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मजदूर होने का मतलब- डा अनुज लुगुन

अभी कुछ दिन पहले ही कोलकाता में ओवरब्रिज के गिरने से 22 लोगों के मरने की खबर आयी थी. मरनेवालों में ज्यादातर मजदूर थे. इनमें से एक उत्तर प्रदेश निवासी शंकर पासवान भी था, जो मोटिया का काम करता था. वह होली में अपने घर इसलिए नहीं गया, ताकि वह कुछ दिन और काम करके बेटी की शादी के लिए कुछ पैसे जमा कर सके.

यह हमारे देश के मजदूरों की आम कहानी है. कभी खदानों में दब कर उनके मरने की खबर आती है, कभी कारखानों में अपंग हो जाने की, तो कभी फुटपाथ पर रईसों की गाड़ियों से कुचलने की. जब मजदूरों का आक्रोश फूटता है, तो सिर्फ मुआवजे की घोषणा होती है. 

कहने को तो मुआवजा मृतक के परिजनों की सांत्वना के लिए होता है, लेकिन आज यह वास्तव में मजदूरों के मूलभूत प्रश्नों से पीछा छुड़ाने का जरिया बन गया है. किसी आकस्मिक दुर्घटना पर दलीय नेताओं की भाषणबाजी होती है और मुआवजे की राशि सौंपते वक्त फोटो खिंचवा कर वे पुण्य कमाने की मुद्रा में आ जाते हैं. क्या मजदूर होने का इतना ही अर्थ है? क्या मजदूर सिर्फ दूसरों को सेवाएं उपलब्ध कराने के लिए ही होते हैं? क्या श्रमिकों और उनके श्रम के प्रति समाज या राज्य की कोई नैतिक व वैधानिक जिम्मेवारी नहीं है?

मार्क्स और एंजेल्स ने पूंजीवादी सामाजिक ढांचे का विश्लेषण करते हुए कहा था कि मजदूरों को मिलनेवाली न्यूनतम मजदूरी मजदूर की हैसियत से मजदूरों के अस्तित्व मात्र को बनाये रखती है, अर्थात् उन्हें जीवन जीने भर की पगार मिलती है. वे मजदूर बने रहते हैं और एक वर्ग के लिए सुविधाओं का उत्पादन करते रहते हैं. जब समाजवादी समाज के निर्माण की परिकल्पना की गयी, तो इस संबंध को समाप्त करने की बात सामने आयी और दुनिया भर में मजदूरों ने अपने हित के लिए क्रांतिकारी संघर्ष किये.

उन्होंने काम के घंटे को निश्चित कराया, अपने परिवार के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य और आवास की मांग की, यूनियन बनाने और हड़ताल करने का अधिकार हासिल किया. रूस में हुए मजदूरों और किसानों के इस तरह के संघर्ष को मैक्सिम गोर्की ने अपने उपन्यास ‘मां' में जीवंत रूप में प्रस्तुत किया है. भारत में भी आजादी के बाद समाजवादी ढांचे को स्वीकार किया गया और सार्वजनिक उपक्रमों के माध्यम से मजदूरों के हितों को सुरक्षित करने का प्रयास किया गया. लेकिन यह अधूरा प्रयास था. आजादी के बाद राज्य द्वारा जिस मात्रा में सार्वजनिक क्षेत्रों में रोजगार सृजित किये गये, उससे कई गुना ज्यादा यहां की जनसंख्या बेरोजगार थी, जो अपनी जीविका के लिए असंगठित क्षेत्रों में जाने को विवश हुई.

नब्बे के दशक तक आते-आते देश में मजदूरों का सवाल धीरे-धीरे परिदृश्य से बाहर होता चला गया. अब चुनावों में भी मजदूरों के हितों की बात राजनीतिक दलों के घोषणापत्रों में नहीं होती है. अब तो संगठित क्षेत्रों में भी मजदूरों की स्थिति अच्छी नहीं रह गयी है. वैश्वीकरण के इस दौर में विदेशी निवेश को आकर्षित करने के नाम पर मजदूरों के प्रश्न को अप्रासंगिक बना दिया गया है. ऐसी परिस्थिति में असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के हितों की बात भला कौन करेगा? 

