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मताधिकार के मायने- संदीप जोशी

जनसत्ता 3 दिसंबर, 2013 : पिछले दिनों अचानक पूर्वी दिल्ली के रिहायशी इलाके निर्माण विहार के शांत और लगभग सूने बगीचे में चकाचौंध रोशनी देखी।

चमाचम रोशनी ऐसी कि देखने वाले को सैर करने का न्योता हो। इसी बहाने अंधेरे में भी सैर हुई। संभ्रांतता दर्शाते हुए मॉल जैसी जगमगाहट पूरे बगीचे में फैली हुई थी। वहीं ध्यान आया कि दो हफ्ते में दिल्ली के विधानसभा चुनाव होने हैं। बगीचे की जगमगाहट उजले चुनावों की ओर इशारा कर रही थी। बगीचे के बाहर खड़े कॉलोनी के निवासी ने समझाया कि यह महीने भर जगमगाने वाली चकाचौंध है। इसलिए सैर का आनंद ले लेना चाहिए।

दिल्ली देश की राजनीतिक राजधानी भी है और सत्ता की रणभूमि भी। इस बार के विधानसभा चुनाव लोकसभा चुनाव से कुछ महीने पहले होने के कारण माहौल में एक तरह की गर्मजोशी है। दिल्ली के चुनाव लोकसभा चुनाव में मतदाताओं के संभावित रुझान का संकेत भी देंगे। देश की राजनीति पर आम आदमी पार्टी किस हद तक असर डालेगी, यह भी दिल्ली के चुनाव दर्शाएंगे। इस त्रिकोणीय चुनाव का नतीजा आठ दिसंबर को सामने आएगा। उसी दिन अन्य चार राज्यों के मतदान के परिणाम भी आएंगे।

मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में रिकार्ड मतदान हुआ। दिल्ली में भी मतदान का प्रतिशत बढ़ सकता है। चुनाव लोकतंत्र की रणभूमि होते हैं। जहां चुनाव आम जनता के सपनों का संसार गढ़ते हैं वहीं मतदाता चुनावी घोषणाओं में, नेताओं की प्रस्तावनाओं में अपना संसार तलाशते हैं। चुनावों में लड़ रहे नेता आम जनता को भरमाने में कोई कसर नहीं छोड़ते। विधानसभा चुनावों से ठीक पहले पूर्वी दिल्ली के सबसे पहले बसे निर्माण विहार के बगीचे में शानदार दिखते लैंप लगाना जनता को पांच साल के लिए भरमाना भर है। लेकिन बरसों से फुसलाने वाले नेताओं का समय भी आ गया है।

जनता जानती है कि यह राजनीति की साख में गिरावट का दौर है। नए विचारों का अकाल तो है ही, राजनीति के मूल स्वभाव का लोप होता जा रहा है। लगातार गिरती राजनीति में जो बात सबसे ज्यादा आहत करती है वह विश्वसनीयता का अभाव है।

दिल्ली की त्रिकोणीय प्रतिस्पर्धा का आनंद राजधानी के लोग भरपूर ले रहे हैं। ऐसा अनिश्चित माहौल किसी अन्य राज्य में नहीं देख गया। शीला दीक्षित के नेतृत्व में कांग्रेस चौथी बार दिल्ली में बहुमत पाने का सपना देख रही है। वहीं भारतीय जनता पार्टी अपनी देशव्यापी लहर का हवाला देकर उसे दिल्ली में भुनाने की जी-तोड़  कोशिश कर रही है। जबकि तीसरी शक्ति के तौर पर उभरी आम आदमी पार्टी ने कांग्रेस और भाजपा, दोनों को गहरी चिंता में डाल रखा है। दोनों राष्ट्रीय पार्टियां दिल्ली में घबराई हुई नजर आती हैं। इस स्थिति को लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत मानना चाहिए। ऐसी ही लोकतांत्रिक परिस्थिति में लोकहित साधने का उत्तरदायित्व राजनेताओं पर आता है।

अक्सर आम जनता उतनी सामाजिक नहीं होती जितनी वह दूसरों को होने की नसीहत देती है। इसलिए दिल्ली का शासन कांग्रेसी सत्ताधारियों की कर्मभूमि रहा है। बताने को कांग्रेस ने कई योजनाएं बताई हैं। योजनाएं बनाना और उनको कार्यान्वित करना दो अलग बातें हैं। लेकिन अगर राष्ट्रमंडल खेल आयोजन और उसकी आड़ में दिल्ली का सिंगापुरी-करण छोड़ दें तो शीला दीक्षित सरकार अपनी पीठ थपथपा सकती है। सड़कें और फ्लाइओवर दिल्ली की जरूरत रहे हैं। यही मध्यवर्गीय जरूरत पूरी होने के कारण शीला सरकार ढेड़ दशक तक चल पाई है।

