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‘मन की बात’ करने वाले ‘मनरेगा’ की बात क्यों करने लगे?

-न्यूजलॉन्ड्री,

बात मनरेगा के बहाने सामाजिक सुरक्षा की, आखिर क्यों पूरी दुनिया में धुर पूंजीवाद की वकालत करने वाले शासक भी संकट के समय साम्यवादी हो जाते हैं. 20 लाख करोड़ के विशेष पैकेज के तहत एक बड़ा हिस्सा (40,000 करोड़ रुपए) वित्तमंत्री निर्मला सीतारमन ने मनरेगा योजना में खर्च करने की घोषणा की है. यह हिस्सा केद्रीय बजट में घोषित मनरेगा फंड के अतिरिक्त होगा.

खुद को बड़े गर्व से सोशली लेफ्ट कहने वाले भी आर्थिक नीतियों की बात आनेपर फैशनेबली राइट हो जाते हैं. संसद की रिपोर्टिंग के दिनों में मैंने देखा कि पीआईबी (प्रेस इंफोरमेशन ब्यूरो) कार्ड धारक पत्रकार सारी सुविधाओं- रेल यात्रा, सीजीएचएस हेल्थ स्कीम आदि- का फायदा उठाते हुए भी तथाकथित "फ्री-बीज़" के खिलाफ जमकर बोलने लगते हैं. किसी तर्क को सुनने समझने की कोशिश न करने वाले कई दोस्त इस हद तक चले जाते कि किसानों को खेती करने की ज़रूरत ही क्या है! उन्हें कारखानों काम करना चाहिये.

यह यूपीए-1 का वह दौर था जब वित्तमंत्री पी चिदम्बरम हुआ करते थे. वह कहा करते कि हिन्दुस्तान की अधिक से अधिक आबादी को आने वाले वर्षों में शहरों में रहना चाहिये. देश का भविष्य शहर हैं, गांव नहीं. चाहे हमारे शहरों में रहने की सुविधा तो दूर प्रवासी मज़दूरों के शौच की व्यवस्था तक नहीं थी लेकिन सत्तापक्ष और पूंजीवादी सोच के लिये विकास का यही रास्ता और मॉडल था.

उस दौर में बाज़ार गज़ब उफान पर था. लोगों ने हफ्तों में करोड़ों बनाए. ऑफिस टाइम में काम छोड़कर लोग पूरे देश में प्रॉपर्टी की कीमतें जानने, खरीदने-बेचने और शेयर मार्केट में निवेश करने में लगे रहते थे. तेज़ रफ्तार से अमीर बनने के लिये वह भारत का स्वर्णिम दौर था लेकिन तभी अमेरिका में ‘सब-प्राइम’ संकट आ गया. लीमन ब्रदर्स समेत बड़े-बड़े वित्तीय संस्थान और बैंक डूब गये. पूंजीवाद घुटनों पर आ गया.

दुनिया में आई इस आर्थिक सुनामी का असर भारत पर भी पड़ा लेकिन उसकी कहानी पटरी से नहीं उतरी क्योंकि यहां पूंजीवाद के घोड़े पर साम्यवाद की नकेलचढ़ी हुई थी. भारत की अर्थव्यवस्था का एक्सपोज़र तो था लेकिन सेफगार्ड्स नहीं हटाये गये थे.

उस वक्त जिन दो बड़े “आर्थिक सुधारों” होने से रोका गया वह था बीमा क्षेत्र में विदेश निवेश की सीमा बढ़ाना और भारत के बैंकों का निजीकरण. इन तथाकथित सुधारों को रोकने का श्रेय उस वक्त सरकार को बाहर से समर्थन दे रही लेफ्ट पार्टियों को जाता है जो आज राजनीतिक परिदृश्य से नदारद हैं. तब बेहद शक्तिशाली सीपीएम- जो उस वक्त कांग्रेस और बीजेपी के बाद संसद में तीसरी सबसे बड़ी पार्टी थी- ने चिदंबरम पर नकेल कसे रखी. किसी हद तक उस अंकुश की वजह से वैश्विक मंच पर मची उथलपुथल के बावजूद उसी मध्यवर्ग की पूंजी सुरक्षित रही जो बाज़ारवाद का घोर समर्थक है, ‘फ्रीबीज़’ का घनघोर विरोधी.

लेकिन इससे भी बड़ी बात इसी दौर में हो चुकी थी. साल 2004 में मनमोहन सिंह की सरकार बनने के साथ ही राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी एक्ट बना, जिसे नरेगा या मनरेगा के नाम से जाना गया. बाज़ारू ताकतों ने इसकी खूब आलोचना की क्योंकि उनके हिसाब से यह पैसे की बर्बादी थी. यह स्कीम शुरू में सालाना 100 दिन रोज़गार गारंटी की बात करती थी. गरीब की जेब में पैसा भेजने का यह एक अद्भुद प्रयोग था. ऐसा नहीं होता कि हर स्कीम में सब कुछ ठीक-ठाक ही होता है और सुधार की गुंजाइश नहीं होती लेकिन यह स्कीम बाज़ार प्रेमी मध्यवर्ग को शुरू से ही फूटी आंख नहीं सुहाया. लेकिन जनवादी नीतियों के समर्थकों और वामपंथी पार्टियों के दबाव में योजना चलती रही और इससे गरीब लोगों तक राहत पहुंची. इसकी एक झलक राजनीतिक नतीजों मेंभी दिखी, 2004 में 140 सीटें जीतने वाली कांग्रेस 2009 के चुनाव में 200 पार पहुंच गई.

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