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मध्य प्रदेश: वन मित्र पोर्टल में उलझे वन ग्राम, नहीं मिल पाया राजस्व ग्राम का दर्जा

डाउन टू अर्थ, 30 जनवरी

“अपनी जमीन पर फसल लगाओ या जंगल से वनोपज लाओ, हमेशा कार्रवाई का डर लगा रहता है। न खाने को कुछ मिल रहा है और पीने को पीना। बिजली, सड़क तो दूर की बात है”। दनलू बैगा यह कहते-कहते निराश हो जाते है।

दनलू मध्य प्रदेश के डिडौंरी जिले की फिटारी ग्राम पंचायत के लमोठा वनग्राम में एक हेक्टेयर (2.4711 एकड़) वनभूमि पर परिवार के आठ सदस्यों के साथ रह रहे हैं, उनकी आजीविका का एकमात्र साधन खेती-किसानी हैं, लेकिन न तो उन्हें कृषि योजनाओं का लाभ मिल रहा और न ही जनकल्याणकारी योजनाओं का। यह समस्या दनलू बैगा तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि मध्य प्रदेश के लगभग 925 वनग्रामों में रह रहे हर आदिवासी की है।

दरअसल, आजादी के 75 साल बाद और वन अधिकार अधिनियम के लागू होने के 15 साल बाद भी मप्र के आदिवासी कई तरह की समस्याओं से जूझ रहे हैं। 

भारत में सबसे ज्यादा वनग्रामों की संख्या 925 मप्र में हैं। गृहमंत्री अमित शाह ने 22 अप्रैल 2022 को भोपाल में मप्र वन समितियों का सम्मेलन में आदिवासियों को विकास की मुख्यधारा से जोड़ने के लिए राज्य के 925 में से 827 वन ग्रामों को राजस्व ग्राम में परिवर्तित करने की घोषणा की थी। इनमें से 793 वनग्रामों को राजस्व ग्राम बनाने की कार्रवाई चल रही हैं, इसकी कलेक्टरों द्वारा अधिसूचना भी जारी हो गई हैं, 3 तीन वनग्राम (मंडला और डिंडौरी के) में कार्रवाई शुरू होना बाकी हैं , शेष 31 वनग्राम पहले से राजस्व ग्राम में शामिल हो चुके या डूब क्षेत्र में हैं।

इनमें से डिडौंरी जिले में भी 82 वनग्रामों को राजस्व ग्राम बनाने का फैसला लिया, लेकिन करीब दो साल बाद भी जमीन पर कुछ बदलाव दिखाई नहीं दे रहा हैं। 

तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की अध्यक्षता में प्रदेश में पेसा (पंचायत एक्सटेंशन ओवर शिड्यूल्ड एरियाज एक्ट, 1996) एक्ट व वनाधिकार कानून के नियमों के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए अप्रैल 2023 में 12 सदस्यों की एक टास्क फोर्स का गठन किया था। इसमें आदिवासियों के लिए काम करने वाले समाजसेवी डाॅ. शरद लेले और मिलिंद थत्ते को बतौर सदस्य शामिल किया। 

पूरी रपट- डाउन टू अर्थ