सभी राजनीतिक दलों के घोषणापत्रों को ध्यान में रखते हुए उनकी कथनी और करनी को छानना जरूरी है। घोषणापत्रों में दलों, उम्मीदवारों और बुनियादी मुद्दों के अलावा भी बहुत कुछ देखने-समझने को होता है। उनमें किए गए वादे अक्सर भरमाने के लिए ही होते हैं। सत्ता में रहे दल के पिछले घोषणापत्र से उसके वादों की गंभीरता का अंदाजा लगाया जा सकता है।

अमूमन हर चुनाव के मुख्य मुद्दे स्वास्थ्य, शिक्षा और सुरक्षा के अलावा बिजली, पानी और यातायात ही रहते हैं। बिजली के निजीकरण से फायदे और नुकसान दोनों हुए हैं। बिजली जहां चौबीस घंटे रहती है वहीं उसके दाम चार गुना बढ़ गए हैं।

इससे रईस-गरीब के बीच की खाई और गहरी हुई है। निजी कंपनियों को जरूर फायदा होता है जिसका फायदा सरकारी लोगों तक भी पहुंचता है जो निजी कंपनियों को फायदा पहुंचाते हैं। आम आदमी ठगा सा ही रहा है। निजीकरण से सरकार अपने उत्तरदायित्व से पीछा छुड़ा लेती है। कंपनियों और राजनेताओं की सांठगांठ ने आम जनता को केवल धोखे में रखा है।

दिल्ली के जल संसाधनों को सरकार ने मल-जल होने दिया है। जलापूर्ति के लिए अन्य राज्यों से जल मंगाया जा रहा है। पानी जैसी प्राकृतिक वस्तु भी इस कारण महंगी हुई है। पानी पर जिनका नैसर्गिक हक बनता है उनसे सत्ता के ठेकेदार वही पानी छीन रहे हैं। यमुना सफाई परियोजना के नाम पर बेइंतहा धन बरबाद किया जाता रहा है। उसका हिसाब कोई सरकार देने को तैयार नहीं है।

कहने को दिल्ली में खाद्य सुरक्षा योजना सबसे पहले लागू की गई।
लेकिन दिल्ली जैसे छोटे और संपन्न राज्य में इसे लागू करना कोई चुनौती नहीं हो सकता। राजधानी होने के नाते खेतिहर भूमि लगभग नहीं के बराबर है। दिल्ली में सरकारी तामझाम और उससे जुड़े लोगों के अलावा छोटे या बड़े व्यापारी ही बहुतायत में हैं। इन्हीं व्यापारियों का मानना है कि कांग्रेस राज में भ्रष्टाचार तो रहा है लेकिन काम भी होते रहे। वहीं भाजपा के राज में अगर भ्रष्टाचार नहीं था तो आवश्यक काम होते ही नहीं थे। यानी व्यापारी लोग खाने-खिलाने और स्वार्थ सिद्ध करने को ही सरकार चलाना मानते हैं। दिल्ली में खाद्य समस्या नहीं है क्योंकि राजधानी होने के नाते रोजगार मिल जाता है।

पिछले दिनों रिकार्डतोड़ महंगाई में भी दिल्ली ने दिवाली पर पटाखों का रिकार्डतोड़  शोर मचाया और धुआं फैलाया। तभी लगा कि महंगाई को नजरअंदाज कर दिल्ली के मुटाते मध्यवर्ग ने देश के दिवाले में भी शोर भरी दिवाली मनाई। यह वही मध्यवर्ग था जिसने अण्णा आंदोलन को अपना भरपूर समर्थन दिया था। दिल्लीवासियों ने जिस उत्सवधर्मी उपस्थिति से अण्णा आंदोलन में भाग लिया था उसी वैभवता में दिवाली मनाई। इससे लगता है कि दिल्लीवासी राजनीतिक यथास्थिति बनाए रख सकते हैं। वहीं भाजपा को दिल्ली की सत्ता के दम पर ही लोकसभा चुनाव में मत मांगने का जिम्मेदाराना हक मिलेगा। लेकिन जनता का संदेह उनके हाल के राजनीतिक फैसलों पर टिकता है।

