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मिल्क बॉयकाट, धरना- कैसे मालधारियों के आगे गुजरात सरकार को ‘काले’ मवेशी कानून मामले में झुकना पड़ा

दिप्रिंट, 27 सितम्बर

गुजरात में काफी शक्तिशाली माने जाने वाले मालधारी समुदाय को भूपेंद्र पटेल सरकार को विवादास्पद आवारा पशु नियंत्रण विधेयक, या उनके शब्दों में एक काले बिल की वापसी के लिए बाध्य करने में छह महीने लग गए. और इस मामले में दबाव बनाने की पुरानी रणनीतियां ही उनके काम आईं, जिसमें मिल्क बॉयकाट, राजनीतिक स्तर पर चेताना, सड़कों पर विरोध प्रदर्शन और व्हाट्सएप और टेलीग्राम ग्रुप्स जैसे सोशल मीडिया साधनों की ताकत का इस्तेमाल करना शामिल है.

पशुपालक समुदाय मालधारी गुजरात के बड़े हिस्से में एक अहम वोट बैंक हैं और लगभग 42-46 विधानसभा सीटों और तीन लोकसभा सीटों पर किंगमेकर होने का दावा करता है. चुनाव नजदीक आने के बीच उन्होंने सत्तारूढ़ भाजपा को वोट न देने की धमकी देकर अपना राजनीतिक दबदबा और बढ़ा लिया है.


बढ़ते आवारा मवेशियों की समस्या से निपटने की कोशिश में पटेल सरकार ने 31 मार्च को शहरी क्षेत्रों में मवेशियों पर नियंत्रण संबंधी विधेयक पेश किया था, जिसमें पशु-पालकों के लिए लाइसेंस जरूरी होने, जानवरों की टैगिंग और शहरी इलाकों में जानवरों के खुली जगहों पर घूमते पाए जाने पर 5000 रुपये तक जुर्माने का प्रावधान किया गया था. इससे मालधारी समुदाय सीधे तौर पर प्रभावित हो रहा था. यह कानून आठ प्रमुख शहरों और 162 कस्बों पर लागू होना था.

राजनीतिक विश्लेषक जगदीश आचार्य कहते हैं, ‘विधेयक वापस लिए जाने का सबसे बड़ा कारण उनका वोट बैंक था. मालधारी समुदाय काफी संगठित है. उन्होंने दूध की आपूर्ति रोककर, मवेशियों को सड़कों में खुला छोड़कर, और लामबंदी के जरिये सरकार पर दबाव बनाया. सरकार के पास इसके आगे झुकने के अलावा और कोई चारा ही नहीं था.’
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