे. तीनों महिलाओं का राशन- पानी बंद कर दिया गया, लेकिन उनके चेहरों से मुस्कुराहट कभी गायब नहीं हुई. कोई उनके इरादों को डिगा नहीं पाया. न्याय की तलाश में वे धीरे-धीरे पर निरंतर आगे बढ़ती रहीं.

प्रखंड विकास पदाधिकारी, जिला ग्रामीण विकास प्राधिकरण से लेकर राज्य के मुख्य सूचना आयुक्त तक का दरवाजा उन्होंने खटखटाया. अंतत: उपायुक्त ने ग्रामीण रोजगार समिति के अध्यक्ष और सचिव के खिलाफ़ कार्रवाई का आदेश दिया. अब गांव के लोगों को सही मजदूरी मिल रही है.

गांव के लोगों को इस संघर्ष से जुड़ी हर तारीख अपने बच्चे के जन्म दिन की तरह याद है. हालांकि मेघालय मातृसत्तात्मक समाज रहा है, लेकिन फ़िर भी बड़े अफ़सरों के सामने महिलाओं को बोलने की इजाजत नहीं मिलती थी. लेकिन इन तीन महिलाओं ने पूरी स्थिति बदल दी और गांव में न्याय के लिए संघर्ष करने की परंपरा की नींव रखी.
(साभार : सिविल सोसायटी)