यह ठीक है कि नेतृत्व बदलता है तो लोगों का रवैया भी बदलता है। लेकिन जो बात समझ में नहीं आती वह डॉ हर्षवर्धन को हड़बड़ी में नेतृत्व सौंपना है। पहले भाजपा ने विजय गोयल को आस बंधाई और फिर उनके नीचे से जमीन सरका ली। बेशक डॉ हर्षवर्धन की छवि साफ-सुथरी है और उनका राजनीतिक जीवन बेदाग रहा है। लेकिन भाजपा उनके नेतृत्व में पिछला विधानसभा चुनाव हारी थी। इस बार विजय गोयल को दिल्ली भाजपा काखेवनहार माना जा रहा था।

आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली चुनाव को विशेष बना दिया है। अण्णा आंदोलन की जमीन से फड़फड़ा कर उठने वाली पार्टी ‘आप’ ने दिल्ली के राजनीतिक दंगल में दो पुराने पहलवानों को चुनौती दी है।

राजनीति के प्रति अण्णा हजारे का जो भी रुख हो, लोकतंत्र में मतदान ही असल लोकहित साध सकता है। इसलिए अण्णा जो भी समझें, केजरीवाल को चुनावी राजनीति में ही सार्थकता दिखी। बहुत कम समय में आप ने अपनी जमीन पकड़ ली है। कम से कम राजनीति का एक अलग पहलू जनता के सामने रखा है।

‘आप’ उम्मीदवारों पर किए गए ‘स्टिंग’ में कोई दम नहीं दिखा। यह सभी मानेंगे कि धोखे से कभी सच सामने नहीं आ सकता। मीडिया सरकार नामक संस्था द्वारा किए गए स्टिंग को न तो विश्वसनीय पत्रकारिता माना जा सकता है और न ही स्टिंग करने वालों की नीयत साफ दिखती है।

आप के चुनाव चिह्न को लेकर जो पहला विचार आता है वह सफाई ही है। ‘झाडू’ मन, व्यवस्था, राजनीति की सफाई और अन्य सफाई से अपनत्व दर्शाता है। लेकिन झाड़ू किसी भी स्थिति में प्रशासनिक योग्यता नहीं दर्शाता। इसलिए जनता उनके सफाई अभियान के साथ तो निश्चित रहेगी लेकिन उनकी प्रशासनिक योग्यता पर संदेह बना रहेगा।

बेशक दिल्ली विधानसभा के चुनाव में  सन 77 के आम चुनाव जैसी बदलाव की आस न दिख रही हो लेकिन जोश भरपूर है। जोश बदलाव के होश का भी हो सकता है और यथास्थिति बनाए रखने का भी। मगर महत्त्वपूर्ण है त्रिकोणीय लोकतांत्रिक प्रतिस्पर्धा। कांग्रेस को सत्ता खिसकने का भय है तो भाजपा के लिए राष्ट्रीय स्तर पर अपने पक्ष में माहौल बनाने के लिए दिल्ली पर फतह जरूरी है। वहीं आम आदमी पार्टी की सशक्त मौजूदगी ने पहले से स्थापित दलों के समीकरण बिगाड़ दिए हैं। वह जनता की बदलाव मन:स्थिति को भुनाना चाहेगी।

आज दिल्लीवासी मानें या न मानें लेकिन कांग्रेस ने पंद्रह साल राज चलाया ही है। वहीं जब भाजपा पर दिल्लीवासियों ने भरोसा दिखाया था तो पांच साल में तीन मुख्यमंत्री बदले थे। और इस बार क्या गारंटी है कि विजय गोयल और डॉ हर्षवर्धन में सत्ता को लेकर अनबन नहीं होगी। वहीं आम आदमी पार्टी को कोई प्रशासनिक अनुभव नहीं है। आप की आदर्श राजनीति अभी आग का दरिया है जिसमें उनको डूब कर ही निकलना होगा।

हर पांच साल की तरह इस बार भी राजनीति जनता जनार्दन के सामने नतमस्तक है। जो बात इस बार अलग हो रही है वह अण्णा आंदोलन से उभरी लोकतांत्रिक जागरूकता है। मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में जनता को अपने भूले जनमत की कीमत का अहसास हुआ है। लोकतंत्र में लोकहित ही सर्वोपरि है। दिल्ली के चुनाव में कोई भी जीते, लोकतंत्र की जीत तय है। जनता के हाथ में ही सत्ता की कुंजी होती है। लोकतंत्र में जनता ही जनार्दन है। अपने मतदान से लोकतंत्र को जीतने दें।