अब तो सरकारी संस्थाओं और सार्वजनिक उपक्रमों में भी ठेके पर ही मजदूर रखे जा रहे हैं. ठेके पर मजदूरी श्रम के शोषण का सबसे क्रूरतम आधुनिक तरीका है. ठेके पर मजदूर उसी तरह से रखे जाते हैं जैसे दास युग में दासों को जीने भर खाना मिलता था. ठेके की व्यवस्था ने श्रम के प्रति व्यक्त किये जानेवाले उस नैतिक दायित्व को खत्म कर दिया है, जिसके तहत श्रमिक और उसके परिवार के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य और आवास के न्यूनतम व्यवस्था की बात थी. आज मजदूर बेहद ही खतरनाक परिस्थितियों में काम करने के लिए मजबूर हैं, लेकिन उनके लिए जीवन की आधारभूत संरचनाओं और सुरक्षा की कोई वैधानिक व्यवस्था नहीं है. 

वैश्वीकरण के दौर में सारी चीजें चमक रही हैं, लेकिन मजदूरों के चेहरे का लोच गायब हो रहा है. बाजार ने श्रम और श्रमिकों की महत्ता को अपने विज्ञापनों से ढंक लिया है. आज भी मजदूर अपनी मूलभूत जरूरतों और अधिकारों के लिए संघर्षरत हैं. आज एक ओर भवन निर्माण, सड़क निर्माण, छोटी-बड़ी प्राइवेट फैक्टरियों, मिलों और खदानों में बहुत बड़ी संख्या में लोग ठेके पर मजदूरी करने के लिए विवश हैं, तो वहीं दूसरी ओर, नगरों-महानगरों में दूसरों के घरों, गलियों, नालियों में दिहाड़ी पर काम करने को विवश हैं. विभिन्न क्षेत्रों में असंगठित रूप से बिखरे मजदूर या तो श्रम कानून की परिधि से बाहर हैं या बाजार और निवेश के नाम पर श्रम कानून प्रभावहीन हैं.

आजादी की आधी सदी बाद भी मजदूरों की स्थिति दयनीय है. वे रेल के जनरल डब्बों में सवार होकर हजारों मील की अनिश्चितता भरी यात्राएं करते हैं और खुद के श्रम को प्रतिकूल परिस्थितियों में बेचने को मजबूर होते हैं, जहां न उनके जीवन की न्यूनतम व्यवस्था होती है, न ही उनकी सुरक्षा निश्चित होती है. न ही उनकी मजदूरी इतनी होती है कि वे जीवन की बेहतर परिस्थितियों को खरीद सकें. यह श्रम या श्रमिक की स्वाभाविक स्थिति नहीं है, बल्कि यह विकास के पूंजीवादी ढांचे का स्वाभाविक लक्षण है. नगरों में पूंजी और बाजार का केंद्रण गांवों से पलायन को स्वाभविक रूप से जन्म देता है. पूंजीवाद के इस लक्षण से निबटे बिना ‘श्रमेव जयते' की बात असंगत है. 

मनरेगा एक अच्छा प्रयास है, लेकिन यह तब तक एकांगी है, जब तक इसके लाभ के रूप में मजदूर अपनी वास्तविक हैसियत से बाहर नहीं निकल जाते हैं. 

यह तभी संभव है, जब मजदूरों के लिए न्यूनतम मजदूरी के अतिरिक्त शिक्षा, स्वास्थ्य व सुरक्षा की गारंटी भी हो. समाज में श्रम और श्रमिकों की जरूरत हमेशा बनी रहेगी, लेकिन मजदूर होने का अर्थ यह नहीं है कि वह सिर्फ दूसरों के लिए सुविधाओं का उत्पादन करता रहे और खुद अभाव व अपमान झेलता रहे. जब तक मजदूरों के लिए न्यूनतम मजदूरी के अतिरिक्त जीवन की आधारभूत सुविधाओं की व्यवस्था नहीं होती, तब तक न हादसों की अमानवीयता को कम किया जा सकता है और न ही समाज में श्रम के प्रति उचित सम्मान का नजरिया विकसित हो सकता है.